Assam Flood: सड़क किनारे कट रही हैं रातें , किताबें और घर बह गए... अब नई ज़िदगी बसाने की जद्दोजहद
असम के शिवसागर ज़िले के नेपाल कुटी गाँव में बाढ़ का पानी उतरने लगा है, लेकिन लोगों की मुश्किलें अभी भी कम नहीं हुई हैं। किसी का घर मलबे में बदल गया, किसी के ज़रूरी कागज़ बह गए, तो किसी बच्चे की किताबें और स्कूल यूनिफॉर्म मिट्टी में दब गईं। अब लोगों की लड़ाई बाढ़ से नहीं, बल्कि फिर से ज़िंदगी खड़ी करने की है।
गाँव कनेक्शन की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि कई परिवार आज भी अपने घरों में नहीं लौट पाए हैं। कुछ लोग सड़क किनारे तंबू में रह रहे हैं, तो कई परिवारों के मवेशी अब भी ऊँचे स्थानों पर बंधे हैं। बाढ़ का पानी भले कम हो गया हो, लेकिन गाद, टूटी दीवारें और बिखरा सामान लोगों को हर पल उस रात की याद दिला रहे हैं।
‘अभी भी सड़क किनारे तंबू में सो रहा हूँ’
नेपाली कुटी गाँव के माजे माली बताते हैं कि बाढ़ ने उनका पूरा घर तबाह कर दिया। अब वे सड़क किनारे लगाए गए तंबू में रात गुज़ार रहे हैं। उन्होंने बताया "अभी भी तंबू में ही सो रहा हूँ। घर की सफ़ाई और रहने लायक बनने में कम से कम डेढ़ महीना और लग जाएगा।" उनके घर में रखा सामान, ज़रूरी दस्तावेज़ और घरेलू चीज़ें या तो बह गईं या मोटी गाद के नीचे दब गईं। अब पूरा परिवार मिट्टी हटाकर जो कुछ बच सकता है, उसे निकालने की कोशिश कर रहा है।
माजे माली कहते हैं कि राहत के तौर पर खाने-पीने का सामान तो मिल रहा है, लेकिन सबसे बड़ी ज़रूरत अब घर बसाने की है। घर के कागज़, ज़रूरी दस्तावेज़, सब कुछ चला गया। अगर घर का सामान और रहने की मदद मिल जाए, तो सबसे बड़ी राहत होगी।
मवेशी भी घर नहीं लौट पाए
गाँव में कई घरों के मवेशी अब भी ऊँचे स्थानों पर बंधे हैं। नीचे अभी भी गाद और कीचड़ भरा हुआ है। लोग बताते हैं कि घरों के भीतर फिसलन इतनी ज़्यादा है कि चप्पल पहनकर चलना भी मुश्किल हो गया है। कई जगह यह भी पता नहीं चलता कि गाद के नीचे क्या दबा है, जिससे चोट लगने का डर बना रहता है।
‘हर साल बाढ़ आती थी, लेकिन ऐसी कभी नहीं देखी’
नेपाली कुटी के पास रहने वाले जावेद अली, जो कक्षा 6 के छात्र हैं, बताते हैं कि उनके परिवार ने हर साल बाढ़ देखी है, लेकिन इस बार का मंजर अलग था। उन्होंने बताया स "मम्मी ने कहा कि बाढ़ आने वाली है, इसलिए तैयार रहो। हमने सामान समेट लिया था" जावेद बताते हैं कि वे अपने माता-पिता का इंतज़ार कर रहे थे। जब पानी तेज़ी से बढ़ने लगा तो उन्हें बचाव दल को बुलाना पड़ा। जावेद के अनुसार, बचाव के लिए नाव पहुँची, लेकिन उस समय सबसे पहले उन लोगों को निकाला गया जो गंभीर खतरे में फँसे थे। जावेद ने बताया "हमने बहुत कहा कि पहले हमारे मम्मी-पापा को ले आइए, लेकिन उस समय नेपाली कुटी में बहुत लोग जान बचाने की स्थिति में थे। इसलिए बचाव दल पहले उन्हीं तक पहुँचा।"
बाढ़ में जावेद की किताबें, कॉपियाँ और स्कूल यूनिफॉर्म भी खराब हो गईं। उन्होंने कहा कि, किताबों पर इतनी मिट्टी चिपक गई है कि खोलने पर पन्ने फट जाते हैं। अब हमें नई किताबें, कॉपियाँ और यूनिफॉर्म की ज़रूरत है।
पानी उतर गया, लेकिन डर अब भी बाकी है
लोग धीरे-धीरे अपने घरों की सफ़ाई कर रहे हैं, लेकिन हर कदम संभलकर रखना पड़ता है। गाद से भरे घर, टूटे सामान और उजड़ी ज़िंदगी यह याद दिलाते हैं कि बाढ़ सिर्फ़ पानी नहीं लाती, बल्कि कई परिवारों की वर्षों की मेहनत भी अपने साथ बहा ले जाती है। अब यहाँ के लोगों की सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि उन्हें फिर से सिर छिपाने की जगह मिले और बच्चे दोबारा स्कूल लौट सकें।
रिपोर्ट: मनीष मिश्रा
फ़ोटो: मोहम्मद आरिफ़