गाँव और विकास: आज़ादी के बाद से अब तक की यात्रा
महात्मा गाँधी ने कहा था कि हमारा भारत गाँव में रहता है। लेकिन गाँधी जी की इस बात को हमारी सरकारों ने शायद गंभीरता से नहीं लिया। आज़ाद भारत की पहली सरकार पंडित नेहरू के नेतृत्व में बनी और उस सरकार ने कई मूलभूत और अच्छे काम शुरू किए, जैसे वयस्क मताधिकार, तटस्थ विदेश नीति और सेकुलर शासन व्यवस्था, लेकिन गाँवों की तरफ यथोचित ध्यान नहीं रहा क्योंकि शायद गाँव का दर्द उस सरकार को पता नहीं था। उस सरकार के अगुवा नेहरू जी विदेशों में पढ़े और बड़े हुए थे, उनका सीधा संबंध कभी भी गाँव के अनपढ़ गरीबों से नहीं रहा था। शायद यही कारण रहा होगा कि उनकी सरकार का फोकस गाँव के गरीब पर न होकर देश को तेजी से आगे बढ़ाने पर रहा होगा। उन्होंने बड़े-बड़े बांध जैसे भांगड़ा नागल बांध, झमरानी बांध, रिहंद और कोयना बांधों जैसे बिजली उत्पादन के कामों पर ध्यान दिया। और उन बांधों से जहाँ-तहाँ नहरों के माध्यम से पानी पहुँचा। इन्हीं के साथ आईआईटी कॉलेजों, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों तथा शहरी विकास पर फोकस रहा।
शुरुआती दौर: औद्योगिक विकास बनाम ग्रामीण उपेक्षा
जब देश आज़ाद हुआ तो कहते हैं कि देश में सुई तक नहीं बनती थी और मैंने बचपन में यह देखा था कि मिट्टी का तेल, नमक और शक्कर जैसी चीजें परमिट यानी कोटा की दुकान से मिलती थीं। मैं भी अपने बाबा के साथ जमुवा तक जाया करता था इन चीजों को लाने के लिए। उस सरकार ने ग्रामीण विकास की जगह औद्योगिक विकास पर अधिक ध्यान दिया, जिसका परिणाम हुआ कि गाँव पिछड़ते गए और शहर विकसित होते गए। दूसरे शब्दों में कहें तो गरीब और गरीब होता गया तथा अमीर और अमीर होता गया। गाँवों में बैलगाड़ियों के आने-जाने के लिए गलियारे तथा पैदल जाने वालों के लिए खेतों की मेड़ें यथावत रहीं। साइकिलों के अलावा शीघ्र पहुंचाने के लिए और कोई साधन विकसित नहीं हुए। गाँव में अशिक्षा और चिकित्सा का प्रबंध जैसा का तैसा रहा। कच्ची मिट्टी के मकानों में जीवन बिताते रहे, पानी-बिजली की कौन कहे।
जमींदारी और नीतिगत सीमाएं
अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी चार-पांच साल तक गवर्नर जनरल के रूप में राजगोपालाचारी ने शासन चलाया और उत्तर प्रदेश में 1954-55 तक किसानों की जमीन पर मालिकाना अधिकार नहीं था, बल्कि जमीन जमींदारों की बनी रही जैसा अंग्रेजों ने बनाया था। देश में उद्योग-धंधे और बड़ी कंपनियाँ सब सरकार के हाथ में थीं, इसलिए व्यक्तियों का विकास छोटी दुकानों आदि तक सीमित रहा और सरकारी उद्योग-धंधे घाटे में चलते रहे। किसानों की समस्या को समझने का शायद किसी को समय ही नहीं था कि किसान कम पैदावार के बावजूद परिवार का भोजन और खर्च इसी कम उपज से चलाता था। उस समय की एक छोटी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनसंघ ने जरूर यह नारा दिया था "हर हाथ को काम, हर खेत को पानी" लेकिन न तो हाथों को काम मिला, न खेतों को पानी। ऐसा लगता है कि कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव सरकार पर कुछ रहा होगा और उस पार्टी ने नारा दिया था "धन और धरती बंट के रहेगी" और हमारी सरकार ने भी वितरण पर तो जोर दिया लेकिन उत्पादन पर नहीं, फिर चाहे कृषि उत्पादन हो या औद्योगिक।
बंटवारा और सामाजिक प्रभाव
जब देश आज़ाद हुआ, उसके साथ ही देश का बंटवारा भी हुआ और मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग कौमें हैं, वे एक साथ नहीं रह सकते, इसलिए मुसलमानों को देश का अलग हिस्सा दिया जाए जिसे पाकिस्तान कहा गया और बाकी हिस्सा हिंदुओं के लिए, ऐसी जिन्ना की सोच थी। लेकिन उनके अनुसार बंटवारा नहीं हो पाया और पाकिस्तान से बड़ी आबादी मुसलमानों के साथ शहरों में अशांति और तनाव का वातावरण बना रहा। गाँवों के लिए या तो सरकार के पास समय नहीं था या गाँव वालों में जुझारू प्रवृत्ति नहीं थी, जहाँ के तहत रहे। इतना जरूर है कि ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदू-मुस्लिम रिश्ते उतने खराब नहीं हुए जितना शहरों में। गाँव में हिंदू-मुस्लिम तनाव या झगड़े शायद इसलिए नहीं हुए कि वहाँ मुस्लिम आबादी शहरों की अपेक्षा बहुत कम थी और वे जिन्ना के आंदोलन से प्रभावित नहीं थे।
