30 हजार किलोमीटर की साइकिल यात्रा, 2 लाख से ज्यादा पौधे और एक सपना: रेगिस्तान में हरियाली उगाने निकला 'ग्रीनमैन' नरपत सिंह
पर्यावरण संरक्षण पर भाषण देना आसान है, सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखना भी आसान है। लेकिन अपने जीवन के कई साल, अपनी कमाई और अपनी सुविधाएं प्रकृति के नाम कर देना हर किसी के बस की बात नहीं होती। राजस्थान के बाड़मेर जिले के छोटे से गाँव लांगेरा के रहने वाले नरपत सिंह राजपुरोहित उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने पर्यावरण को सिर्फ एक मुद्दा नहीं, बल्कि अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।
आज लोग उन्हें "ग्रीनमैन ऑफ बाड़मेर/ Green Man of Barmer" के नाम से जानते हैं। लेकिन यह पहचान उन्हें एक दिन में नहीं मिली। इसके पीछे हैं हजारों किलोमीटर की साइकिल यात्रा, लाखों लोगों तक पहुँचा संदेश, दो लाख से अधिक पौधे और प्रकृति के प्रति एक अटूट समर्पण।
तपते रेगिस्तान में जन्मा हरियाली का सपना
राजस्थान का पश्चिमी इलाका देश के सबसे गर्म क्षेत्रों में गिना जाता है। गर्मियों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुँच जाता है। पानी की कमी, सूखी धरती और लगातार बढ़ती गर्मी यहाँ के लोगों के लिए बड़ी चुनौती है। इन्हीं परिस्थितियों के बीच बड़े हुए नरपत सिंह के मन में एक सवाल हमेशा उठता था अगर पेड़ कम होते जाएंगे तो आने वाली पीढ़ियां कैसी दुनिया में रहेंगी? यही सवाल धीरे-धीरे उनके जीवन का मिशन बन गया।
करीब 15 साल पहले उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए काम शुरू किया। गाँवों में पौधे लगाने से लेकर जल संरक्षण, वन्यजीवों के लिए पानी की व्यवस्था और लोगों को जागरूक करने तक, उन्होंने हर स्तर पर काम किया। हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर वे विशेष हरित/हरी वेशभूषा पहनकर लोगों के बीच जाते हैं और प्रकृति बचाने का संदेश देते हैं।
नरपत सिंह अपने काम के बारे में बताते हुए कहते हैं, "एक सपना, एक शौक ऐसी चीज होती है, उसको पूरा करने के लिए खुद की कई दौलत भी बेचनी पड़ती है। पर्यावरण का काम करते हुए मेरे को 15 साल हो गए हैं। मैं हर 5 जून को मेरी विशेष वेशभूषा पहनकर, पूरी बॉडी को ग्रीन कलर करके और पर्यावरण के स्लोगन लिखकर, पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता हूं कि हम पर्यावरण को कैसे बचा सकते हैं, पर्यावरण के प्रति हम कैसे आमजन को जोड़कर पर्यावरण संरक्षण में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।"
एक साइकिल और 30 हजार किलोमीटर लंबा संकल्प
साल 2019 में नरपत सिंह ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसे सुनकर कई लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। उन्होंने तय किया कि वे साइकिल से पूरे देश में पर्यावरण जागरूकता अभियान चलाएंगे। 27 जनवरी 2019 को उन्होंने जम्मू-कश्मीर से अपनी यात्रा शुरू की। यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी, बल्कि देश के लोगों तक प्रकृति संरक्षण का संदेश पहुंचाने का अभियान था।
करीब साढ़े तीन साल बाद, 13 जून 2022 को उनकी यात्रा पूरी हुई। इस दौरान उन्होंने 20 से अधिक राज्यों में 30 हजार किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय किया। रास्ते में कभी तेज गर्मी मिली, कभी मूसलाधार बारिश और कभी कई-कई किलोमीटर तक सुनसान सड़कें। कई रातें सड़क किनारे गुजरीं, कई दिन सीमित संसाधनों में निकले, लेकिन उनका लक्ष्य नहीं बदला।
जहाँ-जहाँ गए, वहाँ-वहाँ बोए उम्मीद के बीज
