NFHS-6: MP में कुपोषण की तस्वीर चिंताजनक, हर तीसरा बच्चा ठिगना, हर चौथा दुबला; ग्रामीण इलाकों में स्थिति गंभीर
मध्य प्रदेश में मां और बच्चों की स्वास्थ्य सेवाओं में पहले के मुकाबले सुधार जरूर हुआ है, लेकिन बच्चों के पोषण की स्थिति अब भी चिंता पैदा करती है। NFHS-6 (2023-24) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि राज्य के कई बच्चे आज भी पर्याप्त पोषण से वंचित हैं। खासकर कम वजन और दुबलेपन की समस्या बढ़ी है। NFHS-6 (2023-24) के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में हर तीन में एक बच्चा ठिगनेपन (Stunting) और लगभग हर 10 में 4 बच्चे कम वजन (Underweight) की समस्या से जूझ रहे हैं। यह संकेत है कि विकास के दावों के बावजूद कुपोषण की चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है जो इस बात का संकेत है कि लाखों बच्चों को उनकी उम्र और जरूरत के अनुसार सही भोजन नहीं मिल पा रहा। ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं, बल्कि उन बच्चों के भविष्य की कहानी हैं, जिनका शारीरिक और मानसिक विकास कुपोषण की वजह से प्रभावित हो सकता है।
जन्म के बाद स्तनपान में सुधार, लेकिन छह माह तक केवल स्तनपान में गिरावट
सर्वेक्षण के अनुसार, मध्य प्रदेश में 49.9 प्रतिशत बच्चों को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराया गया, जो पिछले सर्वेक्षण (साल 2019-21) के 41.3 प्रतिशत के मुकाबले बेहतर स्थिति दर्शाता है। वहीं, छह महीने से कम उम्र के 97.4 प्रतिशत बच्चों को किसी न किसी रूप में स्तनपान मिल रहा है। हालांकि, केवल छह महीने तक विशेष स्तनपान (Exclusive Breastfeeding) कराने की दर घटकर 56.4 प्रतिशत रह गई है, जो NFHS-5 में 74 प्रतिशत थी। विशेषज्ञों का मानना है कि जीवन के पहले 1,000 दिन बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, इसलिए इस गिरावट को गंभीर संकेत माना जा रहा है।
पूरक आहार की स्थिति अब भी कमजोर
छह से आठ माह के बच्चों में केवल 58.3 प्रतिशत को समय पर पूरक आहार (Solid or Semi-solid Food) मिल रहा है। वहीं, छह से 23 माह आयु वर्ग के केवल 12 प्रतिशत बच्चों को न्यूनतम स्वीकार्य आहार (Minimum Acceptable Diet) मिल पा रहा है। इसका मतलब है कि लगभग 88 प्रतिशत बच्चों को उनकी उम्र के अनुरूप पर्याप्त और संतुलित भोजन नहीं मिल रहा। यही वजह है कि कुपोषण के कई संकेतकों में सुधार की गति बेहद धीमी बनी हुई है।
हर तीन में एक बच्चा ठिगना
एनएफएचएस-6 के अनुसार, मध्य प्रदेश में पांच वर्ष से कम आयु के 31.4 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग (Stunting) यानी उम्र के हिसाब से कम लंबाई की समस्या से ग्रस्त हैं। हालांकि यह आंकड़ा NFHS-5 के 35.7 प्रतिशत से कम है, लेकिन इसका अर्थ है कि राज्य में अब भी लगभग हर तीसरा बच्चा लंबे समय तक पोषण की कमी का सामना कर रहा है। आपको बता दें कि 24.5 प्रतिशत बच्चे शहरी इलकों से हैं जो उम्र के हिसाब से कम लंबाई से ग्रस्त है, वहीं ग्रामीण इलाकों के आंकड़ें चिंताजनक है। मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों के 33.2 प्रतिशत बच्चे पांच वर्ष से कम आयु के दर्ज किए गए हैं। आंकड़ें इसी लिए भी चिंताजनक हैं क्योंकि स्टंटिंग का असर बच्चे की सीखने की क्षमता, शारीरिक विकास और भविष्य की उत्पादकता पर पड़ सकता है।
दुबलापन और कम वजन बढ़ा
सर्वेक्षण का सबसे चिंताजनक पहलू बच्चों में बढ़ता दुबलापन (Wasting) और कम वजन है। राज्य में 23.8 प्रतिशत बच्चे वेस्टिंग के शिकार हैं, जबकि NFHS-5 में यह आंकड़ा 18.9 प्रतिशत था। इसी तरह कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत बढ़कर 39.7 हो गया है, जो पहले 33 प्रतिशत था। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी गंभीर है, जहां 42 प्रतिशत बच्चे कम वजन के पाए गए। ये आंकड़े संकेत देते हैं कि राज्य में तीव्र कुपोषण की समस्या अभी भी गहराई से मौजूद है।
गंभीर कुपोषण भी चिंता का विषय
राज्य में 6.8 प्रतिशत बच्चे गंभीर दुबलापन (Severe Wasting) से पीड़ित हैं। यह स्थिति बच्चों में संक्रमण, रोगों और मृत्यु के जोखिम को बढ़ाती है। वहीं, 0.6 प्रतिशत बच्चे अधिक वजन (Overweight) की श्रेणी में भी पाए गए, जो यह दर्शाता है कि मध्य प्रदेश अब "डबल बर्डन ऑफ मालन्यूट्रिशन" यानी कुपोषण और मोटापे दोनों की चुनौती का सामना कर रहा है।
ग्रामीण इलाकों में ज्यादा गंभीर स्थिति
एनएफएचएस-6 के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में पोषण संबंधी समस्याएं शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक गहरी हैं। ग्रामीण बच्चों में कम वजन, वेस्टिंग और स्टंटिंग की दर शहरी क्षेत्रों से अधिक है। पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि भोजन की उपलब्धता के साथ-साथ भोजन की गुणवत्ता और विविधता की कमी भी इस संकट का बड़ा कारण है।