जलवायु संकट गहराया, किसानों पर बढ़ा आर्थिक दबाव, जानें क्यों ज़रूरी हो रही किसानों की आर्थिक सुरक्षा
बदलते मौसम का असर अब केवल फसलों की पैदावार तक सीमित नहीं रह गया है। अनिश्चित मानसून, असमान बारिश और लंबे सूखे जैसे हालात किसानों की आय, खेती की लागत और कर्ज़ चुकाने की क्षमता को भी प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में खेती के लिए समय पर वित्तीय सहायता और किसानों की आर्थिक सुरक्षा पहले से कहीं अधिक अहम होती जा रही है। किसानों के सामने अब चुनौती सिर्फ़ अच्छी पैदावार की नहीं, बल्कि बदलते मौसम के बीच खेती और परिवार की आर्थिक ज़रूरतों को संतुलित रखने की भी है।
देश में खरीफ़ सीज़न की शुरुआत के साथ दक्षिण-पश्चिम मानसून आगे बढ़ चुका है, लेकिन कई राज्यों में अब भी सामान्य से कम या असमान वर्षा दर्ज की गई है। खरीफ़ के दौरान धान, कपास, दलहन और तिलहन जैसी प्रमुख फसलें बोई जाती हैं, इसलिए मानसून की रफ़्तार का सीधा असर खेती पर पड़ता है। बारिश में देरी होने या बुवाई के बाद लंबे समय तक सूखा रहने की स्थिति में किसानों को दोबारा बुवाई करनी पड़ती है, सिंचाई पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है या फिर फसल बदलनी पड़ती है। इससे खेती की लागत बढ़ने के साथ घरेलू बजट पर भी दबाव बढ़ जाता है।
खरीफ़ बुवाई पर दिखा असर, कई फसलों की रफ़्तार रही धीमी
जुलाई की शुरुआत तक खरीफ़ फसलों की बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत कम रही। तिलहन की बुवाई में 21 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जबकि कपास और दलहन की बुवाई भी 20 प्रतिशत से अधिक पीछे रही। हालाँकि, जुलाई के पहले पखवाड़े में बुवाई की रफ़्तार बढ़ने से यह अंतर कुछ कम हुआ।
देशभर में वर्षा की कमी जून के अंतिम सप्ताह में 40 प्रतिशत से अधिक थी, जो बाद में घटकर 18 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में वर्षा की कमी लगभग 37 प्रतिशत बनी रही। वहीं, मध्य और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में आगे भी शुष्क मौसम बने रहने की संभावना जताई गई है। इससे अलग-अलग क्षेत्रों में खेती की स्थिति भी अलग बनी हुई है।
खेती के साथ घरेलू खर्च और कर्ज़ चुकाने की चुनौती भी बढ़ी
कमज़ोर या असमान मानसून का असर केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रहता। जब खेती से होने वाली आय प्रभावित होती है, तो परिवार के रोज़मर्रा के खर्च, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य सेवाओं और अगली फसल की तैयारी पर भी असर पड़ता है।
बारिश में देरी होने पर छोटे किसानों को दोबारा बुवाई, अतिरिक्त सिंचाई या दूसरी फसल अपनाने के लिए अधिक पैसा खर्च करना पड़ता है। इससे आर्थिक दबाव बढ़ता है और समय पर ऋण चुकाना मुश्किल हो सकता है। कई ग्रामीण परिवारों को ऐसी परिस्थितियों में अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए महँगे अनौपचारिक स्रोतों से उधार भी लेना पड़ता है।
केवल ऋण नहीं, बचत और बीमा की व्यवस्था भी है ज़रूरी
बदलते मौसम के बीच किसानों की आर्थिक सुरक्षा के लिए केवल खेती का ऋण पर्याप्त नहीं माना जा सकता। समय पर औपचारिक कर्ज़ के साथ-साथ बचत की सुविधा, मौसम से जुड़े जोखिमों से सुरक्षा देने वाला बीमा और दीर्घकालिक बचत योजनाएँ भी ग्रामीण परिवारों के लिए महत्वपूर्ण होती जा रही हैं।
इसके साथ ही स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप वित्तीय सेवाएँ भी अहम हैं। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की बेहतर व्यवस्था है, वहाँ किसानों की स्थिति वर्षा आधारित खेती वाले इलाक़ों से अलग होती है। वहीं, जिन परिवारों की आय खेती के साथ पशुपालन, मज़दूरी या छोटे कारोबार से भी होती है, वे मौसम से जुड़े झटकों का सामना अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से कर पाते हैं। ऐसे में किसानों की ज़रूरतों के अनुरूप ऋण, लचीली भुगतान व्यवस्था और समय पर वित्तीय सहायता ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।