भारत में इस खतरनाक खरपतवारनाशक रसायन पर बैन की तैयारी, सरकार ने जारी किया ड्राफ्ट आदेश, 70 देशों में है प्रतिबंधित
केंद्र सरकार ने लंबे समय से विवादों में रहे खरपतवारनाशी रसायन (हर्बीसाइड0 पैराक्वॉट डाइक्लोराइड पर देशभर में पूर्ण बैन लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने इस संबंध में गज़ट में ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है। इसमें पैराक्वॉट डाइक्लोराइड के इम्पोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग, ट्रांसपोर्ट, डिस्ट्रीब्यूशन, बिक्री और इस्तेमाल पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। इस ड्राफ्ट पर सरकार ने अगले 30 दिनों तक आम लोगों और सभी स्टेकहोल्डर्स से आपत्तियाँ और सुझाव मांगे हैं।
सरकार ने यह कदम एक्सपर्ट कमेटी और कीटनाशी अधिनियम, 1968 के तहत गठित रजिस्ट्रेशन कमेटी की सिफारिशों के आधार पर उठाया है। कमेटी ने हेल्थ रिस्क, लगातार पॉइज़निंग की घटनाओं, अधिक मौतों, किसी प्रभावी एंटीडोट के उपलब्ध नहीं होने और इसके बढ़ते मिसयूज़ को देखते हुए पैराक्वॉट डाइक्लोराइड पर तत्काल पूर्ण बैन लगाने की सिफारिश की है। सरकार का कहना है कि इंसानों और पशुओं की सुरक्षा को देखते हुए यह कार्रवाई ज़रूरी है।
70 से ज्यादा देशों में पहले से बैन, भारत में भी एक्सपर्ट कमेटी ने जताई चिंता
गज़ट नोटिफिकेशन के मुताबिक, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 14 जनवरी 2026 को भारत में रजिस्टर्ड पैराक्वॉट डाइक्लोराइड के लगातार इस्तेमाल की समीक्षा के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई थी। कमेटी ने विस्तृत जांच के बाद 12 जून 2026 को अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी। इसके बाद सरकार ने कीटनाशी अधिनियम, 1968 की धारा 5 के तहत गठित रजिस्ट्रेशन कमेटी से भी सलाह ली।
रजिस्ट्रेशन कमेटी ने उपलब्ध स्टडी, डेटा और सेफ्टी से जुड़े पहलुओं की समीक्षा करते हुए बताया कि पैराक्वॉट डाइक्लोराइड पर दुनिया के 70 से अधिक देशों में या तो पूरी तरह बैन लगाया जा चुका है या इसके इस्तेमाल पर कड़ी पाबंदियाँ हैं। इनमें यूरोपीय यूनियन, यूनाइटेड किंगडम, स्विट्ज़रलैंड और चीन जैसे देश शामिल हैं।
कमेटी ने हेल्थ पर गंभीर असर, लगातार पॉइज़निंग के मामले, अधिक मौतों और किसी प्रभावी एंटीडोट के नहीं होने जैसी चिंताओं का भी ज़िक्र किया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि भारत में पैराक्वॉट का इस्तेमाल आधिकारिक तौर पर केवल नौ फसलों चाय, आलू, कपास, रबर, कॉफी, धान, मक्का, गेहूँ और अंगूर में ही मंजूर था। हालांकि, कई राज्यों में इसके ऑफ-लेबल इस्तेमाल की शिकायतें भी सामने आईं। राजस्थान और मध्य प्रदेश समेत कुछ राज्यों में मूंग की खड़ी फसल को कटाई से पहले जल्दी सुखाने के लिए इसका इस्तेमाल किए जाने की रिपोर्ट मिली, जिससे खाद्य श्रृंखला में इसके अवशेष पहुँचने का खतरा बढ़ गया। कई राज्यों ने पहले भी इस पर रोक लगाने की कोशिश की थी, लेकिन कानूनी और तकनीकी कारणों से वे पूरी तरह सफल नहीं हो सके।
फाइनल नोटिफिकेशन के बाद इम्पोर्ट से लेकर इस्तेमाल तक सब होगा अवैध
सरकार ने स्पष्ट किया है कि कीटनाशी अधिनियम, 1968 की धारा 27(2) और धारा 28 के तहत प्रस्तावित 'पैराक्वॉट डाइक्लोराइड (प्रतिबंध) आदेश, 2026' के ड्राफ्ट पर 30 दिनों तक मिलने वाली सभी आपत्तियों और सुझावों पर विचार किया जाएगा। इच्छुक व्यक्ति अपने सुझाव संयुक्त सचिव (प्लांट प्रोटेक्शन), कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, कृषि भवन, नई दिल्ली-110001 को भेज सकते हैं।
फाइनल नोटिफिकेशन लागू होने के बाद पैराक्वॉट डाइक्लोराइड का इम्पोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग, ट्रांसपोर्ट, डिस्ट्रीब्यूशन, बिक्री और इस्तेमाल पूरी तरह अवैध हो जाएगा। रजिस्ट्रेशन कमेटी इस रसायन से जुड़े सभी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट वापस लेगी। जिन कंपनियों या डीलरों के पास वैध रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट हैं, उन्हें तीन महीने के भीतर उन्हें जमा करना होगा। ऐसा नहीं करने पर कीटनाशी अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा धारा 9 के तहत जारी सभी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट स्वतः रद्द माने जाएंगे। राज्य सरकारों को भी निरीक्षण और कानूनी कार्रवाई के ज़रिए इस आदेश को लागू कराने की जिम्मेदारी दी जाएगी।
सरकार का मानना है कि इस ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के ज़रिए पैराक्वॉट डाइक्लोराइड से जुड़े हेल्थ और सेफ्टी रिस्क को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। फिलहाल यह प्रस्ताव केवल पैराक्वॉट डाइक्लोराइड तक सीमित है और अन्य कीटनाशकों पर कोई फैसला इस नोटिफिकेशन में शामिल नहीं किया गया है।
किसानों पर क्या असर पड़ेगा?
