बारिश की खुशखबरी के बीच बड़ा खतरा! अल नीनो के मजबूत संकेतों ने बढ़ाई टेंशन, समझिए मौसम का नया समीकरण
देश के कई हिस्सों में दक्षिण-पश्चिम मानसून तेजी से आगे बढ़ रहा है और अच्छी बारिश की उम्मीदें मजबूत हो रही हैं। गोवा में मानसून पूरी तरह पहुंच चुका है, जबकि महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भी इसकी सक्रियता बढ़ गई है। हालांकि, इसी बीच वैश्विक जलवायु संकेतकों से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने मौसम वैज्ञानिकों और कृषि क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है। प्रशांत महासागर में अल नीनो (El Niño) के संकेत लगातार मजबूत हो रहे हैं, जो आने वाले महीनों में मानसून की चाल और बारिश के वितरण को प्रभावित कर सकते हैं।
मौसम विभाग के अनुसार फिलहाल मानसून की प्रगति सामान्य से बेहतर दिखाई दे रही है, लेकिन दूसरी ओर समुद्री सतह के तापमान में बढ़ोतरी और वैश्विक मौसम पैटर्न में बदलाव भविष्य के लिए चुनौतीपूर्ण संकेत दे रहे हैं। यही वजह है कि मौसम विशेषज्ञ मानसून की प्रगति के साथ-साथ एल नीनो की गतिविधियों पर भी करीबी नजर बनाए हुए हैं।
इन राज्यों में तेजी से आगे बढ़ा मानसून
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार शनिवार को मानसून ने पश्चिमी तट और दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में और प्रगति की। इसके साथ ही पूरा गोवा मानसून की चपेट में आ गया है। इसके अलावा कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में मानसून पहुंच चुका है। तमिलनाडु के अधिकांश क्षेत्रों में भी बारिश की गतिविधियां बढ़ी हैं। पूर्वोत्तर भारत में भी मानसून ने अपनी पकड़ मजबूत की है और मिजोरम व मणिपुर तक पहुंच गया है। शनिवार दोपहर तक मानसून की उत्तरी सीमा महाराष्ट्र के देवगढ़, कर्नाटक के कोप्पल, आंध्र प्रदेश के अनंतपुर, तमिलनाडु के चेन्नई और मिजोरम की राजधानी आइजोल तक पहुंच चुकी थी।
अगले 2-3 दिनों में और बढ़ेगा मानसून
आईएमडी का कहना है कि अगले दो से तीन दिनों के दौरान मानसून महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु के शेष हिस्सों और पूर्वोत्तर भारत के बाकी क्षेत्रों में भी आगे बढ़ सकता है। शनिवार शाम के उपग्रह चित्रों में कर्नाटक के हुबली, बेलगावी और कलबुर्गी, महाराष्ट्र के कोल्हापुर और रत्नागिरी, आंध्र प्रदेश के हैदराबाद, काकीनाडा और विशाखापत्तनम, ओडिशा के बड़े हिस्सों, छत्तीसगढ़ के जगदलपुर और पश्चिम बंगाल में घने वर्षा वाले बादल दिखाई दिए।
मुंबई और दक्षिण गुजरात में गरज-चमक के आसार
मौसम विभाग ने संकेत दिया है कि 11 जून के आसपास एक नया पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हो सकता है। यह प्रणाली अरब सागर के उत्तर-पूर्वी हिस्से में पहुंचकर चक्रवाती परिसंचरण का रूप ले सकती है। यदि ऐसा होता है तो मुंबई और दक्षिण गुजरात के कई इलाकों में लगातार कई दिनों तक गरज-चमक और बारिश की गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं।
क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ी चिंता?
मानसून की अच्छी प्रगति के बीच सबसे बड़ी चिंता अल नीनो को लेकर है। वैश्विक जलवायु संकेतकों के अनुसार प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस की उस महत्वपूर्ण सीमा को पार कर चुका है, जिसे एल नीनो की शुरुआत का प्रमुख संकेत माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों का अनुमान है कि जून और जुलाई के दौरान एल नीनो विकसित होने की संभावना 80 से 90 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह स्थिति नवंबर से जनवरी के बीच अपने चरम पर भी पहुंच सकती है।
प्रशांत महासागर में तेजी से बदल रहा मौसम पैटर्न
विशेषज्ञों के मुताबिक प्रशांत महासागर की स्थिति तेजी से सामान्य (Neutral) अवस्था से एल नीनो की ओर बढ़ रही है। हालांकि समुद्री बदलावों का असर वायुमंडलीय परिस्थितियों पर कुछ समय बाद दिखाई देता है, लेकिन इसके शुरुआती प्रभाव वैश्विक मौसम प्रणाली पर पड़ने लगते हैं। अमेरिका के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर के अनुसार, जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्री तापमान लगातार तीन महीनों तक कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक बना रहता है और इसके साथ वायुमंडलीय बदलाव भी देखने को मिलते हैं, तब उसे एल नीनो माना जाता है।
ऑस्ट्रेलिया ने भी दिए संकेत
ऑस्ट्रेलिया के मौसम ब्यूरो का कहना है कि फिलहाल ENSO (अल नीनो-दक्षिणी दोलन) तटस्थ स्थिति में है, लेकिन कई संकेतक तेजी से एल नीनो की दिशा में बढ़ रहे हैं।
किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह स्थिति?
भारत की कृषि काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। ऐसे में एल नीनो की स्थिति मजबूत होने पर वर्षा के वितरण में असमानता, कुछ क्षेत्रों में कम बारिश और कुछ इलाकों में मौसम की चरम घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि फिलहाल मानसून सामान्य गति से आगे बढ़ रहा है, लेकिन आने वाले महीनों में एल नीनो की गतिविधियां मौसम की तस्वीर बदल सकती हैं। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों, कृषि विभागों और नीति निर्माताओं को मानसून के साथ-साथ एल नीनो की स्थिति पर भी लगातार नजर रखनी होगी, क्योंकि इसका असर खरीफ फसलों, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।