बाढ़ से टूटे नेपाल की अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने की चुनौती! जानें भारत की मदद कहाँ-कहाँ आएगी काम और किन चीज़ों पर निर्भर है देश

Umang | Sept 02, 2026, 15:00 IST
नेपाल में विनाशकारी बाढ़ ने गंभीर मानवीय और आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। देश को पुनर्निर्माण के लिए अरबों डॉलर की आवश्यकता है, जो उसकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है। भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और विदेशी निवेश का प्रमुख स्रोत है। भारत की मदद राहत सामग्री से लेकर बिजली और पेट्रोलियम आपूर्ति तक फैली हुई है।

नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने देश के सामने बड़ा मानवीय और आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। 2 सितंबर तक कम से कम 1,114 लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 4,000 लोग अब भी लापता हैं। मलबे में दबे लोगों की तलाश जारी है, लेकिन एक हफ्ते बाद भी कई इलाकों तक पहुँचना मुश्किल बना हुआ है। बाढ़ ने घरों, सड़कों, पुलों, बिजली की लाइनों और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुँचाया है। नेपाल अब बचाव के साथ-साथ राहत, पुनर्वास और दोबारा निर्माण की ओर बढ़ रहा है।



इस तबाही का असर ऐसे समय में पड़ा है जब नेपाल की अर्थव्यवस्था पहले से ही कुछ गिने-चुने साधनों पर काफी निर्भर है। नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले ने शुरुआती तौर पर दोबारा निर्माण और बहाली के लिए 4 से 5 अरब डॉलर (38,000 से 47,500 करोड़ रुपये) की जरूरत बताई है। यह रकम नेपाल की अर्थव्यवस्था के करीब दसवें हिस्से के बराबर बैठती है।



नेपाल की अर्थव्यवस्था में विदेशों से आने वाला पैसा बड़ा सहारा

नेपाल की सबसे बड़ी आर्थिक कमजोरियों में से एक यह है कि देश के अंदर पर्याप्त रोज़गार नहीं हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशों में काम करने वाले नेपाली हर साल बड़ी रकम अपने घर भेजते हैं और यह पैसा नेपाल की अर्थव्यवस्था का एक-चौथाई से अधिक हिस्सा है। रिपोर्ट के मुताबिक, विदेश जाने वाले बहुत से नेपाली कामगार महीने में 400 डॉलर (38,000 रुपये) से कम कमाते हैं और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा परिवारों को भेजते हैं। करीब 6 लाख नेपाली हर साल बेहतर रोज़गार की तलाश में विदेश जाते हैं।



यही पैसा नेपाल में घर बनाने, सामान खरीदने और रोज़मर्रा के खर्च में जाता है। खास तौर पर काठमांडू घाटी में निर्माण और खपत पर विदेश से आने वाले पैसे का बड़ा असर है। लेकिन समस्या यह है कि इतनी बड़ी निर्भरता देश के अंदर मजबूत उद्योग और पर्याप्त रोज़गार पैदा करने की जरूरत को पीछे भी कर सकती है। इस बाढ़ से विदेशों में काम करने वाले नेपाली लोगों की कमाई पर सीधा असर पड़ने की संभावना कम है, लेकिन देश के अंदर बिजली, पर्यटन, खेती और कारोबार को हुआ नुकसान आर्थिक गतिविधियों को कमजोर कर सकता है।



पहले से कर्ज़ के दबाव में है नेपाल

नेपाल की सरकार के सामने एक और बड़ी समस्या कर्ज़ का बोझ है। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले करीब 11 वर्षों में नेपाल का सरकारी कर्ज़ देश की अर्थव्यवस्था के करीब 26 फीसदी से बढ़कर 45 फीसदी तक पहुँच गया। सरकार के खर्च का करीब 19 फीसदी हिस्सा कर्ज़ और उसके ब्याज को चुकाने में जा रहा है।



इसका सीधा मतलब है कि सरकार के पास आपदा के बाद सड़क, पुल, बिजली, घर और दूसरी सुविधाएँ दोबारा बनाने के लिए खर्च करने की गुंजाइश सीमित है। नेपाल अभी 2015 के भूकंप से हुए भारी नुकसान से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था। उस भूकंप से करीब 9 अरब डॉलर (85,500 करोड़ रुपये) का नुकसान हुआ था। ऐसे में मौजूदा बाढ़ का खर्च नेपाल के लिए और बड़ी चुनौती बन गया है। अगर पुनर्निर्माण पर 4 से 5 अरब डॉलर लगते हैं, तो इतनी बड़ी रकम जुटाना देश के लिए आसान नहीं होगा।



ऐसे समय में भारत की भूमिका क्यों अहम है?