नरपत सिंह की यात्रा सिर्फ साइकिल चलाने तक सीमित नहीं थी। वे जहाँ भी पहुंचे, लोगों को पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया। स्कूलों में बच्चों से संवाद किया, गाँवों में पर्यावरण सभाएं कीं और लोगों को बताया कि पेड़ सिर्फ ऑक्सीजन नहीं देते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा भी करते हैं। आज तक वे स्वयं दो लाख से अधिक पौधे लगा चुके हैं। इनमें से करीब 70 प्रतिशत पौधे जीवित हैं, जिसे वे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनते हैं। उनका कहना है कि पौधा लगाना आसान है, लेकिन उसे पेड़ बनाना असली चुनौती है।
पीपल की वाटिका और जीवन को सहारा देते जलकुंड
नरपत सिंह सिर्फ पौधारोपण तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने पीपल जैसे पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण वृक्षों की विशेष वाटिकाएं विकसित की हैं। उनकी तीन अलग-अलग पीपल वाटिकाओं में करीब 800 पीपल के पेड़ हैं। इसके अलावा वे वन्यजीवों और पक्षियों के लिए जलकुंड बनाते हैं, पानी की टंकियाँ लगवाते हैं और गर्मियों में पक्षियों के लिए रहने का घर/घोंसला बांटते हैं। राजस्थान जैसे इलाके में, जहाँ पानी, जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर तय करता है, वहाँ नरपत सिंह का काम हजारों जीवों के लिए राहत बन रहा है।
ग्रीनमैन के पीछे की मेहनत के बारे में बताते हुए नरपत सिंह कहते हैं, "एक तरीके का पौधा पनपाना, उसे सक्सेसफुल (successful) करना एक बड़ा चैलेंज होता है। उस चैलेंज को मैं पार कर रहा हूं। और सबसे बड़ी बात है, मेरे पास वर्ल्ड की सबसे बड़ी पीपल वाटिका मेरे पास है। जिसके अंदर कुल 800 पीपल हैं। अलग-अलग तीन वाटिकाओं के अंदर कुल 800 पीपल हैं। और अभी तक मैं खुद 2 लाख से प्लस पौधे लगा चुका हूँ, जिसके अंदर मेरा 70% पौधे सक्सेसफुल हैं। जलकुंड बनाता हूं, पौधे लगाता हूं, जो भी करता हूं मैं... एक शर्म को साइड में छोड़ के, सोशल मीडिया पे पोस्ट करता हूं। मुझे आप 11 रुपये, 21 रुपये दें, उसके बदौलत हम 21 हजार, 21 लाख का आपको काम करके देंगे।
घायल जानवरों के लिए भी हमेशा तैयार
पर्यावरण उनके लिए सिर्फ पेड़-पौधों तक सीमित नहीं है। नरपत सिंह घायल पशुओं के उपचार में मदद करते हैं, पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करते हैं और जरूरत पड़ने पर स्नेक रेस्क्यू जैसे कार्यों में भी सहयोग करते हैं। उनका मानना है कि प्रकृति को बचाने का मतलब केवल पेड़ लगाना नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना है।
जब जुनून ने दिलाया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड
सालों की मेहनत और असाधारण यात्रा ने आखिरकार दुनिया का ध्यान भी खींचा। नरपत सिंह का नाम भारत में सबसे लंबी साइकिल यात्रा करने वालों में दर्ज हुआ और उन्हें गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड सहित इंडिया बुक, एशिया बुक और गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी जगह मिली। लेकिन उनसे जब इस उपलब्धि के बारे में पूछा जाता है, तो वे कहते हैं कि असली खुशी रिकॉर्ड से नहीं, उन पेड़ों को बड़ा होते देखने से मिलती है जिन्हें उन्होंने अपने हाथों से लगाया था।
एक व्यक्ति, जिसने साबित किया कि बदलाव संभव है
आज जब जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, सूखते जल स्रोत और घटते जंगल दुनिया के सामने बड़ी चुनौती बन चुके हैं, तब नरपत सिंह जैसे लोग उम्मीद जगाते हैं। वे दिखाते हैं कि बदलाव के लिए हमेशा बड़ी संस्थाओं या भारी बजट की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक साइकिल, एक संकल्प और प्रकृति के प्रति सच्चा प्रेम भी लाखों लोगों को प्रेरित कर सकता है।
रेगिस्तान में हरियाली उगाना आसान नहीं होता। लेकिन नरपत सिंह की कहानी बताती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो रेत में भी जंगल उगाए जा सकते हैं और शायद यही वजह है कि बाड़मेर का यह साधारण व्यक्ति आज पर्यावरण संरक्षण की असाधारण मिसाल बन चुका है।