पता नहीं कोई ज़िंदा बचेगा या नहीं, हम 20 साल पीछे चले गए, ₹1 से शुरुआत करनी पड़ेगी; जानें बाढ़ में सब कुछ गँवाने वाली असम की सीमा की कहानी
असम में आई भीषण बाढ़ ने लाखों लोगों की ज़िंदगी पूरी तरह तबाह कर दी है। घर-बार, मवेशी, ज़मीन और जीवन भर की कमाई सब कुछ पानी के तेज़ बहाव में समा चुका है। लोग जैसे-तैसे खुले आसमान के नीचे या सड़कों पर तिरपाल तानकर अपना गुज़ारा करने को मजबूर हैं। बाढ़ का पानी तो किसी तरह उतरा, लेकिन लगातार हो रही बारिश ने आपदा को और भयावह बना दिया है। भुखमरी, बीमारियों का डर और ऊपर से पहाड़ों के धंसने (भूस्खलन) की दहशत, हर पल यहाँ के लोगों की साँसें अटकी हुई हैं। गाँव कनेक्शन के वरिष्ठ पत्रकार मनीष मिश्रा और कैमरामैन मो. आरिफ कठिन सफर तय कर असम के शिवसागर ज़िले तक पहुँचे और उन्होंने बाढ़ प्रभावितों से बात की है। लोग खाने-पीने की छोटी-छोटी चीज़ों के लिए तरस रहे हैं। जब भी कोई गाड़ी मदद या अनाज लेकर आती है, तो लोग मूसलाधार बारिश में भी छाता लेकर दौड़ पड़ते हैं ताकि परिवार का पेट पाल सकें।
"बाढ़ ने हमें 20 साल पीछे ढकेल दिया"
सीमा सिंह नामक बाढ़ प्रभावित महिला ने बताया, "यहाँ हमारी ज़िंदगी बहुत मुश्किल हो गई है। दूषित पानी और कीचड़ की वजह से शरीर में ख़ारिश और खुजली की बीमारियाँ फैल रही हैं। घर-बार सब बर्बाद हो गया, सामान के नाम पर कुछ नहीं बचा। खाने को कभी-कभार कुछ मिल जाता है, लेकिन हमारे गाँव में अभी तक किसी को एक तिरपाल तक नहीं मिली है। हम लोग भीगते हुए सड़क किनारे रहने को मजबूर हैं। यह बारिश बहुत डरावनी है। पहाड़ कभी भी गिर सकते हैं। पता नहीं यहाँ कोई ज़िंदा बचेगा भी या नहीं। पता कागजात, बिस्तर, बकरियाँ, मुर्गियाँ सब ख़त्म हो गया। डर के मारे रात भर नींद नहीं आती, बस एक-दूसरे का चेहरा देखते रहते हैं। सरकार की तरफ से अभी तक कोई कैंप या सुरक्षित स्थान की व्यवस्था नहीं की गई है। जब पानी बढ़ा तो जो भाग सके वो बागान की फैक्ट्री में छिप गए, और जो फँस गए वो छतों पर बैठे रहे। अब सर्दी, बुख़ार, सिरदर्द और हाथ-पैरों के दर्द से सबका बुरा हाल है।"
सीमा ने रोते हुए कहा, "इस बाढ़ ने हमें 20 साल पीछे ढकेल दिया है। जो कुछ भी कमाया था सब ख़त्म हो गया, अब फिर से ₹1 से शुरुआत करनी पड़ेगी। पहले जैसी स्थिति बनाने में कम से कम 20 साल लग जाएँगे। हमारे सारे जानवर मर गए। तीन बकरियाँ और सात मुर्गियाँ थीं, सब पानी में बह गईं। किसी को अंदाज़ा ही नहीं था कि रातों-रात ऐसा भयानक मंज़र आ जाएगा।"
"हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत इस वक्त रहने के लिए तिरपाल की है"
मधुगिरी नामक महिला ने कहा, "सामान या सूखा राशन मिल भी जाए तो हम बनाएँगे कहाँ? ना बर्तन हैं, ना गैस है और ना चूल्हा। अगर बाहर चूल्हा बना भी लें, तो बारिश में सूखी लकड़ी कहाँ से लाएँ? गैस और चूल्हा सब बाढ़ में बह चुका है। शाम को जब कोई संस्था या लोग आकर खिचड़ी या पका हुआ खाना बाँटते हैं, तब जाके पेट भरता है। हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत इस वक्त रहने के लिए तिरपाल की है, जो अभी तक सबको नहीं मिल पाई है। मेरे तीन छोटे-छोटे बच्चे हैं, सबसे छोटा 3 साल का है... वहीं ज़मीन पर सोया हुआ है। क्या कहें, ऐसा दिन ईश्वर किसी को न दिखाए। अब डर इस बात का है कि पानी फिर से बढ़ रहा है, अगर पानी और बढ़ा तो हम अपने मासूम बच्चों को लेकर कहाँ जाएँगे?"
"76 साल बाद ऐसा मंज़र दोबारा देखने को मिला"
इलियास नाम के 65 वर्षीय बुज़ुर्ग ग्रामीण का कहना है, "मेरी उम्र 65 साल है। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में ऐसी भयंकर बाढ़ नहीं देखी। हमारे बुजुर्ग बताते थे कि 1950 में ऐसी बाढ़ आई थी यानी पूरे 76 साल बाद ऐसा मंज़र दोबारा देखने को मिला है। सुना है कि पीछे बाँध के गेट खोल दिए गए थे, इसी वजह से इतना पानी अचानक आ गया। लोगों को सामान हटाने तक का मौका नहीं मिला, सबने सोचा कि हर साल की तरह थोड़ा पानी आएगा और निकल जाएगा। सिलेंडर से लेकर घर का सारा सामान बह गया।"