यहीं भारत के साथ नेपाल के आर्थिक रिश्ते सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। भारतीय दूतावास की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और विदेशी निवेश का सबसे बड़ा स्रोत है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच सामान का कारोबार 9.38 अरब डॉलर (89,110 करोड़ रुपये) रहा। यह नेपाल के कुल बाहरी सामान के कारोबार का करीब 62.3 फीसदी है।



नेपाल भारत को इलायची, लोहे की चादरें, खाने का तेल, जूस, प्लाईवुड और जूट जैसे सामान भेजता है। भारत से नेपाल में पेट्रोलियम, लोहा-इस्पात, गाड़ियाँ, मशीनें और अनाज जैसे सामान जाते हैं। भारतीय दूतावास के अनुसार, नेपाली वित्त वर्ष 2024-25 में नेपाल के कुल निर्यात का 81.1 फीसदी भारत से गया था। इसका मतलब है कि भारत नेपाल के लिए सिर्फ सामान खरीदने-बेचने वाला पड़ोसी देश नहीं है। नेपाल की विदेशी कमाई, सामान की आवाजाही और रोज़मर्रा की जरूरी चीज़ों की आपूर्ति में भारत की बड़ी भूमिका है।



नेपाल के विदेशी कारोबार में भी भारत का रास्ता जरूरी

नेपाल की समुद्र तक सीधी पहुँच नहीं है। इसलिए दूसरे देशों के साथ उसके कारोबार के लिए भारत की सड़क, रेल और बंदरगाह व्यवस्था महत्वपूर्ण है। भारतीय दूतावास के अनुसार, भारत नेपाल को तीसरे देशों के साथ व्यापार के लिए ट्रांजिट सुविधा देता है।



भारतीय दूतावास की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, भारत और नेपाल के बीच रक्सौल-बीरगंज और जोगबनी-नेपाल कस्टम यार्ड रेल माल ढुलाई मार्ग चल रहे हैं। भारत की मदद से नेपाल में सीमा पर सामान की जाँच और आवाजाही के लिए इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट भी बनाए जा रहे हैं। बीरगंज, नेपालगंज और विराटनगर के चेक पोस्ट चालू हैं, जबकि भैरहवा में काम चल रहा है और दोधारा चाँदनी के लिए तैयारी हो रही है। नवंबर 2025 में भारत और नेपाल ने रेल के रास्ते सामान की आवाजाही बढ़ाने के लिए भी समझौता किया था। इससे नेपाल के कारोबार को भारतीय बंदरगाहों तक पहुँचने में मदद मिलती है।



नेपाल में भारतीय निवेश 7,686 करोड़ रुपये से ज्यादा

नेपाल की अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। भारतीय दूतावास की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नेपाल में कुल विदेशी निवेश में भारतीय निवेश की हिस्सेदारी 32.3 फीसदी से अधिक है। जुलाई 2024 तक भारतीय निवेश का मूल्य करीब 80.91 करोड़ डॉलर (7,686.55 करोड़ रुपये) था। नेपाल में करीब 150 भारतीय कंपनियाँ और कारोबारी संस्थान काम कर रहे हैं। इनमें बैंकिंग, बीमा, ड्राई पोर्ट, शिक्षा, दूरसंचार, बिजली और पर्यटन जैसे क्षेत्र शामिल हैं। भारतीय दूतावास के मुताबिक, इन निवेशों ने नेपाल में उद्योग, रोज़गार, सरकारी कमाई और निर्यात को बढ़ाने में भूमिका निभाई है।



बिजली के क्षेत्र में भारत नेपाल का सबसे बड़ा बाज़ार

नेपाल के पास पहाड़ों और नदियों की वजह से जलविद्युत बनाने की बड़ी क्षमता है। पिछले कुछ वर्षों में नेपाल ने बिजली उत्पादन बढ़ाने और भारत को बिजली बेचने पर काफी जोर दिया है।



भारत की कंपनियाँ नेपाल में अरुण-3, लोअर अरुण, अपर कर्णाली, वेस्ट सेती और एसआर-6 जैसी बड़ी बिजली परियोजनाओं से जुड़ी हैं। दोनों देशों ने अगले 10 वर्षों में नेपाल से भारत को 10,000 मेगावाट तक बिजली बेचने का लक्ष्य भी तय किया है लेकिन मौजूदा बाढ़ ने इस क्षेत्र की कमजोरी भी सामने ला दी है। रॉयटर्स के मुताबिक, बाढ़ से नेपाल की करीब 431 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता, यानी कुल क्षमता का करीब 10 फीसदी प्रभावित हुई। नेपाल को कुछ समय के लिए भारत को बिजली का निर्यात रोकना पड़ा और घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए भारत से बिजली लेनी पड़ी। इससे एक बात साफ है कि जलविद्युत नेपाल के लिए बड़ी कमाई का साधन बन सकता है, लेकिन इसके लिए परियोजनाओं को बाढ़, भूस्खलन और बदलते मौसम के खतरे को ध्यान में रखकर बनाना भी जरूरी होगा।



