इस बार असम की बाढ़ अलग क्यों है? 60 साल में पहली बार बदला बाढ़ का नक्शा, जानिए वजह
असम में हर साल बाढ़ आती है। ब्रह्मपुत्र नदी यहाँ के लोगों के लिए जीवनरेखा भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी। लेकिन 2026 की बाढ़ कई मायनों में अलग है। इस बार सिर्फ़ पानी ज़्यादा नहीं आया, बल्कि बाढ़ उन इलाकों तक भी पहुँच गई जहाँ पहले बड़े पैमाने पर जलभराव कम होता था। इस बार की बाढ़ सिर्फ़ भारी बारिश का नतीजा नहीं है। जलवायु परिवर्तन, पहाड़ों में बढ़ती मानवीय गतिविधियाँ और नदियों में लगातार जमा हो रही गाद ने मिलकर हालात को और गंभीर बना दिया है। असम में अब तक 70 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।
क़रीब 7 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं, जबकि 1.5 लाख लोगों को अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में जाना पड़ा है। राज्य के 800 से अधिक गाँव पानी में डूब चुके हैं। राहत और बचाव कार्य भी आसान नहीं हैं। कई नदियों में गाद (सिल्ट) जमा होने से नाव चलाने में दिक्कत आ रही है। यही वजह है कि कई प्रभावित गाँवों तक राहत पहुँचाने में देरी हो रही है।
इस बार ऊपरी असम भी बाढ़ की चपेट में
अब तक असम में बाढ़ का सबसे ज़्यादा असर निचले इलाक़ों में देखने को मिलता था। लेकिन इस बार ज़ोरहाट, शिवसागर और चराइदेव जैसे ऊपरी असम के ज़िले भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इन इलाक़ों को पहले अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता था। इसलिए यहाँ बड़े स्तर की बाढ़ से निपटने की तैयारी भी सीमित थी। विशेषज्ञ इसे असम की बदलती "फ़्लड जियोग्राफ़ी" यानी बाढ़ के बदलते भौगोलिक स्वरूप का संकेत मान रहे हैं।
आख़िर इतनी बड़ी बाढ़ क्यों आई?
इस बार असम और नागालैंड के कई हिस्सों में सामान्य से कई गुना ज़्यादा बारिश हुई। कुछ जगहों पर बारिश 400 से 490 प्रतिशत तक अधिक दर्ज की गई। नागालैंड के पहाड़ी इलाक़ों में हुई भारी बारिश का पानी तेज़ी से नीचे की ओर आया। इससे धनसिरी, दाओ और डांग जैसी सहायक नदियाँ उफ़ान पर आ गईं। उधर, ब्रह्मपुत्र नदी पहले से ही पानी और गाद से भरी हुई थी। ऐसे में सहायक नदियों का अतिरिक्त पानी उसमें समा नहीं पाया और बड़े इलाक़े में बाढ़ फैल गई। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, लगातार सक्रिय मौसम प्रणाली और लगातार बारिश के कारण पूरे जलग्रहण क्षेत्र की मिट्टी पानी से पूरी तरह भर गई थी। इसके बाद होने वाली बारिश सीधे नदियों में पहुँचती रही, जिससे जलस्तर तेज़ी से बढ़ गया।
सिर्फ़ बारिश नहीं, इंसानी गतिविधियाँ भी ज़िम्मेदार
विशेषज्ञों का कहना है कि कई मानवीय गतिविधियाँ भी बाढ़ की समस्या को बढ़ा रही हैं। इनमें शामिल हैं-
- पहाड़ों में खनन और अत्यधिक खुदाई
- बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई
- नदियों में तेज़ी से बढ़ती गाद
- कुछ जलविद्युत परियोजनाओं से भारी बारिश के दौरान पानी छोड़ा जाना
इन कारणों से नदियों की पानी समेटने की क्षमता कम होती जा रही है और बाढ़ का ख़तरा बढ़ रहा है।
क्या यह असम की सबसे बड़ी बाढ़ है? नहीं।
अगर प्रभावित आबादी की बात करें तो 2022 की बाढ़ इससे कहीं बड़ी थी। उस समय क़रीब 55 लाख लोग प्रभावित हुए थे। लेकिन 2026 की बाढ़ इसलिए ज़्यादा चिंता की बात है क्योंकि इस बार बाढ़ का दायरा बदल गया है। जिन इलाक़ों को अब तक सुरक्षित माना जाता था, वे भी अब ख़तरे की ज़द में आ गए हैं।
राहत कार्यों के सामने क्या चुनौतियाँ हैं?
बाढ़ प्रभावित इलाक़ों तक पहुँचना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। नदियों में गाद जमा होने से नाव चलाने में परेशानी हो रही है। कई गाँवों का संपर्क पूरी तरह टूट गया है। वहीं लगातार बदलते मौसम के कारण बाढ़ का सटीक पूर्वानुमान लगाना भी प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है।
आगे क्या करना होगा?
हर साल सिर्फ़ राहत और मुआवज़ा देना स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए पूरे नदी बेसिन को ध्यान में रखकर योजना बनानी होगी। वेटलैंड (आर्द्रभूमि) को बचाना, जंगलों का संरक्षण, नदियों के प्राकृतिक बहाव को बनाए रखना और असम के पारंपरिक 'चांग घर' जैसे बाढ़-रोधी घरों को बढ़ावा देना ज़रूरी होगा। असम की 2026 की बाढ़ एक चेतावनी है। यह बताती है कि जलवायु परिवर्तन और प्रकृति में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के कारण बाढ़ का स्वरूप बदल रहा है। अगर समय रहते नदी तंत्र, जंगलों और जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण पर गंभीरता से काम नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में ऐसी बाढ़ें और ज़्यादा विनाशकारी हो सकती हैं।