Cervical Cancer: एक टीका कैसे बचा सकता है लाखों महिलाओं की ज़िदगी?
दुनियाभर में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर कई चुनौतियां सामने आ रही हैं, लेकिन 'सर्वाइकल कैंसर' यानी गर्भाशय के मुख का कैंसर एक ऐसी गंभीर बीमारी बनकर उभरा है, जो खामोशी से घरों की खुशियां छीन रहा है। साल 2022 के आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में करीब 6,60,000 महिलाएं इस कैंसर की चपेट में आईं और लगभग 3,50,000 महिलाओं ने अपनी जान गंवा दी। सबसे दुखद बात यह है कि इन मौतों में से 94% मामले भारत जैसे कम और मध्यम आय वाले देशों के हैं। यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि उन हजारों बच्चों की कहानी है जिन्होंने अपनी माँ को खो दिया। रिपोर्ट कहती है कि कैंसर से अपनी माँ को खोने वाले हर 5 में से 1 बच्चा सर्वाइकल कैंसर की वजह से अनाथ होता है। यह बीमारी अमीर-गरीब का भेद नहीं करती, लेकिन संसाधनों की कमी और जानकारी के अभाव में ग्रामीण महिलाएं इसकी सबसे बड़ी शिकार बन रही हैं।
क्या है इसका मुख्य कारण?
सर्वाइकल कैंसर का सबसे बड़ा कारण एक वायरस है, जिसे ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) कहा जाता है। यह एक बहुत ही सामान्य संक्रमण है जो त्वचा और जननांगों के संपर्क से फैलता है। लगभग हर यौन सक्रिय व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी इस वायरस के संपर्क में आता है। ज्यादातर मामलों में, हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) इस वायरस को खुद ही खत्म कर देती है और हमें पता भी नहीं चलता। लेकिन, कुछ महिलाओं के शरीर में यह वायरस सालों तक घर बना लेता है। जब यह संक्रमण 'परसिस्टेंट' यानी जिद्दी हो जाता है, तो यह गर्भाशय के मुख की कोशिकाओं को धीरे-धीरे बदलने लगता है। इन कोशिकाओं को सामान्य से कैंसर बनने में आमतौर पर 15 से 20 साल का समय लगता है। हालांकि, जिन महिलाओं की इम्यूनिटी कमजोर है या जो HIV से पीड़ित हैं, उनमें यह प्रक्रिया मात्र 5 से 10 साल में पूरी हो सकती है।
खतरे के निशान और लक्षण
ग्रामीण इलाकों में अक्सर महिलाएं अपनी शारीरिक तकलीफों को 'शर्म' या 'मामूली दर्द' समझकर छिपा लेती हैं। सर्वाइकल कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती दौर में इसके कोई खास लक्षण नहीं दिखते। लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, शरीर संकेत देने लगता है। अगर किसी महिला को दो माहवारी के बीच में अचानक खून आए, मेनोपॉज (महीना बंद होने) के बाद भी ब्लीडिंग हो, या शारीरिक संबंध बनाने के बाद खून निकले, तो इसे कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके अलावा, योनि से बदबूदार सफेद पानी आना, पेडू (Pelvis) में लगातार दर्द रहना, पैरों में सूजन, बिना वजह वजन कम होना और थकान महसूस होना भी इस बीमारी के लक्षण हो सकते हैं। गाँव-देहात में अक्सर इसे 'ल्यूकोरिया' समझकर घरेलू नुस्खों में वक्त बर्बाद किया जाता है, जो बाद में जानलेवा साबित होता है।
क्यों ज़रूरी है टीका लगवाना?
इस पर लखनऊ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. गीता द्विवेदी का मानना है कि सर्वाइकल कैंसर को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है, और इसकी पहली चाबी है HPV वैक्सीन। यह टीका 9 से 14 साल की लड़कियों के लिए सबसे ज्यादा असरदार है। अगर लड़कियों को यौन सक्रिय होने से पहले यह टीका लग जाए, तो भविष्य में उन्हें इस कैंसर का खतरा न के बराबर रह जाता है। दुनिया के कई देशों में लड़कों को भी यह टीका लगाया जा रहा है ताकि वायरस के फैलने की चेन को तोड़ा जा सके। भारत सरकार भी अब स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों के जरिए इस टीके को बढ़ावा दे रही है। यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ एक टीका नहीं, बल्कि बेटी के सुरक्षित भविष्य का निवेश है।
स्क्रीनिंग है ज़रूरी
टीकाकरण के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कदम है 'स्क्रीनिंग' यानी समय-समय पर जाँच। 30 साल से ऊपर की हर महिला को, चाहे उसने टीका लगवाया हो या नहीं, हर 5 से 10 साल में एक बार जाँच करानी चाहिए। जो महिलाएं HIV के साथ जी रही हैं, उन्हें 25 साल की उम्र से ही हर 3 से 5 साल में जाँच करानी चाहिए। आजकल 'सेल्फ-सैंपल' की सुविधा भी उपलब्ध है, जिसमें महिला खुद नमूना ले सकती है, जिससे अस्पताल जाने की हिचक दूर होती है। अगर जाँच में कोई 'प्री-कैंसर' (कैंसर से पहले की स्थिति) लक्षण मिलते हैं, तो उसका इलाज बहुत आसान, सस्ता और सुरक्षित है। थर्मल एब्लेशन या क्रायोथेरेपी जैसी तकनीकों से उन खराब कोशिकाओं को वहीं खत्म किया जा सकता है, जिससे कैंसर बनने की नौबत ही नहीं आती।
अन्य बचाव के तरीके
कैंसर से बचने के लिए सिर्फ डॉक्टरी सलाह ही काफी नहीं, बल्कि जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी है। धूम्रपान या बीड़ी-सिगरेट का सेवन इस कैंसर के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है, क्योंकि तंबाकू के तत्व वायरस को और भी खतरनाक बना देते हैं। इसके अलावा, कम उम्र में शादी और कम अंतराल में कई बच्चों का होना भी गर्भाशय पर दबाव डालता है। पुरुषों का खतना (Circumcision) और कंडोम का इस्तेमाल भी इस वायरस के प्रसार को कम करने में मदद करता है। सबसे जरूरी है 'स्वच्छता'। माहवारी के दौरान साफ कपड़ों या पैड का इस्तेमाल और व्यक्तिगत साफ-सफाई इस बीमारी को दूर रखने में बड़ी भूमिका निभाती है।
सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने साल 2030 तक सर्वाइकल कैंसर को खत्म करने के लिए '90-70-90' का लक्ष्य रखा है। इसका मतलब है कि 90% लड़कियों को 15 साल की उम्र तक टीका लग जाए, 70% महिलाओं की 35 और 45 साल की उम्र में कम से कम दो बार जाँच हो, और 90% बीमार महिलाओं को सही समय पर इलाज मिले। भारत सरकार भी अपनी स्वास्थ्य नीतियों में इसे प्राथमिकता दे रही है। हर साल 17 नवंबर को 'विश्व सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन दिवस' मनाया जाता है ताकि गाँव-गाँव तक यह संदेश पहुंचे कि यह कैंसर लाइलाज नहीं है।सर्वाइकल कैंसर से लड़ाई सिर्फ डॉक्टरों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। जब तक हम 'शर्म' का पर्दा हटाकर स्वास्थ्य पर खुलकर बात नहीं करेंगे, तब तक मौत के ये आंकड़े कम नहीं होंगे। अगर हम अपनी बेटियों को सही समय पर टीका लगवाएं और घर की महिलाओं की नियमित जाँच सुनिश्चित करें, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत सर्वाइकल कैंसर मुक्त होगा।