पेट्रोलियम की आपूर्ति में भारत की लगभग पूरी हिस्सेदारी

नेपाल की रोज़मर्रा की अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका पेट्रोलियम के मामले में और भी सीधी है। भारतीय दूतावास के अनुसार, भारत नेपाल की पेट्रोलियम जरूरत का लगभग 100 फीसदी हिस्सा पूरा करता है। भारत और नेपाल के बीच 41 किलोमीटर लंबी रक्सौल-अमलेखगंज पेट्रोलियम पाइपलाइन 2019 में शुरू हुई थी। इसे इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने बनाया और इसके लिए वित्तीय मदद भी दी। भारतीय दूतावास के मुताबिक, पाइपलाइन शुरू होने के बाद नेपाल ऑयल कॉरपोरेशन को करीब 15 करोड़ नेपाली रुपये प्रति महीने की बचत हुई। बाढ़ जैसी आपदा के समय ईंधन की लगातार आपूर्ति राहत और बचाव के साथ-साथ परिवहन, बिजली उत्पादन और जरूरी सामान की आवाजाही के लिए भी अहम होती है।



भारत ने बाढ़ के बाद तुरंत राहत भेजी

मौजूदा बाढ़ के बाद भारत ने नेपाल को राहत सामग्री भेजना शुरू कर दिया है। काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, 26 अगस्त को 10 टन मानवीय सहायता नेपाल को सौंपी गई। इसके बाद 27 अगस्त को 37.5 टन राहत सामग्री, दवाइयाँ और खाद्य सामग्री भेजी गई।



28 अगस्त की तीसरी खेप में पोर्टेबल जनरेटर, महिलाओं के लिए जरूरी सामान, खाने के पैकेट और पानी साफ करने वाली गोलियाँ शामिल थीं। 29 अगस्त को भारत ने राहत की चौथी खेप भी सौंपी। भारतीय दूतावास की मौजूदा जानकारी इन खेपों को अलग-अलग बताती है, इसलिए इनका कोई एक कुल वजन जोड़कर बताना उचित नहीं होगा। भारत की मदद सिर्फ राहत सामग्री तक सीमित नहीं है। Reuters के मुताबिक, नेपाल में चल रहे बचाव अभियान में भारत की टीमें भी शामिल हैं और बिजली परियोजनाओं की सुरंगों में फँसे लोगों को निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं।



आपदा के बाद भारत की मदद का पुराना रिकॉर्ड

नेपाल में बड़ी आपदा आने पर भारत पहले भी राहत और पुनर्निर्माण में मदद करता रहा है। 2015 के भूकंप के बाद भारत ने नेपाल के पुनर्निर्माण के लिए 1 अरब डॉलर (9,500 करोड़ रुपये) की मदद देने का वादा किया था। इसमें 25 करोड़ डॉलर (2,375 करोड़ रुपये) की अनुदान सहायता और 75 करोड़ डॉलर (7,125 करोड़ रुपये) की लाइन ऑफ क्रेडिट शामिल थी।



सितंबर 2024 में नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन के बाद भारत ने 25 टन मानवीय सहायता और 10 अस्थायी स्टील पुल दिए थे। अक्टूबर 2025 की भारी बारिश के बाद भारत ने पूर्वी नेपाल में 70 मीटर या उससे अधिक लंबे 10 पुल भी अनुदान के आधार पर देने का फैसला किया था। इसलिए मौजूदा संकट में भारत की भूमिका को केवल इस बार भेजी गई राहत सामग्री से नहीं देखा जा सकता। दोनों देशों के बीच पहले से चल रहे सड़क, रेल, बिजली, पेट्रोलियम और पुनर्निर्माण के काम भी आगे की मदद का आधार बन सकते हैं।



भारत के लिए भी नेपाल क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत के लिए नेपाल सिर्फ पड़ोसी देश नहीं है। दोनों देशों की करीब 1,850 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है और दोनों देशों के बीच लोगों का आना-जाना और कारोबार बहुत पुराना है। नेपाल में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर भारत के सीमावर्ती राज्यों और कारोबार पर भी पड़ता है। भारत के लिए नेपाल के साथ बिजली कारोबार भी तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है। नेपाल में बनी बिजली भारत के उत्तरी राज्यों की ज़रूरत पूरी करने में मदद कर सकती है। दूसरी ओर, भारत के लिए नेपाल में निवेश और सड़क, रेल तथा बिजली परियोजनाएँ दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्तों को और मजबूत करती हैं।



इस समय नेपाल के सामने सवाल सिर्फ बाढ़ से हुए नुकसान को ठीक करने का नहीं है। असली चुनौती यह है कि इस तबाही के बाद देश अपनी अर्थव्यवस्था को कितना मजबूत बना पाता है। भारत की मदद तत्काल राहत से लेकर बिजली, कारोबार, निवेश और पुनर्निर्माण तक कई स्तरों पर नेपाल के काम आ सकती है। लेकिन नेपाल के लिए लंबे समय में अपनी कमाई के नए साधन बनाना और आपदाओं से निपटने की तैयारी मजबूत करना उतना ही ज़रूरी होगा।

Tags:
  • Nepal Flood
  • नेपाल में बाढ़
  • Nepal Economy
  • नेपाल की अर्थव्यवस्था
  • India Nepal Relations
  • India Nepal Trade
  • Nepal Hydropower
  • Nepal Remittance
  • Nepal Petroleum
  • India Nepal Investment