Extreme Heat Crisis: 2050 तक बढ़ती गर्मी के कारण शारीरिक एक्टिविटी हो जाएगी धीमी, हर साल बढ़ सकती हैं 7 लाख मौतें

Preeti Nahar | Apr 01, 2026, 17:32 IST
Image credit : Gaon Connection Network
गर्मी का बढ़ता स्तर अब एक बहुत बड़ा स्वास्थ्य और आर्थिक संकट बन गया है। 2050 तक तापमान में वृद्धि से गतिशीलता कम होगी, जिससे मृत्यु दर में भी वृद्धि हो सकती है। गरीब देशों पर इसका सबसे बुरा प्रभाव पड़ेगा। भारत में भी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का सामना करना पड़ेगा।
जलवायु परिवर्तन और आर्थिक नुकसान

बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं रही, बल्कि एक बड़ा स्वास्थ्य और आर्थिक संकट बनती जा रही है। मेडिकल जर्नल The Lancet Global Health में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, 2050 तक तापमान बढ़ने से लोगों की शारीरिक गतिविधियां कम होंगी, जिससे हर साल करीब 7 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और गर्म देशों पर पड़ेगा।



घटेगी शारीरिक गतिविधियाँ

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अध्ययन बताता है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, लोगों के लिए बाहर चलना, दौड़ना या व्यायाम करना मुश्किल होता जाएगा। लोग गर्मी से बचने के लिए घरों में ज्यादा समय बिताएंगे, जिससे उनकी शारीरिक गतिविधि घटेगी। पहले से ही दुनिया में लगभग 27% लोग पर्याप्त व्यायाम नहीं करते—और गर्मी इस समस्या को और गंभीर बना सकती है।



लाइफस्टाइल बीमारियों में बढ़ोतरी

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शारीरिक गतिविधि में कमी का सीधा असर स्वास्थ्य पर पड़ेगा। इससे दिल की बीमारियाँ, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और तनाव जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ सकती हैं। यह धीरे-धीरे एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है। इस अध्ययन में 2000 से 2022 तक 156 देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। जिसमें सामने आया कि दक्षिण एशिया, पूर्वी सब-सहारा अफ्रीका, कैरिबियन और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे गर्म इलाकों में इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। यहाँ तापमान 27.8°C से ऊपर रहने पर शारीरिक सक्रियता में 4% तक गिरावट आ सकती है।



भारत पर संभावित और आर्थिक प्रभाव

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भारत में भी स्थिति चिंताजनक हो सकती है। अनुमान है कि 2050 तक शारीरिक गतिविधियों में करीब 2% अतिरिक्त गिरावट आ सकती है, जिससे लाइफस्टाइल बीमारियों का खतरा बढ़ेगा। World Health Organization के अनुसार, स्वस्थ रहने के लिए हर व्यक्ति को सप्ताह में कम से कम 150 मिनट हल्का व्यायाम या 75 मिनट तेज व्यायाम जरूरी है। गर्मी का असर सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहेगा। काम के घंटे कम होने और उत्पादकता घटने से हर साल करीब 368 करोड़ डॉलर का नुकसान हो सकता है। इसमें सबसे ज्यादा बोझ मध्यम आय वाले देशों पर पड़ेगा, जो कुल नुकसान का लगभग 54.8% झेलेंगे।



रोजगार और काम पर असर

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International Labour Organization के अनुसार, 2030 तक बढ़ती गर्मी के कारण दुनिया भर में काम के कुल घंटों का 2.2% हिस्सा खत्म हो सकता है-जो करीब 8 करोड़ फुल-टाइम नौकरियों के बराबर है। कृषि और निर्माण जैसे क्षेत्रों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। अध्ययन में पाया गया कि यदि किसी महीने औसत तापमान 27.8°C से ऊपर रहता है, तो शारीरिक गतिविधि में कमी के मामलों में 1.5% तक बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं, कमजोर और मध्यम आय वाले देशों में यह असर 1.85% तक पहुँच सकता है।



क्या होगा समाधान?

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विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से बचने के लिए तुरंत कदम उठाने जरूरी हैं। शहरों में हरियाली बढ़ाना, ठंडी छतें बनाना, छायादार स्थान विकसित करना और सस्ते इनडोर व्यायाम केंद्र बनाना बेहद जरूरी है। साथ ही Greenhouse Gas Emissions को कम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।



बदलती गर्मी, बदलती जिंदगी

जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारी सेहत, रोजगार और रोजमर्रा की जिंदगी को सीधे प्रभावित कर रहा है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में इसका असर और भी गंभीर रूप में सामने आएगा।

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