El Niño 2026 Alert: नवंबर तक रहेगा अल नीनो का असर, भारत में कमजोर मानसून से लेकर हीटवेव तक बढ़ सकता है खतरा

Preeti Nahar | Jun 02, 2026, 19:36 IST
Image credit : Gaon Connection Network
WMO की तरफ से अल नीने पर नया अपडेट जारी हुआ है। WMO के अनुसार प्रशांत महासागर में तेजी से गर्म हो रहा समुद्री जल एल नीनो के विकास को बढ़ावा दे रहा है। इसके प्रभाव से दुनिया के अधिकांश हिस्सों में जून-अगस्त के दौरान सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है। दक्षिण एशिया में मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे भारत में वर्षा की कमी, सूखे का खतरा, कृषि उत्पादन में गिरावट और बिजली की मांग बढ़ने जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि समय रहते तैयारी और सटीक मौसम पूर्वानुमान के जरिए इसके प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
मानसून पर अल नीनो असर

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि 2026 में एल नीनो (El Niño) की वापसी लगभग तय मानी जा रही है। संगठन के ताजा अपडेट के अनुसार जून से अगस्त 2026 के दौरान एल नीनो विकसित होने की संभावना 80 प्रतिशत है, जबकि इसके नवंबर तक बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक आंकी गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एल नीनो वैश्विक तापमान को बढ़ाने, वर्षा के पैटर्न को बदलने और चरम मौसम घटनाओं को बढ़ावा देने वाला प्रमुख जलवायु कारक है। भारत जैसे मानसून आधारित कृषि देश के लिए यह चेतावनी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।



क्या है अल नीनो?

इसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का समुद्री सतह तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। यह बदलाव दुनिया भर के मौसम तंत्र को प्रभावित करता है और वर्षा तथा तापमान के पैटर्न में बड़े परिवर्तन ला सकता है। आमतौर पर अल नीनो हर 2 से 7 वर्ष में विकसित होता है और 9 से 12 महीने तक प्रभावी रह सकता है। इसका सबसे बड़ा असर विकासशील देशों की कृषि, जल संसाधनों और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।



WMO ने क्या कहा?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार जून से अगस्त 2026 के बीच एल नीनो विकसित होने की संभावना 80 प्रतिशत है, जबकि इसके नवंबर 2026 तक बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक आंकी गई है। संगठन का कहना है कि अधिकांश वैश्विक जलवायु मॉडल इस बात की ओर संकेत कर रहे हैं कि यह एल नीनो कम से कम मध्यम तीव्रता का होगा और इसके मजबूत होने की भी संभावना है। इसके प्रभाव से दुनिया के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया जा सकता है। साथ ही सूखा, बाढ़, हीटवेव और अन्य चरम मौसम घटनाओं का जोखिम भी बढ़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इसे एक गंभीर वैश्विक जलवायु चेतावनी बताते हुए सरकारों से समय रहते तैयारी करने की अपील की है।



भारत पर क्या पड़ सकता है असर?

मानसून कमजोर पड़ सकता है

भारत की कृषि और जल संसाधन काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर हैं। दर्ज आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश एल नीनो वर्षों में देश में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। WMO से जुड़े दक्षिण एशियाई जलवायु मंच ने भी संकेत दिया है कि 2026 में दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत में मानसूनी वर्षा औसत से कम रह सकती है। यदि ऐसा होता है तो कई राज्यों में जल संकट और कृषि उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है।



खेती पर बढ़ेगा दबाव

कम बारिश का सबसे अधिक असर खरीफ सीजन की फसलों पर पड़ सकता है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी फसलें पर्याप्त वर्षा पर निर्भर रहती हैं। वर्षा में कमी आने पर किसानों की सिंचाई लागत बढ़ सकती है और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे कृषि क्षेत्र की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ने की आशंका है।



गेहूं और रबी फसलें भी हो सकती हैं प्रभावित

एल नीनो का असर केवल खरीफ फसलों तक सीमित नहीं रहता। यदि इसके कारण सर्दियों के दौरान तापमान सामान्य से अधिक रहता है, तो गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलें भी प्रभावित हो सकती हैं। हाल के वर्षों में बढ़ते तापमान और गर्म रातों को भारतीय गेहूं उत्पादन के लिए एक बड़ा खतरा माना गया है, जिससे दाने भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।



हीटवेव का खतरा बढ़ेगा

भारत पहले से ही लगातार तीव्र होती गर्मी और हीटवेव का सामना कर रहा है। एल नीनो की स्थिति में तापमान और अधिक बढ़ सकता है, जिससे लंबे समय तक चलने वाली गर्मी, अधिक तीव्र हीटवेव और शहरों में हीट स्ट्रेस जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इसका असर स्वास्थ्य, श्रम उत्पादकता और ऊर्जा खपत पर भी पड़ सकता है।



जल संकट और भूजल पर दबाव

यदि मानसून कमजोर रहता है तो जलाशयों में पानी का स्तर घट सकता है और सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता बढ़ सकती है। इससे कई राज्यों में भूजल दोहन तेज हो सकता है और पेयजल संकट गहरा सकता है। विशेष रूप से वे क्षेत्र अधिक प्रभावित हो सकते हैं जो पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं।



खाद्य सुरक्षा पर असर

भारत दुनिया के प्रमुख खाद्यान्न उत्पादक देशों में शामिल है और उसकी खाद्य सुरक्षा काफी हद तक मानसून और कृषि उत्पादन पर निर्भर करती है। यदि एल नीनो के कारण वर्षा में कमी आती है और फसल उत्पादन प्रभावित होता है, तो खाद्यान्न की उपलब्धता, सरकारी खरीद और भंडारण व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर बाजार कीमतों पर भी पड़ सकता है, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ने की आशंका रहेगी।



WMO ने क्यों कहा अभी तैयारी का समय है?

WMO का मानना है कि आधुनिक मौसम पूर्वानुमान प्रणाली और प्रारंभिक चेतावनी तंत्र सरकारों को समय रहते तैयारी करने का अवसर देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार भारत को जल संरक्षण, सूखा-सहनशील फसल किस्मों के विस्तार, मौसम आधारित कृषि सलाह, बेहतर सिंचाई प्रबंधन और हीट एक्शन प्लान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। समय पर उठाए गए कदम संभावित नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं और किसानों तथा आम नागरिकों को राहत दे सकते हैं।

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