Animal Vaccination: पशुओं को गंभीर संक्रामक बीमारियों से बचाव की टीकाकरण तालिका जारी, जानिए कब, कौनसा टीका ज़रूरी?
पशुओं को गंभीर संक्रामक बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकरण सबसे पक्का तरीका है। उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग द्वारा जारी टीकाकरण तालिका का पालन करके किसान अपने गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और मुर्गी जैसे पालतू जानवरों को खुरपका-मुंहपका, गलघोंटू, पीपीआर और रानीखेत जैसी बीमारियों से सुरक्षित रख सकते हैं। नियमित टीकाकरण न केवल पशुओं की जान बचाता है, बल्कि उनकी आमदनी और किसान की मेहनत को भी सुरक्षित रखता है। पशु चिकित्सक बार-बार सलाह देते हैं कि बदलते मौसम और बारिश के समय संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए समय पर टीके लगवाना बेहद ज़रूरी है।
पशुओं का टीकाकरण ज़रूर कराएँ
पशुओं को बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकरण एक अचूक उपाय है। ये पालतू जानवर गांवों में परिवार की आमदनी का बड़ा सहारा होते हैं। जरा सी लापरवाही इन्हें गंभीर संक्रामक बीमारियों की चपेट में ला सकती है। पशु चिकित्सक जोर देकर कहते हैं कि नियमित टीकाकरण ही पशुओं को रोगों से बचाने का सबसे आसान और भरोसेमंद तरीका है। बारिश और बदलते मौसम में संक्रमण का खतरा और भी बढ़ जाता है।
पशु टीकाकरण तालिका का पालन करना सबसे ज़रूरी
सरकार की ओर से पशुपालन विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा टीकाकरण और कृमिनाशक दवाओं की तालिका जारी की जाती है। गाँव के पशुपालक नज़दीकी पशु चिकित्सालय या पशु चिकित्साधिकारी से संपर्क कर अपने पशुओं का टीकाकरण जरूर कराएं। समय पर किया गया टीकाकरण न सिर्फ पशुओं की जान बचाता है, बल्कि किसान की मेहनत और आमदनी भी सुरक्षित रखता है।
गाय-भैंस में कौन-कौन से टीके
| टीके (वैक्सीन) का नाम | प्रथम खुराक | समर्थक खुराक | अनुवर्ती खुराक |
| खुरपका-मुँहपका वैक्सीन (Foot and Mouth Disease Vaccine) | 4 माह से अधिक | पहली खुराक के 1 माह बाद | 6 माह |
| गलघोंटू वैक्सीन(Haemorrhgic Septicaemia Vaccine) | 6 माह या अधिक | - | मानसून से पहले हर साल |
| लंगड़ा बुखार वैक्सीन(Black Quarter Vaccine) | 6 माह या अधिक | - | मानसून से पहले हर साल बेहतर |
| ब्रुसेल्लोसिस सी-19 वैक्सीन | 4-9 माह तक | - | केवल मादा बछिया, उम्र भर रोगों से बचाव |
सूअर, बकरियों-भेड़ों में कौन-कौन से टीके
| टीके (वैक्सीन) का नाम | प्रथम खुराक | समर्थक खुराक | अनुवर्ती खुराक |
| पी.पी.आर.वैक्सीन | 3 माह | - | तीन साल बाद दोहराएँ |
| एन्टेरोटॉक्सेमिया वैक्सीन | 4 माह | बूस्टर खुराक 15 दिन बाद | हर साल लगवाएं |
| स्वाइन फीवर वैक्सीन | 3 माह | दूसरा टीका, 6 माह के अंतर पर | हर साल लगवाएं |
