चीन ने भारतीय चावल की खेपों को फिर लौटाया, GMO का आरोप बना विवाद की वजह

Gaon Connection | May 27, 2026, 12:33 IST
चीन ने भारतीय गैर-बासमती चावल की तीन खेपों को GMO की मौजूदगी का हवाला देकर अस्वीकार कर दिया, जबकि शिपमेंट से पहले इन्हें “नॉन-GMO” प्रमाणित किया गया था। भारतीय निर्यातकों ने APEDA और ICAR से आधिकारिक प्रमाणपत्र जारी करने की मांग की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम केवल गुणवत्ता जांच नहीं बल्कि व्यापारिक दबाव की रणनीति भी हो सकता है। इस विवाद से भारतीय चावल निर्यात पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है, वहीं निर्यातक सरकार से राजनयिक स्तर पर हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।

भारतीय चावल निर्यात को लेकर एक नया विवाद सामने आया है, जहाँ चीन ने भारत से भेजी गई गैर-बासमती चावल की कुछ खेपों को कथित GMO (जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म) मौजूद होने के आरोप में खारिज कर दिया। इस फैसले ने भारतीय निर्यातकों और कृषि क्षेत्र में चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि भारत में अब तक GMO चावल की व्यावसायिक खेती को मंजूरी नहीं मिली है। मामले ने दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों और निर्यात प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।



चीन द्वारा भारतीय गैर-बासमती चावल की तीन खेपों को कथित तौर पर GMO (Genetically Modified Organisms) की मौजूदगी का हवाला देकर खारिज किए जाने से भारत के चावल निर्यात क्षेत्र में चिंता बढ़ गई है। यह मामला इसलिए भी संवेदनशील बन गया है क्योंकि भारत में व्यावसायिक स्तर पर GMO चावल की खेती की अनुमति नहीं है।



पहले क्लियरेंस, फिर रिजेक्शन

आपको बता दें कि जिन चावल खेपों को चीन ने अस्वीकार किया, उन्हें शिपमेंट से पहले चीन की सरकारी एजेंसी China Certification & Inspection Group (CCIC) ने जाँच कर “नॉन-GMO” प्रमाणित किया था। इसके बावजूद चीन के कस्टम अधिकारियों ने बाद में इन खेपों को रोक दिया। इस घटनाक्रम ने भारतीय निर्यातकों के बीच सवाल खड़े कर दिए हैं कि जब चीन की ही एजेंसी ने माल को मंजूरी दी थी, तो बाद में आपत्ति क्यों उठाई गई।



भारत में GMO चावल की खेती नहीं

भारत सरकार अब तक केवल Bt Cotton को व्यावसायिक GMO फसल के रूप में अनुमति देती है। चावल सहित किसी भी खाद्य फसल की GMO खेती को मंजूरी नहीं मिली है। इसी वजह से निर्यातक चीन के आरोपों को तकनीकी या व्यापारिक दबाव की रणनीति मान रहे हैं।



निर्यातकों ने APEDA और ICAR से मांगी मदद

प्रभावित कंपनियों ने मामले को कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के सामने उठाया है। निर्यातकों की मांग है कि ICAR आधिकारिक रूप से यह प्रमाणपत्र जारी करे कि भारत में उगाया जाने वाला चावल नॉन-GMO है। नागपुर स्थित एक निर्यातक कंपनी ने कहा कि ऐसे प्रमाणपत्र की अनुपस्थिति के कारण चीन में क्लीयरेंस के दौरान दिक्कतें आ रही हैं।



व्यापारिक रणनीति होने की आशंका

व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का यह कदम केवल गुणवत्ता जाँच तक सीमित नहीं हो सकता। कुछ विशेषज्ञ इसे भारत के साथ व्यापार वार्ताओं में दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि चीन अन्य प्रमुख चावल निर्यातक देशों जैसे थाईलैंड, वियतनाम और पाकिस्तान से ऐसी “नॉन-GMO घोषणा” की मांग नहीं कर रहा है।



भारतीय चावल निर्यात पर पड़ सकता है असर

हालांकि चीन को भारत से होने वाला गैर-बासमती चावल निर्यात कुल निर्यात की तुलना में बहुत बड़ा हिस्सा नहीं है, लेकिन यह तेजी से बढ़ता बाजार माना जाता है। वर्ष 2024-25 में भारत ने चीन को लगभग 1.8 लाख टन गैर-बासमती चावल निर्यात किया था। निर्यातकों को डर है कि यदि चीन द्वारा लगाया गया GMO आरोप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलता है, तो अन्य देशों में भी भारतीय चावल की जाँच और सख्त हो सकती है।



चीन ने तीन भारतीय कंपनियों के लाइसेंस भी रोके

बाद में चीन ने तीन भारतीय चावल निर्यातक कंपनियों के आयात लाइसेंस भी निलंबित कर दिए। यह फैसला अप्रैल 2026 से प्रभावी बताया गया। उद्योग जगत ने इसे भारतीय चावल व्यापार के लिए बड़ा झटका माना है।



सरकार के हस्तक्षेप की उम्मीद

निर्यातक अब भारत सरकार और वाणिज्य मंत्रालय से उम्मीद कर रहे हैं कि यह मुद्दा चीन के साथ राजनयिक स्तर पर उठाया जाएगा ताकि भारतीय चावल निर्यातकों को भविष्य में ऐसी परेशानियों का सामना न करना पड़े।

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