Assam Flood: 15 गायें बह गईं, 6-7 लोग अब भी लापता, बाढ़ के बाद गाँवों में बिखरी तबाही|Ground Report
एक झटके में खेत, घर और पशुधन सब कुछ उजड़ जाए, तो ज़िंदगी फिर से शुरू करना कितना मुश्किल होता है, इसका दर्द असम के बाढ़ प्रभावित गाँवों में साफ़ दिखाई देता है। कई परिवारों ने अपनी वर्षों की कमाई पानी में बहते देखी। किसी का घर ढह गया, किसी की गायें डूब गईं और कई लोग अब भी अपनों के लौटने का इंतज़ार कर रहे हैं।
गाँव कनेक्शन की टीम जब बाढ़ से सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाक़ों में पहुँची, तो वहाँ तबाही के ऐसे दृश्य मिले जो प्राकृतिक आपदा की भयावहता बयाँ करते हैं। घरों में कई फ़ीट तक गाद जमी है, खेत बर्बाद हो चुके हैं, मवेशियों के शव अब भी पड़े हैं और लोग मलबा हटाकर अपनी ज़िंदगी को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश में जुटे हैं।
बाढ़ के बाद गाँव में हर ओर तबाही के निशान
गाँव कनेक्शन की टीम असम के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में पहुँची, जहाँ नदी के किनारे बसे गाँव आज भी इस आपदा के ज़ख़्म समेटे हुए हैं। पानी भले ही उतर गया हो, लेकिन गाँव की गलियों, घरों और खेतों में तबाही के निशान साफ़ दिखाई देते हैं। कई वाहन अब भी कीचड़ में धँसे हैं, घरों के भीतर मोटी परत में गाद जमी है और लोग फावड़े लेकर अपने आशियाने को फिर से रहने लायक बनाने में जुटे हैं।
15 गायें बह गईं, पशुपालक की आँखों के सामने उजड़ गई वर्षों की कमाई
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान गाँव के निवासी प्रकाश शर्मा ने बताया कि इस बाढ़ ने उनके परिवार की सबसे बड़ी पूँजी छीन ली। उन्होंने कहा कि उनकी 15 से 16 गायें बाढ़ की भेंट चढ़ गईं। कुछ गायों को बचाने की कोशिश में उन्हें खुला छोड़ दिया गया था, लेकिन कई गायें कमरे में बंद रह गईं और पानी भरने से डूबकर मर गईं। जो खुली थीं, उनमें से कई तेज़ बहाव में बह गईं और कुछ का आज तक पता नहीं चल पाया। प्रकाश शर्मा कहते हैं, "पानी इतना तेज़ था कि कई गायें बह गईं। जो कमरे में थीं, वे डूब गईं। आज भी कई मवेशियों के शव अलग-अलग जगहों से निकल रहे हैं।"
इस गाँव में पशुपालन केवल आय का साधन नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक सुरक्षा भी है। ऐसे में एक साथ इतनी बड़ी संख्या में मवेशियों की मौत ने कई परिवारों को गहरे आर्थिक संकट में धकेल दिया है। गाँव में अब भी कई जगह मरी हुई गायों के शव पड़े हैं, जिन्हें हटाने का काम जारी है। ग्रामीणों का कहना है कि शवों के कारण संक्रमण फैलने का ख़तरा भी बना हुआ है। ग्रामीण बताते हैं कि पानी इतनी तेज़ी से बढ़ा कि उन्हें सामान समेटने का भी समय नहीं मिला। प्रकाश शर्मा बताते हैं कि पूरा परिवार जान बचाने के लिए घर की छत और टीन की छत पर चढ़ गया था। कई घंटे तक वे वहीं फँसे रहे। नीचे चारों ओर सिर्फ़ पानी ही पानी दिखाई दे रहा था। गाँव के लोगों का कहना है कि कई मकान तेज़ बहाव में पूरी तरह बह गए। जिनके घर बचे भी, उनमें इतना पानी भर गया कि पूरा घरेलू सामान बेकार हो गया।
गाद से पटे घर, बर्बाद हुई पूरी गृहस्थी
पानी उतरने के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती घरों की सफ़ाई है। घरों के भीतर कई फ़ीट तक गाद जमा हो गई है। बिस्तर, कपड़े, अनाज, फ़र्नीचर, बर्तन और रोज़मर्रा का सामान सब कुछ ख़राब हो चुका है। लोग फावड़ों और तसलों से गाद निकाल रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता कि घर को पहले जैसा बनने में कितना समय लगेगा। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों की मेहनत से बनाया गया घर कुछ घंटों की बाढ़ में तबाह हो गया। अब दोबारा सब कुछ जुटाना आसान नहीं होगा।
बाढ़ में जो पशु बच गए हैं, उनके सामने अब चारे की भारी समस्या है। खेत कई दिनों तक पानी में डूबे रहे, जिससे हरा चारा पूरी तरह नष्ट हो गया। ग्रामीणों का कहना है कि राहत सामग्री तो मिल रही है, लेकिन पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराना भी उतना ही ज़रूरी है क्योंकि खेती और पशुपालन ही उनकी आजीविका का आधार हैं।
6-7 लोग अब भी लापता
गाँव वालों के मुताबिक़ बाढ़ के कई दिन बाद भी 6 से 7 लोग लापता हैं। स्थानीय प्रशासन और बचाव दल उनकी तलाश में जुटे हैं। कई परिवार अब भी अपने परिजनों के लौटने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। गाँव के कुछ हिस्सों में ऐसे मकान भी हैं जो पूरी तरह बह गए, जिससे लोगों का पता लगाना मुश्किल हो गया है। ग्रामीणों के अनुसार गाँव के पास बहने वाली पिछौर नदी में हर साल पानी बढ़ता था, लेकिन इस बार का जलस्तर पहले से कहीं अधिक था। लोगों का कहना है कि उन्हें समय रहते ऐसी बाढ़ की गंभीरता का अंदाज़ा नहीं था। यदि पहले चेतावनी और सुरक्षित स्थानों तक पहुँचने की बेहतर व्यवस्था होती, तो नुकसान कुछ कम हो सकता था।
लंबा होगा सामान्य जीवन में लौटने का सफ़र
बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। खेती चौपट हो चुकी है, पशुधन का बड़ा नुकसान हुआ है और घर रहने लायक बनाने में ही कई सप्ताह लग सकते हैं। ग्रामीण सरकार से मुआवज़ा, पशुपालकों के लिए विशेष सहायता, चारे की व्यवस्था और बाढ़ प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की माँग कर रहे हैं। गाँव की तस्वीर बताती है कि प्राकृतिक आपदा का असर केवल कुछ दिनों का नहीं होता, बल्कि उससे उबरने में महीनों, कभी-कभी वर्षों का समय लग जाता है।
रिपोर्ट: मनीष मिश्रा
फ़ोटो: मोहम्मद आरिफ़