60 का दशक: संकट और चेतावनी
60 के दशक में एक ऐसा समय आया जब गाँव की उपेक्षा का दुष्परिणाम भोगना पड़ा। देश में सूखा पड़ा और भुखमरी की नौबत आ गई। उधर सेना के विषय में तत्कालीन जनरल करियप्पा ने जब यह कहा कि सरहद पर सड़कें नहीं हैं, सुरक्षा में कठिनाई हो सकती है, तो कोई ध्यान नहीं दिया गया। नतीजा यह हुआ कि देश बिना सैनिक तैयारी के रहा और किसान कठिनाइयों से जूझता रहा। इसी बीच 1962 में एक तरफ हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे लगते रहे, तो दूसरी तरफ चीन ने हमारे देश पर हमला कर दिया। देश को शर्मनाक हालात से गुजरना पड़ा और भारत का बड़ा भूभाग चीन ने हड़प लिया। 60 के दशक में लोकसभा में डॉक्टर लोहिया ने कहा था कि चीन के हाथों एक लाख वर्ग मील जमीन चली गई है, लेकिन सरकार ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया की थी और अंततः माना था कि 12 हजार मील भूमि चीन के कब्जे में गई है।
शास्त्री काल: किसान और जवान पर फोकस
1964 के अंतिम सप्ताह में दुखद समाचार आया जब नेहरू जी का देहांत हो गया। देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने लाल बहादुर शास्त्री जी और उन्होंने देश की समस्या को समझा और नारा दिया—जय जवान, जय किसान। धीरे-धीरे जवान और किसान का हौसला बढ़ना शुरू हुआ। लेकिन पाकिस्तान ने सोचा कि चीन के हाथों भारत पराजित हो चुका है, इसलिए उसने भारत पर हमला कर दिया। एक तरफ देश में खाद्यान्न का अभाव और दूसरी तरफ पाकिस्तानी आक्रमण- इस परिस्थिति से शास्त्री जी ने बड़ी सूझबूझ से भारत को निकाला।
हरित क्रांति और आगे की राजनीति
शास्त्री जी के प्रयासों का अगली सरकार को लाभ मिला और उनके देहांत के बाद देश की बागडोर श्रीमती इंदिरा गांधी के हाथों में आ गई। इंदिरा जी ने नई किस्म के गेहूं के बीज, जिन्हें मैक्सिकन गेहूं कहा जाता है और अधिक उपज देने वाले धान के बीज मंगवाए। उन्नत बीज और खाद के उपयोग से उत्पादन बढ़ा और देश धीरे-धीरे खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनने लगा।
आपातकाल और राजनीतिक अस्थिरता
1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की। कुछ समय तक प्रशासनिक सुधार दिखे, लेकिन जब नसबंदी जैसे कदमों में जबरदस्ती हुई तो जनता में असंतोष बढ़ गया। 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की सरकार बनी, लेकिन आपसी मतभेदों के कारण वह ज्यादा समय तक नहीं चल सकी। पी.वी. नरसिम्हा राव के समय आर्थिक सुधार शुरू हुए और निजी क्षेत्र को बढ़ावा मिला। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने सिंचाई और बुनियादी ढांचे पर ध्यान दिया। डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मनरेगा जैसी योजनाएं शुरू हुईं, जिनका ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ा।
वर्तमान दौर और चुनौतियाँ
2014 के बाद ग्रामीण विकास पर गति आने की बात कही जाती है। किसानों को उचित मूल्य, बिजली, सौर ऊर्जा, जल संरक्षण और बेहतर बीजों पर ध्यान दिया गया। लेकिन पूरे साल रोजगार की गारंटी तभी संभव है जब गाँवों में कृषि आधारित उद्योग विकसित हों।
अभी लंबा रास्ता बाकी
ग्रामीण शिक्षा अभी भी बहुत पिछड़ी हुई है और उसमें अपेक्षित सुधार नहीं हो रहे हैं। इसी प्रकार समाज के कई वर्ग आधुनिक शिक्षा के अभाव में पीछे हैं। 70% आबादी गाँवों में रहती है, इसलिए बजट और नीतियों में उसी अनुपात में ध्यान देना होगा। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में यह भी आवश्यक है कि ग्रामीण विकास और देश के समग्र विकास के मामले में सत्ता पक्ष और विपक्ष की सोच रचनात्मक रहे।