भारत में हर साल 58 हज़ार लोगों की साँप के डँसने से मौत, Claude AI की मदद से नई एंटीवेनम विकसित करेगा भारतीय विज्ञान संस्थान
भारत में हर साल करीब 58 हज़ार लोगों की साँप के डँसने से मौत होती है। इस बड़ी स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), बेंगलुरु की इवोल्यूशनरी वेनोमिक्स लैब नई पीढ़ी की एंटीवेनम (साँप के ज़हर की दवा) विकसित करने पर काम कर रही है। इस रिसर्च में एन्थ्रॉपिक के "एआई फ़ॉर साइंस" कार्यक्रम के तहत क्लॉड एआई की मदद ली जा रही है। लैब क्लॉड की सहायता से साँपों के ज़हर से जुड़े बड़े डेटा का विश्लेषण कर रही है और ऐसे साझा टॉक्सिन (ज़हरीले तत्व) की पहचान कर रही है, जिनके आधार पर ऐसी एंटीवेनम तैयार की जा सके जो कई तरह के साँपों के ज़हर पर असरदार हो।
एन्थ्रॉपिक इंडिया की प्रबंध निदेशक इरिना घोष ने लिंक्डइन पर साझा की गई एक पोस्ट में इसकी जानकारी दी। वहीं, आईआईएससी बेंगलुरु ने भी अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर इस रिसर्च को साझा करते हुए कहा कि भारत में हर साल लगभग 58 हज़ार लोगों की जान साँप के डँसने से चली जाती है। संस्थान के अनुसार, उसकी इवोल्यूशनरी वेनोमिक्स लैब एन्थ्रॉपिक के "एआई फ़ॉर साइंस" कार्यक्रम के तहत क्लॉड एआई की मदद से वेनम डेटा का अध्ययन कर रही है, ताकि अगली पीढ़ी की व्यापक असर वाली एंटीवेनम विकसित की जा सके। इसी पोस्ट में एन्थ्रॉपिक ने भारत में अपने विस्तार की भी जानकारी दी है। कंपनी ने बताया कि आने वाले कुछ हफ़्तों में अमेज़न बेडरॉक के ज़रिये भारत में क्लॉड की इन-कंट्री इन्फ़्रेंस सुविधा शुरू होगी। यानी भारत से भेजे गए अनुरोधों की प्रोसेसिंग भारत में मौजूद सर्वरों पर ही होगी।
एन्थ्रॉपिक ने क्या कहा
इरिना घोष ने कहा कि भारत के बैंक, बीमा कंपनियाँ, दूरसंचार, सरकारी और सार्वजनिक संस्थान बड़ी मात्रा में लोगों का डेटा संभालते हैं। ऐसे में जब डेटा भारत में ही रहेगा, तब एआई का इस्तेमाल केवल परीक्षण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ज़रूरी सरकारी और व्यावसायिक प्रणालियों में भी किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि भारत में इन-कंट्री इन्फ़्रेंस की शुरुआत कंपनी की स्थानीय टीम, भारतीय भाषाओं में बेहतर प्रदर्शन और भारत के लिए उपयोगी साझेदारियों को और मज़बूत करेगी।
एआई फ़ॉर साइंस कार्यक्रम के तहत हो रही रिसर्च
एन्थ्रॉपिक का "एआई फ़ॉर साइंस" कार्यक्रम शोधकर्ताओं को निःशुल्क एपीआई क्रेडिट देता है। इसी कार्यक्रम के तहत प्रोफेसर कार्तिक सुनागर के नेतृत्व में आईआईएससी की इवोल्यूशनरी वेनोमिक्स लैब क्लॉड का इस्तेमाल कर रही है। क्लॉड वेनम डेटा का विश्लेषण करने और ऐसे साझा टॉक्सिन की पहचान करने में मदद कर रहा है, जिनके आधार पर नई और अधिक प्रभावी एंटीवेनम विकसित की जा सके।
पॉपवैक्स और टीआईएफ़आर भी कर रहे हैं क्लॉड का इस्तेमाल
भारतीय बायोटेक कंपनी पॉपवैक्स क्लॉड की मदद से अपने प्रोटीन डिज़ाइन मॉडल चला रही है। कंपनी इसका उपयोग तपेदिक (टीबी), हेपेटाइटिस सी, स्ट्रेप ए और अग्न्याशय, लिवर तथा गैस्ट्रिक कैंसर से जुड़े संभावित उपचारों पर रिसर्च में कर रही है। वहीं, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफ़आर) में श्रवण हनसोगे का शोध समूह केप्लर, टेस और प्लेटो मिशनों से मिले तारों के डेटा का विश्लेषण करने और नए एल्गोरिद्म तैयार करने के लिए क्लॉड का उपयोग कर रहा है।
भारत में बढ़ रहा क्लॉड का इस्तेमाल
एन्थ्रॉपिक के अनुसार भारत में एक्सिस बैंक, एनपीसीआई, इंडसइंड बैंक, गोदरेज इंडस्ट्रीज़, टीसीएस, इन्फ़ोसिस, कॉग्निज़ेंट, एलटीएम, एलटीटीएस, स्विगी, इनवीडियो, क्रेड, एटलन, रॉकेट, ज़ैम्प.एआई और फ़्रेशवर्क्स जैसी कंपनियाँ क्लॉड और क्लॉड कोड का उपयोग कर रही हैं। इसके अलावा डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ़ इंडिया (डीएससीआई), मोसिप, ओपनजी2पी, अगामी, सिविस और डिजिटल ग्रीन जैसे संगठन भी साइबर सुरक्षा, डिजिटल सेवाओं और नागरिकों से जुड़े कामों में क्लॉड का इस्तेमाल कर रहे हैं। कंपनी ने यह भी बताया कि कार्या के साथ मिलकर सात भारतीय भाषाओं में क्लॉड के प्रदर्शन को बेहतर बनाने पर काम जारी है।