दो साल में 9 राज्यों को खुरपका-मुँहपका रोग मुक्त बनाने की तैयारी, यूरोप को होगा डेयरी निर्यात, झींगा पालन पर भी सरकार का ज़ोर
भारत अगले दो वर्षों में कम से कम नौ राज्यों को फुट एंड माउथ डिज़ीज़ (एफएमडी) यानी खुरपका-मुँहपका रोग से मुक्त घोषित कराने की तैयारी में है। सरकार का मानना है कि इससे यूरोप के डेयरी बाज़ार का रास्ता खुलेगा, जहाँ अब तक भारतीय दुग्ध उत्पादों की पहुँच बेहद सीमित रही है। दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक होने के बावजूद भारत को विकसित देशों, विशेषकर यूरोप, में डेयरी उत्पादों के निर्यात के लिए एफएमडी-मुक्त प्रमाणन की शर्त पूरी नहीं होने के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के 98वें स्थापना दिवस समारोह में केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि देश में स्वदेशी टीकाकरण अभियान के लगातार प्रयासों से एफएमडी के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है। वर्ष 2021 में जहाँ इस बीमारी के 105 प्रकोप दर्ज किए गए थे, वहीं पिछले वर्ष यह संख्या घटकर 40 रह गई। उन्होंने बताया कि जिन नौ राज्यों में लगातार कम प्रकोप दर्ज हुए हैं और टीकाकरण का पूरा चक्र पूरा हो चुका है, उन्हें सबसे पहले एफएमडी-मुक्त प्रमाणन के लिए चुना गया है।
डिजिटल पहचान, स्वदेशी टीके और नई तकनीकों से पशु रोग नियंत्रण को मिली रफ़्तार
राजीव रंजन सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2030 तक भारत को पूरी तरह एफएमडी-मुक्त बनाने का लक्ष्य तय किया है। विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (WOAH) से प्रमाणन मिलने के बाद इन नौ राज्यों के ज़रिये भारत को पहली बार यूरोप जैसे बाज़ारों में डेयरी उत्पादों के निर्यात का अवसर मिलेगा।
उन्होंने बताया कि व्यापक टीकाकरण और पशुओं की पहचान सुनिश्चित करने के अभियान के तहत अब तक 38 करोड़ पशुओं को 13 अंकों की डिजिटल पहचान (आईडी) दी जा चुकी है। इसके अलावा इस वर्ष ओटीपी आधारित सत्यापन प्रणाली भी शुरू की गई है। इसके तहत टीकाकरण के बाद पशुपालकों के मोबाइल पर वन टाइम पासवर्ड (ओटीपी) भेजा जाता है, जिससे यह पुष्टि हो सके कि पशु को वास्तव में टीका लगाया गया है। यह व्यवस्था कुछ राज्यों में बिना टीकाकरण के रिकॉर्ड दर्ज किए जाने की शिकायतों के बाद लागू की गई।
मंत्री ने बताया कि आईसीएआर और पशुपालन विभाग ने मिलकर एफएमडी के अलावा क्लासिकल स्वाइन फीवर (सीएसएफ) और पेस्ट डेस पेटिट्स रूमिनेंट्स (पीपीआर) जैसी बीमारियों के नियंत्रण के लिए भी स्वदेशी टीके विकसित किए हैं। स्थापना दिवस समारोह में अफ्रीकी स्वाइन फीवर के लिए देश में विकसित पहला स्वदेशी टीका भी लॉन्च किया गया। उन्होंने इसे लंबे समय से पशुपालकों के लिए गंभीर समस्या रही बीमारी के खिलाफ बड़ी उपलब्धि बताया। साथ ही कहा कि देश के 18 पशु अनुसंधान केंद्र, कई विश्वविद्यालय और 84 पशु चिकित्सा महाविद्यालय पशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में तकनीकी प्रशिक्षण का बड़ा आधार तैयार करते हैं।
मछली निर्यात बढ़ा, अब अंतर्देशीय मत्स्य पालन और झींगा उत्पादन पर रहेगा फोकस
मंत्री ने कहा कि वर्ष 2025 में अमेरिका द्वारा समुद्री उत्पादों पर 58 प्रतिशत टैरिफ लगाने से शुरुआत में भारतीय निर्यातकों को झटका लगा था, क्योंकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा सी-फ़ूड बाज़ार है। इसके बावजूद वर्ष 2025-26 में मछली और समुद्री उत्पादों का निर्यात बढ़कर 73,891 करोड़ रुपये पहुँच गया, जबकि इससे पहले यह 62,408 करोड़ रुपये था। उन्होंने इस वृद्धि का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 100 से अधिक देशों के साथ किए गए मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) को दिया। हालाँकि उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 के बाद से अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन में 147 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन इसका योगदान देश के कुल मछली निर्यात में केवल 2 प्रतिशत है। इसे बढ़ाने के लिए उन्होंने ड्रोन आधारित परिवहन सहित विशेष नीतिगत समर्थन की आवश्यकता बताई।
राजीव रंजन सिंह ने ओडिशा में उपलब्ध विशाल खारे पानी (ब्रैकिश वॉटर) के संसाधनों के बेहतर उपयोग पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने आईसीएआर को राज्य सरकार के साथ मिलकर झींगा पालन की अपार संभावनाओं वाले इन क्षेत्रों के विकास की रणनीति तैयार करने के निर्देश दिए। साथ ही बताया कि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत रोग नियंत्रण, जलीय कृषि और नस्ल सुधार से जुड़े अनुसंधान के लिए आईसीएआर को 123 करोड़ रुपये मिले हैं। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के नेटवर्क के माध्यम से इन शोधों और नई तकनीकों को सीधे किसानों और मत्स्य पालकों तक पहुँचाने के निर्देश भी दिए।