गर्मी से हांफ रहा डेयरी सेक्टर, दूध उत्पादन में 30% तक गिरावट का खतरा! बढ़ी किसानों की लागत

Gaon Connection | Jun 02, 2026, 18:08 IST
भारत में रिकॉर्ड दूध उत्पादन के बावजूद भीषण गर्मी और जलवायु परिवर्तन डेयरी क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक गर्मी से दूध उत्पादन में 30 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। पशुओं को ठंडा रखने की बढ़ती लागत किसानों की आय पर दबाव डाल रही है। वैज्ञानिक गर्मी सहन करने वाली नस्लों और नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं।
गाय-भैंसों पर बढ़ता गर्मी का कहर

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और वैश्विक दूध उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग एक-चौथाई है। पिछले एक दशक में देश का दूध उत्पादन रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा है, लेकिन लगातार बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन अब इस सफलता के सामने नई चुनौती बनकर उभर रहे हैं। बिजनेसलाइन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, अत्यधिक गर्मी के कारण दूध उत्पादन में 30 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है जबकि पशुओं को ठंडा रखने और उनकी देखभाल पर किसानों का खर्च लगातार बढ़ रहा है।



समय से पहले जन्म और घटता दूध उत्पादन

रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के पास रहने वाले एक डेयरी किसान ने बताया कि पिछले वर्ष भीषण गर्मी के दौरान उनकी एक गाय ने समय से कई महीने पहले बछड़े को जन्म दिया। नवजात बछड़ा बेहद कमजोर था और उसके जीवित रहने की संभावना भी कम मानी जा रही थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे मामले बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का हिस्सा हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, अत्यधिक गर्मी के कारण पशु कम चारा खाते हैं, उनकी प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है और दूध उत्पादन में भी कमी आती है। इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ता है।



देश की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका

भारत का डेयरी क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में करीब 5 प्रतिशत योगदान देता है और 8 करोड़ से अधिक किसानों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है। बढ़ती आबादी और आय के कारण आने वाले वर्षों में दूध और दुग्ध उत्पादों की मांग और बढ़ने की संभावना है। सरकार का अनुमान है कि वर्ष 2050 तक देश में डेयरी उत्पादों की मांग लगभग दोगुनी हो सकती है।



रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद बढ़ी चुनौतियां

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में भारत का दूध उत्पादन रिकॉर्ड 23.9 करोड़ टन तक पहुंच गया, जो एक दशक पहले की तुलना में लगभग 64 प्रतिशत अधिक है। यह उपलब्धि बेहतर नस्लों के विकास और डेयरी क्षेत्र में हुए निवेश का परिणाम मानी जाती है। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि बढ़ता तापमान इस मॉडल की कमजोरियों को भी उजागर कर रहा है। अधिक दूध देने वाली विदेशी और क्रॉसब्रीड नस्लें गर्मी के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य और उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।



किसानों की बढ़ रही लागत

गर्मी से बचाने के लिए किसानों को पशु शेड में वेंटिलेशन, पंखे, पानी और विशेष आहार जैसी सुविधाओं पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े डेयरी फार्म तो इस बदलाव के अनुरूप निवेश कर रहे हैं, लेकिन दो से चार पशुओं वाले छोटे डेयरी किसानों के लिए ऐसा करना आसान नहीं है।



गर्मी सहने वाली नस्लों पर जोर

राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) गर्मी के प्रभाव को कम करने के लिए कई उपायों पर काम कर रहा है। इनमें गर्मी सहन करने वाली नई नस्लों का विकास, बेहतर पशु शेड डिजाइन और विशेष आहार प्रबंधन शामिल हैं। वैज्ञानिकों ने हाल ही में ऐसी गाय की नस्ल विकसित की है, जो अधिक तापमान में भी दूध उत्पादन बनाए रखने में सक्षम है। हालांकि, इस तकनीक को देशभर के लाखों छोटे किसानों तक पहुंचाने में समय लगेगा।



भैंसों पर भी बढ़ा खतरा

देश के कुल दूध उत्पादन में भैंसों की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार भैंसें अत्यधिक गर्मी के प्रति और अधिक संवेदनशील होती हैं। पहले जहां उन्हें केवल कुछ गर्मी के महीनों में अतिरिक्त ठंडक की जरूरत पड़ती थी, वहीं अब मार्च से नवंबर तक विशेष प्रबंधन की आवश्यकता महसूस की जा रही है।



बीमा कंपनियां भी ला रही नए उत्पाद

बढ़ती गर्मी का असर अब ग्रामीण बीमा बाजार में भी दिखाई देने लगा है। कई कंपनियां पशुओं पर गर्मी के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए विशेष बीमा योजनाएं लेकर आ रही हैं। लक्जमबर्ग की क्लाइमेट इंश्योरेंस कंपनी IBISA ने भारत में चार गर्मी के मौसमों के दौरान 3.6 लाख से अधिक पशुओं का बीमा किया है और प्रभावित किसानों को 3.6 लाख डॉलर से अधिक का भुगतान किया है।



अनुकूलन ही सबसे बड़ा समाधान

विशेषज्ञों का मानना है कि बीमा किसानों को कुछ राहत जरूर दे सकता है, लेकिन स्थायी समाधान पशुपालन को बदलती जलवायु के अनुरूप ढालने में ही है। बेहतर नस्ल, आधुनिक शेड, संतुलित आहार और पशु स्वास्थ्य प्रबंधन के जरिए ही डेयरी क्षेत्र को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा सकता है।

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