मुर्गियों में कौन-कौन से टीके
| टीके (वैक्सीन) का नाम | प्रथम खुराक | समर्थक खुराक | अनुवर्ती खुराक |
| मैरेक्स वैक्सीन | 1 दिन | - | एक बार |
| रानीखेत वैक्सीन(F-1) | 4-7 दिन | - | एक बार (2से 6 दिन के अन्तर्गत) |
| गमबोरो वैक्सीन | 35 दिन | - | प्रथम खुराक-14 दिनदूसरी खुराक-28 दिन |
| रानीखेत वैक्सीन (लसोटा) | 70 दिन | बूस्टर खुराक 10 सप्ताह बाद | प्रथम खुराक- 6 से 8 सप्ताहदूसरी खुराक -10 सप्ताह के बाद |
| फाउल पॉक्स वैक्सीन | 42 दिन | - | एक बार |
| इन्फेक्शियस ब्रोन्काइटिस वैक्सीन | 84 दिन | बूस्टर खुराक | केवल रोग प्रभावित क्षेत्रों में |
| रानीखेत वैक्सीन (आर टू बी) | 126 दिन | बूस्टर खुराक | हर दो माह पर दोहराएं |
संक्रामक रोग में क्या करें उपाय
संक्रामक रोग एक पशु से दूसरे में बहुत तेज़ी से फैलते हैं। अगर किसी पशु में बीमारी का शक हो, तो उसे तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए। बीमार पशु को छूने के बाद हाथ-पैर साबुन या कीटाणुनाशक से धोना बहुत ज़रूरी है, ताकि बीमारी आगे न फैले। गांवों में अक्सर इसी छोटी सी चूक से पूरा तबेला बीमार पड़ जाता है।
पशुशालाओं की साफ-सफाई कैसे रखें?
पशुशालाओं की साफ-सफाई भी रोग रोकथाम में अहम भूमिका निभाती है। पशु गृह के फर्श और दीवारों को समय-समय पर कार्बोलिक एसिड, कास्टिक सोडा या चूने से धोना चाहिए। बीमार पशु के इस्तेमाल किए गए बर्तनों, रस्सियों या जंजीरों को उबलते पानी या तेज धूप में अच्छी तरह से कीटाणुरहित करना जरूरी है।
चरागाह का सक्रमण रहित कैसे बनाएँ?
चरागाहों को लेकर भी सावधानी बरतनी चाहिए। जहां बीमार पशु पहले चर चुके हों, वहां स्वस्थ पशुओं को नहीं ले जाना चाहिए। अगर किसी चरागाह में संक्रमण फैल गया हो, तो उस पर चूना डालकर या 5-6 महीने तक उसे खाली छोड़ देने से रोग के कीटाणु अपने आप नष्ट हो जाते हैं। साफ और सुरक्षित चरागाह पशुओं की सेहत के लिए बहुत अच्छे होते हैं।
बीमार पशु को भीड़-भाड़ से बचाएँ
भीड़-भाड़ वाली जगहों पर पशुओं को ले जाना भी जोखिम भरा हो सकता है। पशु मेले, हाट-बाज़ार या प्रदर्शनियों में बहुत सारे पशु एक साथ इकट्ठा होते हैं, जिससे बीमारी फैलने की आशंका बढ़ जाती है। अगर बीमारी का अंदेशा हो, तो ऐसे स्थानों पर पशुओं को ले जाने से बचना चाहिए और उन्हें अलग रखना चाहिए।
Helpline Number
पशुधन हेल्पलाइन टोल फ्री नंबर - 1800-180-5141
मोबाइल वेटेरिनरी हेल्पलाइन नंबर - 1962
संक्रमित पशु की मौत के बाद क्या करें
अगर किसी पशु की संक्रामक रोग से मौत हो जाए, तो उसे खुले मैदान, नदी या तालाब में फेंकना बहुत खतरनाक है। ऐसे पशुओं के शव को या तो जला देना चाहिए या फिर 1.5 से 2 मीटर गहरा गड्ढा खोदकर उसमें चूना और नमक डालकर दफन करना चाहिए। इससे बीमारी आगे फैलने से रुकती है।