अल नीनो की वापसी से बढ़ी टेंशन! 197 ज़िलों पर मंडराया खतरा; केंद्र ने तैयार किया एक्शन प्लान

Gaon Connection | Jun 10, 2026, 13:12 IST
प्रशांत महासागर में अल नीनो के सक्रिय होने की पुष्टि के बीच केंद्र सरकार ने 197 ऐसे जिलों की पहचान की है, जो कमजोर मानसून और जलवायु जोखिमों से सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि राज्यों के लिए विशेष कंटीजेंसी प्लान तैयार किए गए हैं। सरकार किसानों और फसलों को संभावित नुकसान से बचाने के लिए पूरी तरह सतर्क है।

अल नीनो के संभावित प्रभाव और कमजोर मानसून की आशंकाओं के बीच केंद्र सरकार ने देश के 197 ऐसे जिलों की पहचान की है, जो जलवायु जोखिमों और वर्षा में कमी से सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को कहा कि सरकार ने इन संवेदनशील जिलों के लिए विशेष निगरानी व्यवस्था और राज्यों के लिए अलग-अलग आकस्मिक (कंटीजेंसी) योजनाएं तैयार की हैं, ताकि कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को कम किया जा सके।



उन्होंने कहा कि अल नीनो को लेकर सरकार लगातार सतर्क है और इससे उत्पन्न होने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए हर स्तर पर तैयारी की गई है। शिवराज सिंह चौहान ने कहा, "अल नीनो को लेकर चिंता हमेशा मेरे मन में रहती है। अभी यह निश्चित नहीं है, लेकिन 197 जिलों की पहचान सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्रों के रूप में की गई है।" इस बीच जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (JMA) ने अल नीनो के विकसित होने की पुष्टि की है जिसके बाद भारत में भी कृषि और मानसून पर संभावित असर को लेकर चिंता बढ़ गई है।



हर राज्य के लिए बनाई गई अलग रणनीति

कृषि मंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार ने प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग कंटीजेंसी प्लान तैयार किया है। इन योजनाओं में वर्षा की कमी, सूखे जैसी परिस्थितियों और फसलों पर पड़ने वाले असर से निपटने के उपाय शामिल हैं। उन्होंने कहा कि किसानों के हितों की रक्षा के लिए सरकार कोई कसर नहीं छोड़ेगी और सभी संभावित परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार है।



क्या है अल नीनो?

अल नीनो एक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों का समुद्री सतह तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर दुनिया भर के मौसम पैटर्न पर पड़ता है। भारत में अल नीनो को अक्सर कमजोर मानसून, कम वर्षा, फसल उत्पादन में गिरावट और जल संकट जैसी स्थितियों से जोड़कर देखा जाता है।



मानसून को लेकर बढ़ी चिंता

कृषि मंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है, जब मानसून को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून के दीर्घकालिक औसत (LPA) का लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो सामान्य से कम वर्षा की ओर संकेत करता है। हालांकि मानसून की प्रगति लगातार जारी है। 4 जून को केरल पहुंचने के बाद मानसून पूर्वोत्तर भारत, सिक्किम और उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों को कवर कर चुका है। मौसम विभाग के अनुसार अगले चार से पांच दिनों में इसके महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल के अन्य हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल बनी हुई हैं।



BRICS बैठक में भी उठी जलवायु जोखिमों की चर्चा

इंदौर में 9 जून से शुरू हुई पांच दिवसीय BRICS कृषि बैठक में भी कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और जोखिमों का मुद्दा प्रमुखता से उठा। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के संयुक्त सचिव अजीत कुमार साहू ने कहा कि BRICS देशों के प्रतिनिधि किसानों के सामने मौजूद साझा चुनौतियों पर चर्चा कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि बैठक में कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, कृषि क्षेत्र के लिए वित्तपोषण, खाद्य सुरक्षा और किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग बढ़ाने जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।



किसानों पर रहेगा विशेष फोकस

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है और मानसून कमजोर रहता है, तो इसका असर खरीफ फसलों, जल उपलब्धता और ग्रामीण आय पर पड़ सकता है। ऐसे में सरकार द्वारा पहले से की गई तैयारी और राज्यवार रणनीति किसानों को संभावित नुकसान से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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