Coconut Farming: 3 करोड़ लोगों की रोज़ी-रोटी से जुड़ा नारियल, 7,038 करोड़ रुपये तक पहुँचा एक्सपोर्ट
नारियल को यूं ही ‘कल्पवृक्ष’ नहीं कहा जाता। एक ही पेड़ से पानी, तेल, खाना, रेशा और कई तरह के दूसरे उत्पाद मिल जाते हैं। यही वजह है कि भारत के गाँवों में नारियल सिर्फ़ एक फ़सल नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की रोज़ी-रोटी का हिस्सा है। अब यही नारियल देश की कृषि अर्थव्यवस्था के साथ-साथ विदेशों में भी अपनी पहचान मज़बूत कर रहा है।
भारत दुनिया में नारियल उत्पादन के मामले में पहले स्थान पर है। करीब 1 करोड़ किसान और लगभग 3 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। अब नारियल की खेती को सिर्फ़ कच्चे नारियल की बिक्री तक सीमित रखने के बजाय तेल, नारियल पानी, नारियल दूध और एक्टिवेटेड कार्बन जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों से जोड़ने पर ज़ोर दिया जा रहा है। इससे किसानों और इससे जुड़े छोटे कारोबारियों के लिए कमाई के नए रास्ते खुल रहे हैं।
भारत दुनिया में नारियल उत्पादन में सबसे आगे
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के मुताबिक़, वर्ष 2024-25 में भारत में करीब 21.9 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में नारियल की खेती हुई और लगभग 20,301.22 मिलियन नारियल का उत्पादन हुआ। देश की औसत उत्पादकता करीब 9,249 नारियल प्रति हेक्टेयर रही। राज्यों की बात करें तो केरल में नारियल का सबसे बड़ा खेती क्षेत्र है, जबकि तमिलनाडु उत्पादन में आगे है। वहीं आंध्र प्रदेश में उत्पादकता सबसे अधिक दर्ज की गई है। यानी देश के अलग-अलग हिस्से नारियल की खेती में अपनी अलग भूमिका निभा रहे हैं।
नारियल अब सिर्फ़ खेत की फ़सल नहीं, कमाई का बड़ा ज़रिया
भारत में नारियल से जुड़े कारोबार ने पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से विस्तार किया है। पहले विदेशों में मुख्य रूप से नारियल तेल, सूखा नारियल, कोपरा और नारियल के खोल से जुड़े उत्पाद भेजे जाते थे। अब निर्यात में वर्जिन कोकोनट ऑयल, नारियल दूध, नारियल पानी और एक्टिवेटेड कार्बन जैसे उत्पाद भी शामिल हो गए हैं। वर्ष 2025-26 में भारत से नारियल उत्पादों का निर्यात बढ़कर 7,038.35 करोड़ रुपये हो गया। यह 2021-22 में दर्ज करीब 3,236.83 करोड़ रुपये के निर्यात कारोबार से काफ़ी अधिक है। भारतीय नारियल उत्पाद अब सिर्फ़ पारंपरिक बाज़ारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अमेरिका, यूरोप, यूएई, रूस, जर्मनी, ब्रिटेन और नीदरलैंड जैसे बाज़ारों में भी पहुँच रहे हैं।
बस्तर के किसान ने दिखाया नारियल की खेती का नया मॉडल
नारियल की खेती की संभावनाएं सिर्फ़ पारंपरिक नारियल उत्पादक राज्यों तक सीमित नहीं हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी किसानों ने इसे कमाई के विकल्प के रूप में अपनाना शुरू किया है। बकावंड के किसान ईशांश सिंह राठौर इसका उदाहरण हैं। किसान परिवार से आने वाले ईशांश ने कॉर्पोरेट नौकरी के बाद खेती का रुख़ किया। उन्होंने करीब 2,500 नारियल के पेड़ लगाए। इसके साथ ही एक ही खेत में अनानास, ड्रैगन फ्रूट, आम, सिट्रस, केला, अमरूद, पपीता, लीची, कॉफी और सब्ज़ियाँ उगाईं।
