30% बढ़ा सुपारी का रकबा, फिर भी घट गया उत्पादन; जानिए क्या है बड़ी वजह
देश में सुपारी की खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इससे किसानों का उत्पादन नहीं बढ़ पाया है। पिछले 5 सालों में खेती का क्षेत्र 30 % से अधिक बढ़ने के बावजूद कुल उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में आई कमी मानी जा रही है।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर में बताया कि वर्ष 2021-22 की तुलना में 2025-26 तक सुपारी की खेती का क्षेत्र बढ़ा है, लेकिन उत्पादन और उत्पादकता दोनों में कमी आई है। उन्होंने यह भी बताया कि कर्नाटक अब भी देश का सबसे बड़ा सुपारी उत्पादक राज्य बना हुआ है, जबकि लीफ स्पॉट रोग की रोकथाम और उत्पादन सुधार के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं।
30% से अधिक बढ़ा सुपारी का रकबा
सरकार के अनुसार, वर्ष 2021-22 में देश में सुपारी की खेती 8.49 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती थी। यह बढ़कर 2025-26 में 11.06 लाख हेक्टेयर हो गई। यानी पाँच वर्षों में सुपारी की खेती का क्षेत्र लगभग 30.25 % बढ़ा।
उत्पादन में दर्ज हुई गिरावट
खेती का क्षेत्र बढ़ने के बावजूद सुपारी का उत्पादन 16.66 लाख टन से घटकर 15.29 लाख टन रह गया। यानी इस अवधि में उत्पादन में लगभग 8.22 % की कमी दर्ज की गई। उत्पादन में कमी की सबसे बड़ी वजह प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में गिरावट रही। वर्ष 2021-22 में जहाँ औसत उत्पादकता 1.96 टन प्रति हेक्टेयर थी, वहीं 2025-26 में यह घटकर 1.38 टन प्रति हेक्टेयर रह गई।
सुपारी उत्पादन में कर्नाटक सबसे आगे
लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, सुपारी की खेती और उत्पादन में कर्नाटक का देश में सबसे बड़ा योगदान है। पिछले 5 वर्षों में देश के कुल सुपारी क्षेत्र का 71.56 % और कुल उत्पादन का 75.47 प्रतिशत हिस्सा कर्नाटक से आया। राज्य में सुपारी का रकबा 6.03 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 7.98 लाख हेक्टेयर हो गया, लेकिन उत्पादन 13.48 लाख टन से घटकर 11.32 लाख टन रह गया। वहीं उत्पादकता भी 2.24 टन प्रति हेक्टेयर से घटकर 1.42 टन प्रति हेक्टेयर हो गई।
लीफ स्पॉट रोग की रोकथाम के लिए अभियान
सरकार ने बताया कि सुपारी के बागानों में लीफ स्पॉट डिज़ीज़ (LSD) के नियंत्रण के लिए 2025-26 से कर्नाटक के 10 प्रभावित तालुकों में सामुदायिक स्तर पर प्रदर्शन कार्यक्रम शुरू किया गया है। यह कार्यक्रम 50 हेक्टेयर क्षेत्र में चलाया जा रहा है, जिसमें प्रत्येक तालुक में 5 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है। इस कार्यक्रम के लिए तीन वर्षों की अवधि हेतु 6.32 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। सरकार के अनुसार, मौसम और लीफ स्पॉट रोग के बीच संबंध का अध्ययन करने तथा रोग की पूर्वानुमान प्रणाली विकसित करने के लिए आईसीएआर-सेंट्रल प्लांटेशन क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (CPCRI), कासरगोड को तापमान एवं सापेक्ष आर्द्रता नियंत्रक इकाई उपलब्ध कराई गई है। इससे भविष्य में रोग का समय रहते अनुमान लगाने में मदद मिलेगी।
सुपारी की वैल्यू चेन पर अध्ययन
सरकार ने यह भी बताया कि डायरेक्टरेट ऑफ अरेकेनट एंड स्पाइसेज़ डेवलपमेंट (DASD), आईसीएआर-सीपीसीआरआई के साथ मिलकर सुपारी की वैल्यू चेन पर एक पायलट अध्ययन कर रहा है। इसका उद्देश्य सुपारी के उत्पादन से लेकर उपभोग और वितरण व्यवस्था को समझना तथा क्षेत्र की चुनौतियों और संभावनाओं का आकलन करना है।