- पैराक्वॉट डाइक्लोराइड का इस्तेमाल बंद करना होगा। जिन किसानों ने इसे खरपतवार नियंत्रण के लिए अपनाया हुआ है, उन्हें दूसरे हर्बीसाइड या वैकल्पिक खरपतवार प्रबंधन तरीके अपनाने होंगे।
- शुरुआत में लागत बढ़ सकती है। वैकल्पिक हर्बीसाइड या मैकेनिकल वीडिंग (निराई-गुड़ाई) कुछ मामलों में अधिक महंगी पड़ सकती है।
- फसल प्रबंधन में बदलाव करना होगा। चाय, आलू, कपास, रबर, कॉफी, धान, मक्का, गेहूँ और अंगूर जैसी फसलों के किसानों को नए खरपतवार नियंत्रण कार्यक्रम अपनाने पड़ेंगे, क्योंकि इन्हीं नौ फसलों में पैराक्वॉट के उपयोग की अनुमति थी।
- मूंग जैसी फसलों में कटाई से पहले छिड़काव बंद होगा। कुछ राज्यों में फसल जल्दी सुखाने के लिए इसके कथित दुरुपयोग की शिकायतें थीं। प्रतिबंध के बाद ऐसी प्रथा पर रोक लगेगी।
- स्वास्थ्य जोखिम कम हो सकते हैं। पैराक्वॉट बेहद विषैला रसायन है और इसका कोई प्रभावी एंटीडोट नहीं है। प्रतिबंध लागू होने पर किसानों, खेतिहर मज़दूरों और छिड़काव करने वाले लोगों के ज़हरीले संपर्क का जोखिम घट सकता है।
- निर्यात को भी अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। कई देशों में पैराक्वॉट पहले से प्रतिबंधित है। इसके अवशेषों को लेकर सख्ती रहती है, इसलिए प्रतिबंध से भारतीय कृषि उत्पादों की स्वीकार्यता बढ़ने में मदद मिल सकती है।
क्या पैराक्वॉट पर प्रतिबंध सिर्फ शुरुआत है?
भारत में अभी भी कई ऐसे एग्रोकेमिकल्स के इस्तेमाल की अनुमति है, जिन्हें कैंसर के खतरे, न्यूरोटॉक्सिसिटी, प्रजनन क्षमता पर असर या पर्यावरण को नुकसान जैसी चिंताओं के कारण कई देशों में प्रतिबंधित या कड़े नियंत्रण के दायरे में रखा जा चुका है। ऐसे कई रसायन, जिनके अवशेष मिलने पर यूरोप भारतीय कृषि उत्पादों की खेप तक अस्वीकार कर देता है, उनका उपयोग देश में अब भी जारी है। पैराक्वॉट के अलावा ग्लाइफोसेट, 2,4-डी, डाइमेथोएट और एसीफेट जैसे कीटनाशकों के इस्तेमाल की अनुमति भी भारत में बनी हुई है, जबकि कई देशों में इन पर प्रतिबंध, कड़ी पाबंदियाँ या स्वास्थ्य एवं पर्यावरण संबंधी गंभीर चिंताओं के चलते सख्त नियमन लागू है।
हालांकि, प्रत्येक कीटनाशक का अपना अलग वैज्ञानिक आधार, नियामकीय इतिहास और जोखिम प्रोफाइल है। इसलिए पैराक्वॉट पर प्रस्तावित प्रतिबंध का मतलब यह नहीं है कि अन्य सभी कीटनाशकों पर भी स्वतः कार्रवाई होगी। लेकिन यह संकेत ज़रूर मिलता है कि भारतीय नियामक अब नए वैज्ञानिक प्रमाणों, दुरुपयोग के मामलों और जनस्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं के आधार पर पुराने अनुमोदनों की भी दोबारा समीक्षा करने के लिए तैयार हैं।
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