Direct Seeding Rice: धान की सीधी बुवाई के लिए IRRI ने विकसित की नई किस्में, कम पानी में मिलेगी बेहतर पैदावार, जानिए किस्मों के नाम
धान की पारंपरिक खेती में पहले नर्सरी तैयार की जाती है और फिर पौधों की रोपाई खेत में की जाती है। इस प्रक्रिया में ज्यादा पानी, मजदूरी और समय की जरूरत होती है। इसके मुकाबले सीधी बुवाई तकनीक में बीज को सीधे खेत में बोया जाता है, जिससे लागत कम करने में मदद मिल सकती है। इन नई किस्मों का नाम DRR Dhan 92 और CR Dhan 217 है।
इन नई किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनकी खेती के लिए पारंपरिक धान की तरह खेतों में लगातार पानी भरकर रखने की जरूरत नहीं होगी। इससे पानी की बचत होगी, साथ ही खेतों से निकलने वाली मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी आएगी। खास बात यह है कि कम पानी की जरूरत के बावजूद इन किस्मों से अच्छी पैदावार ली जा सकती है।
IRRI और भारतीय कृषि अनुसंधान प्रणाली (NARES) के सहयोग से विकसित नई धान किस्मों को खासतौर पर डायरेक्ट सीडेड राइस सिस्टम के लिए तैयार किया गया है। इन किस्मों में शुरुआती बढ़वार, मौसम सहनशीलता और बेहतर उत्पादन क्षमता जैसे गुण शामिल हैं।
किसानों को क्या होगा फायदा?
नई सीधी बुवाई वाली धान किस्मों का सबसे बड़ा फायदा पानी और मजदूरी की बचत के रूप में देखा जा रहा है। धान की रोपाई में जहां खेत को लंबे समय तक पानी में रखना पड़ता है, वहीं DSR तकनीक में पानी की खपत कम हो सकती है। इसके अलावा क्या फायदें हैं वो भी जानें।
- नर्सरी तैयार करने की जरूरत कम होती है।
- मजदूरी लागत घट सकती है।
- खेती का काम जल्दी पूरा हो सकता है।
- समय पर फसल तैयार होने से दूसरी फसल लेने का मौका बढ़ सकता है।
DRR Dhan 92-CR Dhan 217 जैसी किस्मों से बढ़ेगी उम्मीद
सीधी बुवाई के लिए विकसित किस्मों में DRR Dhan 92 का नाम प्रमुख है। इस किस्म ने परीक्षणों में डायरेक्ट सीडेड परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन दिखाया है। इस किस्म की पैदावार करीब 5.8 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई, जो लोकप्रिय किस्म MTU 1010 से अधिक रही। इस किस्म में शुरुआती बढ़वार, रोगों के प्रति सहनशीलता और बेहतर पौध मजबूती जैसे गुण पाए गए हैं, जिससे खेत में फसल उगाने में किसानों को मदद मिल सकती है।
दूसरी ओर CR Dhan 217- भी किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प बनकर सामने आई है। इस किस्म ने औसतन 5.9 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दिया है, जबकि अनुकूल परिस्थितियों में इसकी पैदावार 8.7 टन प्रति हेक्टेयरतक पहुंच सकती है। यह किस्म खासतौर पर पूर्वी और मध्य भारत के उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त मानी जा रही है, जहां खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर रहती है। इसकी खासियत यह है कि यह केवल 118 दिनों में पककर तैयार हो जाती है, जिससे किसान समय पर अगली फसल की तैयारी भी कर सकते हैं।
जीनोमिक तकनीककी मदद से ऐसी धान किस्में विकसित
दरअसल, पारंपरिक तरीके से धान की खेती में किसानों को सबसे ज्यादा परेशानी खेतों में लगातार पानी बनाए रखने और नर्सरी से पौधों को निकालकर दूसरी जगह रोपाई करने में होती है। इस प्रक्रिया में पानी की खपत काफी अधिक होती है और मजदूरों की कमी के कारण लागत भी बढ़ जाती है।
इसी समस्या को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने जीनोमिक तकनीक की मदद से ऐसी धान किस्में विकसित की हैं, जिनमें कई बेहतर गुणों को शामिल किया गया है। वैज्ञानिकों ने 19 से अधिक उपयोगी जीनों को एक साथ जोड़कर ऐसी किस्में तैयार की हैं, जो फसल को मजबूत बनाती हैं, रोगों से बचाव करती हैं और सूखा व बाढ़ जैसी विपरीत परिस्थितियों को सहने की क्षमता देती हैं।
इन नई किस्मों की खासियत यह है कि ये कम पानी और कम ऑक्सीजन वाली परिस्थितियों में भी तेजी से विकास कर सकती हैं। इससे खेतों में खरपतवार का दबाव कम होता है और किसानों को बेहतर उत्पादन हासिल करने में मदद मिल सकती है।
DSR तकनीक में किन बातों का रखना होगा ध्यान?
धान की सीधी बुवाई में केवल अच्छी किस्म का चयन ही काफी नहीं है। किसानों को खेत की तैयारी, खरपतवार नियंत्रण और नमी प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान देना होगा। सीधी बुवाई के लिए ऐसी किस्में जरूरी हैं जिनमें:
- तेजी से अंकुरण और शुरुआती बढ़वार हो।
- खरपतवार से मुकाबला करने की क्षमता हो।
- पानी की कमी और अधिक बारिश दोनों को सहने की क्षमता हो।
- पौधे मजबूत हों ताकि गिरने की समस्या कम हो।
मॉनसून सीजन में धान की बुवाई शुरू होने के साथ किसान ऐसी तकनीकों की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे कम लागत में उत्पादन बढ़ाया जा सके। सीधी बुवाई वाली धान किस्में पानी की बचत, कम मजदूरी और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में मददगार साबित हो सकती हैं