अल नीनो और कम बारिश के खतरे ने बदला खेती का तरीका, एक फैसले से लाखों लीटर पानी की बचत, किसानों का बढ़ रहा रुझान

Gaon Connection | Jun 18, 2026, 15:39 IST
अल नीनो और कम बारिश की आशंका को देखते हुए आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम और विजयनगरम ज़िलों के किसान धान की कम पानी वाली खेती तकनीकों को अपना रहे हैं। DSR और AWD जैसी विधियों से पानी की बड़ी बचत हो रही है और खेती की लागत भी घट रही है। साथ ही किसानों को मृदा स्वास्थ्य सुधार और वैकल्पिक फसलों के प्रति भी जागरूक किया जा रहा है।

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम और विजयनगरम ज़िलों के गन्ना और धान किसानों के लिए आने वाला समय एक बड़ी परीक्षा जैसा है। अल नीनो के प्रभाव और कम बारिश की आशंका को देखते हुए यहाँ के किसानों ने अब पारंपरिक तरीक़ों को छोड़कर पानी की बचत करने वाली धान की आधुनिक तकनीकों को अपनाना शुरू कर दिया है। पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, क्षेत्र के किसान अब 'डायरेक्ट सीडेड राइस' (DSR) यानी धान की सीधी बुआई और 'अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग' (AWD) जैसी विधियों की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहे हैं। इन तकनीकों से न केवल पानी की भारी बचत हो रही है, बल्कि खेती की लागत और मज़दूरी का ख़र्च भी काफ़ी कम हो गया है।



ज़िले के जेआर पुरम गाँव के 52 वर्षीय किसान मज्जी सत्यम पीटीआई को बताते हैं कि हर साल मई की शुरुआत में ही बारिश हो जाती थी, लेकिन इस साल जून आधा बीत जाने के बाद भी पानी नहीं बरसा है। उन्होंने बताया, "मैंने सुना है कि अल नीनो के कारण इस बार मानसून में कम बारिश होगी। इसलिए मैंने फ़ैसला किया है कि इस बार मैं पारंपरिक तरीक़े से रोपाई करने के बजाय सीधे धान की बुआई (DSR तकनीक) करूँगा। अगर अल नीनो का असर बहुत ज़्यादा गंभीर हुआ, तो हम सिर्फ़ घर में खाने भर का ही धान उगाएंगे।"



क्या है डीएसआर (DSR) तकनीक और इसके फ़ायदे?

पारंपरिक खेती में पहले नर्सरी में धान के पौधे तैयार किए जाते हैं, फिर भरे हुए खेतों में उनकी रोपाई की जाती है जिसके लिए बहुत ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है। इसके उलट, डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक में पौधों को सीधे खेत में बोया जाता है। इसमें न तो रोपाई की झंझट होती है और न ही खेत में चौबीस घंटे पानी भरकर रखने की मजबूरी।



इसी गाँव के एक अन्य 50 वर्षीय किसान आर सन्यास राव पिछले साल से ही इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस विधि से नर्सरी संभालने का सिरदर्द ख़त्म हो गया है और मज़दूरी पर होने वाला बड़ा ख़र्च भी बच गया है। इस साल वह दो एकड़ में सूखी बुआई और तीन एकड़ में मक्के की खेती कर रहे हैं।



डॉ. रेड्डीज फ़ाउंडेशन के ग्रामीण आजीविका और जलवायु कार्य निदेशक सुमन सारस्वतीभटला ने बताया कि पारंपरिक धान की खेती में पानी की बहुत ज़्यादा बर्बादी होती है। आंकड़ों के हिसाब से:



  • ड्राय डीएसआर (Dry DSR): इस विधि से प्रति एकड़ लगभग 11 से 12 लाख लीटर पानी की बचत होती है।
  • वेट डीएसआर (Wet DSR): इससे प्रति एकड़ लगभग 4 से 5.5 लाख लीटर पानी बचाया जा सकता है।
  • एडब्ल्यूडी (AWD): इस चक्रीय सिंचाई तकनीक से प्रति एकड़ 3 से 5 लाख लीटर पानी की बचत होती है।

पिछले साल इस इलाक़े के किसानों ने 3,667 एकड़ में डीसआर और 21,963 एकड़ में एडब्ल्यूडी तकनीक अपनाई थी, जिससे 3,000 करोड़ लीटर से अधिक पानी की बचत हुई और पर्यावरण को भी लाभ पहुँचा। इस साल अल नीनो की आशंका के चलते इन आंकड़ों में और बड़ी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।



मिट्टी की सेहत सुधारने पर विशेष ज़ोर

बदलते मौसम के कारण श्रीकाकुलम में बुआई का समय भी बदल गया है। पहले जहाँ जून के अंत में धान लगाया जाता था, वहीं अब बुआई जुलाई और रोपाई अगस्त तक खिसक गई है। इस बीच के समय में ज़मीन की नमी बनाए रखने के लिए किसानों को उड़द, मूँग और तिल जैसी कम समय की फ़सलें उगाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।



इसके साथ ही, क्षेत्र की मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन और सूक्ष्म पोषक तत्वों (सल्फ़र, जिंक और बोरॉन) की भारी कमी देखी गई है। इस समस्या से निपटने के लिए फ़ाउंडेशन की हैदराबाद लैब द्वारा किसानों को सॉइल हेल्थ कार्ड (मृदा स्वास्थ्य कार्ड) जारी किए जा रहे हैं, ताकि किसान अपनी ज़मीन की ज़रूरत के हिसाब से ही सटीक मात्रा में खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल करें। मौसम के इस जुए के बीच, अब यहाँ के किसानों को समझ आ गया है कि पुरानी आदतों को बदलकर ही खेती को सुरक्षित और मुनाफ़े का सौदा बनाया जा सकता है।

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