इस बहुस्तरीय खेती से उन्हें नारियल से सालाना करीब 5-6 लाख रुपये और अंतरफसलों से लगभग 10 लाख रुपये की अतिरिक्त आय हुई। यह मॉडल बताता है कि नारियल के बागान में दूसरी फ़सलों को शामिल करके किसान अपनी ज़मीन से मिलने वाली आमदनी को बढ़ा सकते हैं।
पुराने पेड़ों की जगह नए पौधे, खेती बढ़ाने पर भी ज़ोर
नारियल के पुराने और कम उत्पादन देने वाले बागानों को बेहतर बनाने के लिए भी योजनाएं चलाई जा रही हैं। वर्ष 2025-26 में करीब 1,672 हेक्टेयर क्षेत्र में नारियल के बागानों का जीर्णोद्धार किया गया। वहीं लगभग 2,175 हेक्टेयर नया क्षेत्र नारियल की खेती के तहत लाया गया। किसानों को नए क्षेत्रों में नारियल लगाने के लिए प्रति हेक्टेयर 56,000 रुपये तक की वित्तीय सहायता देने का प्रावधान है। वहीं मौजूदा बागानों की उत्पादकता सुधारने के लिए भी सहायता दी जाती है। इसका मक़सद सिर्फ़ पेड़ों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रति पेड़ उत्पादन और किसान की आमदनी में सुधार करना है।
कोपरा के एमएसपी से लेकर नई ‘नारियल संवर्धन योजना’ तक
नारियल किसानों को बेहतर दाम दिलाने के लिए कोपरा को न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था में शामिल किया गया है। वर्ष 2026 के लिए मिलिंग कोपरा का एमएसपी 12,027 रुपये प्रति क्विंटल और बॉल कोपरा का 12,500 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। इसके अलावा केंद्रीय बजट 2026-27 में ‘नारियल संवर्धन योजना’ की घोषणा की गई है। इसका फ़ोकस गुणवत्तापूर्ण पौध तैयार करने, नए क्षेत्रों में खेती बढ़ाने, पुराने बागानों को फिर से विकसित करने, कीट और रोग प्रबंधन तथा नारियल के प्रसंस्करण और निर्यात को बढ़ावा देने पर है।
'फ्रेंड्स ऑफ कोकोनट ट्री' से युवाओं को मिल रहा रोज़गार
नारियल के पेड़ों पर चढ़ना और उनकी देखभाल करना आसान काम नहीं है। इसी वजह से नारियल विकास बोर्ड लंबे समय से 'फ्रेंड्स ऑफ कोकोनट ट्री' (FoCT) कार्यक्रम चला रहा है। इसके तहत युवाओं को मशीनों की मदद से नारियल के पेड़ पर सुरक्षित तरीके से चढ़ने, पौधों की देखभाल, कीट-रोग-प्रबंधन और उद्यमिता से जुड़ा प्रशिक्षण दिया जाता है। वर्ष 2024-25 में देशभर में 378 युवाओं को पेढ़ पर चढ़ने का प्रशिक्षण दिया गया। इसका मकसद किसानों को समय पर कुशल श्रमिक उपलब्ध कराने के साथ युवाओं के लिए रोज़गार और स्वरोज़गार के अवसर बढ़ाना भी है।
आने वाले समय में नारियल की असली ताक़त सिर्फ़ इसके उत्पादन में नहीं, बल्कि एक ही फ़सल से कई तरह के उत्पाद और कमाई के रास्ते बनाने में होगी। अगर किसान खेती के साथ प्रसंस्करण, अंतरफसल और बेहतर बाज़ार से जुड़ते हैं, तो ‘कल्पवृक्ष’ उनके लिए सच में आमदनी का ऐसा ज़रिया बन सकता है, जिसका इस्तेमाल खेत से लेकर दुनिया के बाज़ार तक किया जा सके।