असम में बाढ़ का कहर जारी, 68 लोगों की मौत, लोग अभी भी संकट में
असम में इस साल की मानसूनी बाढ़ ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि राज्य के लिए बाढ़ केवल मौसमी आपदा नहीं, बल्कि हर साल लौटने वाला संकट बन चुकी है। कई जिलों में गाँव अब भी पानी से घिरे हैं। खेतों में फसलें डूब गई हैं, सड़कें क्षतिग्रस्त हैं और हजारों परिवार राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। सबसे बड़ी चिंता उन किसानों की है, जिनकी फसलें बाढ़ के पानी में बर्बाद हो गईं और जिनकी आजीविका पर सीधा असर पड़ा है।
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के ताज़ा बुलेटिन के अनुसार, 28 जुलाई तक राज्य में बाढ़ और इससे जुड़ी घटनाओं में 68 लोगों की जान जा चुकी है। बाढ़ से 4,45,495 लोग अब भी प्रभावित हैं। सबसे अधिक असर चराइदेव, शिवसागर, जोरहाट, गोलाघाट, नगांव और कामरूप (मेट्रोपॉलिटन) जिलों में देखा जा रहा है।
चराइदेव सबसे अधिक प्रभावित
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, चराइदेव सबसे अधिक प्रभावित जिला बना हुआ है, जहाँ 1.88 लाख से अधिक लोग बाढ़ की चपेट में हैं। इसके बाद शिवसागर में करीब 1.44 लाख और जोरहाट में 74 हजार से अधिक लोग प्रभावित हैं। कई गाँवों में लोगों का संपर्क अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाया है। राहत एवं बचाव दल लगातार प्रभावित इलाकों में खाद्य सामग्री, दवाइयाँ और अन्य जरूरी सामान पहुँचा रहे हैं।
खेती और पशुपालन को बड़ा नुकसान
बाढ़ का सबसे ज्यादा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। रिपोर्टस के मुताबिक, 37,139 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि अब भी पानी में डूबी हुई है। इससे धान समेत खरीफ की कई फसलें प्रभावित हुई हैं। किसानों को दोबारा बुवाई और खेत
पशुपालन भी इस आपदा से अछूता नहीं रहा। अब तक 26,679 से अधिक पशुओं के बह जाने की सूचना है। कई इलाकों में पशुओं के चारे की कमी और बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। ग्रामीण परिवारों के लिए यह दोहरी मार है, क्योंकि खेती और पशुपालन दोनों ही उनकी आय के प्रमुख स्रोत हैं।
राहत शिविरों में हजारों लोग
बाढ़ प्रभावित इलाकों में फिलहाल 90 राहत शिविर संचालित किए जा रहे हैं, जहाँ 28,695 विस्थापित लोग रह रहे हैं। इसके अलावा 94 राहत वितरण केंद्रों के माध्यम से भोजन, पीने का पानी और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। राष्ट्रीय आपदा मोचन बल, राज्य आपदा मोचन बल और स्थानीय प्रशासन राहत एवं बचाव कार्यों में जुटे हुए हैं। प्रभावित क्षेत्रों में लोगों तक पहुँचने के लिए 67 नौकाओं की मदद ली जा रही है।
हर साल क्यों आती है ऐसी बाढ़?
असम की भौगोलिक स्थिति इसे बाढ़ के प्रति संवेदनशील बनाती है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ भारी बारिश के दौरान तेजी से उफान पर आ जाती हैं। ऊपरी कैचमेंट क्षेत्रों में होने वाली लगातार वर्षा का असर मैदानी इलाकों पर पड़ता है। इसके साथ ही नदियों में गाद जमा होना, तटबंधों पर बढ़ता दबाव और जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ भी बाढ़ की गंभीरता बढ़ा रही हैं।
बाढ़ के बाद भी खत्म नहीं होती मुश्किलें
पानी उतरने के बाद भी ग्रामीण इलाकों की चुनौतियाँ बनी रहती हैं। खेतों में जमा गाद, क्षतिग्रस्त सिंचाई व्यवस्था, दूषित पेयजल, पशुओं में बीमारी का खतरा और घरों की मरम्मत जैसी समस्याएँ लोगों के सामने खड़ी हो जाती हैं। किसानों के लिए अगली फसल की तैयारी भी आसान नहीं होती, क्योंकि उन्हें बीज, खाद और अन्य कृषि निवेश पर फिर से खर्च करना पड़ता है। असम में हर साल आने वाली बाढ़ से निपटने के लिए केवल राहत और बचाव पर्याप्त नहीं है। नदी प्रबंधन, तटबंधों की मजबूती, बेहतर जल निकासी व्यवस्था और बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली को और प्रभावी बनाने की जरूरत है। तभी ग्रामीण इलाकों में जान-माल और खेती को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकेगा।