देश में खेती योग्य ज़मीन घटी, लेकिन फसलों का कुल रकबा बढ़ा; सरकार ने जारी किए आँकड़े
भारत में पिछले तीन वर्षों के दौरान खेती योग्य कुल ज़मीन (कृषि योग्य भूमि) में मामूली कमी दर्ज की गई है। हालांकि, इसके बावजूद देश में फसलों का कुल बोया गया रकबा (ग्रॉस क्रॉप्ड एरिया) लगातार बढ़ा है। केंद्र सरकार के अनुसार आधुनिक तकनीकों को अपनाने और विभिन्न नीतिगत कदमों के कारण किसान अब एक ही ज़मीन पर साल में एक से अधिक बार खेती कर रहे हैं। इससे फसल सघनता (क्रॉपिंग इंटेंसिटी) में बढ़ोतरी हुई है और कृषि उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने राज्यसभा में लिखित जवाब में भूमि उपयोग सांख्यिकी 2024-25 के आँकड़े साझा किए। उन्होंने बताया कि वर्ष 2024-25 में देश की कुल कृषि योग्य भूमि 179.43 मिलियन हेक्टेयर रही, जो 2023-24 में 179.77 मिलियन हेक्टेयर और 2022-23 में 179.98 मिलियन हेक्टेयर थी। वहीं, फसलों का कुल बोया गया रकबा 2014-15 के 198.28 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 2024-25 में 225.19 मिलियन हेक्टेयर हो गया।
खेती योग्य ज़मीन घटी, लेकिन फसल क्षेत्र बढ़ा
सरकार के अनुसार पिछले तीन वर्षों में खेती योग्य भूमि में हल्की गिरावट आई है, लेकिन किसानों द्वारा एक ही खेत में साल में कई बार खेती किए जाने से कुल बोया गया रकबा लगातार बढ़ा है। इससे कृषि उत्पादन क्षमता में भी सुधार हुआ है। रामनाथ ठाकुर ने बताया कि आधुनिक तकनीकों और प्रभावी सरकारी हस्तक्षेपों के कारण फसल सघनता 2014-15 के 142.2 प्रतिशत से बढ़कर 2024-25 में 159.7 प्रतिशत हो गई है। इसका मतलब है कि किसान अब एक ही भूमि पर पहले की तुलना में अधिक बार फसल उगा रहे हैं।
खाद्यान्न और बागवानी उत्पादन में बढ़ोतरी
सरकार के अनुसार खाद्यान्न उत्पादन 2014-15 के 252.02 मिलियन टन से बढ़कर 2025-26 के अग्रिम अनुमान के अनुसार 376.56 मिलियन टन हो गया है। वहीं, बागवानी उत्पादन भी 2014-15 के 280.98 मिलियन टन से बढ़कर 2025-26 के अग्रिम अनुमान के अनुसार 377.77 मिलियन टन पहुँच गया है।
मखाना उत्पादन के आँकड़े पहली बार दर्ज
रामनाथ ठाकुर ने एक अन्य प्रश्न के उत्तर में बताया कि कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की बागवानी सांख्यिकी इकाई ने 2024-25 से मखाना उत्पादन के आँकड़े दर्ज करना शुरू किया है। वर्ष 2024-25 में देश में 63,910 टन मखाने का उत्पादन हुआ, जबकि औसत उत्पादकता 2.03 टन प्रति हेक्टेयर रही। वहीं, 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार मखाना उत्पादन बढ़कर 80,590 टन हो गया और औसत उत्पादकता 2.34 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई।
सरकार के अनुसार 2025-26 में बिहार देश का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक राज्य रहा। राज्य में 60,000 टन मखाने का उत्पादन हुआ और औसत उत्पादकता 2 टन प्रति हेक्टेयर रही।
मखाना निर्यात के लिए अलग एचएसएन कोड
सरकार ने बताया कि वर्ष 2025 से पहले मखाना सामान्य हार्मोनाइज़्ड सिस्टम ऑफ़ नोमेनक्लेचर (एचएसएन) कोड के तहत दर्ज होता था, जिससे मखाना निर्यात का अलग आँकड़ा उपलब्ध नहीं था। इस समस्या को दूर करने के लिए वर्ष 2025 में विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफ़टी) ने फूले हुए मखाने और अन्य मखाना उत्पादों के लिए अलग एचएसएन कोड जारी किया।
इसके बाद वर्ष 2025-26 में भारत ने 7,264.89 टन मखाना उत्पादों का निर्यात किया, जिसकी कुल कीमत 192.96 करोड़ रुपये रही। इनमें बिहार से 39.20 टन मखाना उत्पादों का निर्यात हुआ, जिसकी कीमत 4.03 करोड़ रुपये दर्ज की गई।
मखाना उत्पादन बढ़ाने के लिए विकसित हुई नई तकनीकें
कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने एक अन्य प्रश्न के उत्तर में बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा ने मखाना उत्पादन बढ़ाने के लिए कई नई तकनीकें विकसित की हैं। केंद्र ने 'स्वर्णा वैदेही' नाम की अधिक उपज देने वाली मखाना किस्म विकसित की है, जिसकी औसत उत्पादन क्षमता 28 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह पारंपरिक खेती से मिलने वाली 14 से 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज का लगभग दोगुना है। इसके साथ बेहतर खेती के तरीकों का पूरा पैकेज भी तैयार किया गया है।
काँटारहित सिंघाड़ा और मखाना-मछली पालन मॉडल
आईसीएआर ने 'स्वर्णा हरित' और 'स्वर्णा लोहित' नाम की दो काँटारहित सिंघाड़ा किस्में भी विकसित की हैं। इनकी खेती मखाने की फसल कटने के बाद की जा सकती है। इससे एक ही ज़मीन का बेहतर उपयोग होगा, फसल सघनता बढ़ेगी और किसानों की आय में वृद्धि होगी। इसके अलावा मखाना-सह-मछली पालन प्रणाली भी विकसित की गई है। सरकार के अनुसार चौर भूमि में यह मॉडल अकेले मखाना खेती की तुलना में किसानों को 40 से 50 प्रतिशत तक अधिक आय दिलाने में प्रभावी साबित हुआ है।