करोड़ों का निवेश, लेकिन कमाई शून्य: बाड़मेर में किसानों के लिए घाटे का सौदा बनी अंजीर की खेती

Lata Mishra | Jul 03, 2026, 17:36 IST
बाड़मेर के किसानों ने मुनाफे की आस में अंजीर की खेती शुरू की, पर बाजार, जानकारी और कोल्ड स्टोरेज की कमी से भारी घाटा उठाना पड़ा। लाखों-करोड़ों का निवेश डूब गया, और अब पौधे उखाड़ने पड़ रहे हैं। खेती में नवाचार तभी सफल होता है जब बाजार, सही मार्गदर्शन और सरकारी मदद मिले।

अधिक मुनाफे की उम्मीद हर किसान को नई फसलें अपनाने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन जब बाजार, तकनीकी जानकारी और सरकारी सहयोग साथ न हो, तो यही प्रयोग भारी आर्थिक नुकसान में बदल सकता है। राजस्थान के बाड़मेर जिले में अंजीर की खेती करने वाले कई किसानों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। चौहटन तहसील के मते का तला गांव के किसान मोहनलाल हुड्डा ने वर्ष 2022 में अपने 40 बीघा खेत में 6,000 अंजीर के पौधे लगाए। पौधों की खरीद, ड्रिप सिंचाई, सोलर ड्रायर और रखरखाव सहित उन्होंने करीब 1.5 करोड़ रुपये निवेश किए।



लेकिन आज स्थिति यह है कि उनके बगीचे से होने वाला उत्पादन बिक नहीं रहा और अधिकांश पौधे सूखने के लिए छोड़ दिए गए हैं। मोहनलाल बताते हैं कि उन्होंने 'डायना' किस्म के अंजीर लगाए, लेकिन बाद में पता चला कि यह किस्म मुख्य रूप से ताजे फल के रूप में बिकती है। इसकी शेल्फ लाइफ कम होती है और बिना मजबूत सप्लाई चेन के इसे दूर के बाजारों तक पहुंचाना मुश्किल है। उनके बगीचे से हर साल लगभग 1.20 लाख किलोग्राम अंजीर का उत्पादन होने की क्षमता है, लेकिन खरीदार नहीं मिलने के कारण उत्पादन खेत में ही खराब हो जाता है। मजबूर होकर उन्होंने 6,000 पौधों में से केवल 1,000 पौधों की देखभाल जारी रखी है।



बाजार नहीं, तो खेती कैसे चले?



बाड़मेर में न अंजीर की कोई संगठित मंडी है और न ही कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। ऐसे में जल्दी खराब होने वाले फलों को बड़े शहरों तक पहुंचाना किसानों के लिए बेहद महंगा और जोखिम भरा साबित हो रहा है। स्थानीय कृषि अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में निजी कंपनियों के एजेंट किसानों को अंजीर की खेती के लिए प्रेरित करते रहे। किसानों से बेहतर बाजार और खरीद की गारंटी का दावा किया गया, लेकिन फसल तैयार होने के बाद कई कंपनियां संपर्क से बाहर हो गईं।



पौधे बेचने के बाद गायब हो गई कंपनियां



नगाड़दा गांव के किसान भोमाराम हुड्डा बताते हैं कि उन्होंने 350 रुपये प्रति पौधा की दर से 1,000 अंजीर के पौधे लगाए थे। कंपनी ने बाजार उपलब्ध कराने का भरोसा दिया था, लेकिन जब उत्पादन शुरू हुआ तो न खरीदार मिले और न ही कंपनी का कोई प्रतिनिधि। मोहनलाल भी बताते हैं कि उनसे पहले 350 रुपये प्रति पौधा के हिसाब से सौदा करने की कोशिश की गई थी। बाद में जानकारी मिलने पर उन्होंने वह समझौता रद्द किया और हैदराबाद से करीब 40 रुपये प्रति पौधा की दर से पौधे खरीदे। लेकिन बाजार और तकनीकी जानकारी के अभाव में यह निवेश भी सफल नहीं हो सका।



खेती में नवाचार के साथ जरूरी है पूरी तैयारी



भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की कुछ तकनीकी जानकारियों में थार क्षेत्र में अंजीर की संभावनाओं का उल्लेख किया गया है। लेकिन किसानों का कहना है कि केवल जलवायु अनुकूल होना पर्याप्त नहीं है। यदि बाजार, प्रसंस्करण, भंडारण और खरीदारों की व्यवस्था नहीं होगी, तो खेती लाभदायक नहीं बन सकती। कृषि विभाग का कहना है कि उसने किसानों को अंजीर की खेती अपनाने की कोई आधिकारिक सलाह नहीं दी थी।



सीख क्या है?



बाड़मेर के किसानों का अनुभव बताता है कि खेती में नवाचार केवल नई फसल लगाने का नाम नहीं है। किसी भी नई फसल को अपनाने से पहले उसकी किस्म, स्थानीय जलवायु, बाजार, भंडारण, प्रसंस्करण और खरीदारों की उपलब्धता की पूरी जानकारी होना जरूरी है। वरना अधिक मुनाफे का सपना किसानों के लिए भारी आर्थिक नुकसान में बदल सकता है।



गाँव कनेक्शन के लिए बाड़मेर से कुलदीप छंगाणी की रिपोर्ट।

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