अल नीनो का खतरा! कमजोर मानसून से फसल, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर?
भारत के लिए 2026 का मानसून चिंताजनक संकेत दे रहा है। मौसम विभाग ने अनुमान जताया है कि इस साल अल नीनो के विकसित होने की संभावना है, जिससे जून से सितंबर के बीच मानसून के दूसरे हिस्से में बारिश कमजोर पड़ सकती है। पहले भी अल नीनो वाले वर्षों में भारत में सामान्य से कम बारिश हुई है, जिससे कई बार गंभीर सूखे की स्थिति बनी, फसलें खराब हुईं और कुछ अनाजों के निर्यात पर रोक लगानी पड़ी।
अल नीनो क्या है और यह मानसून को कैसे प्रभावित करता है?
अल नीनो दरअसल प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से के गर्म होने की स्थिति है, जो वायुमंडलीय परिसंचरण को बदल देता है और भारतीय उपमहाद्वीप पर मानसूनी हवाओं को कमजोर कर देता है। हालांकि अल नीनो का संबंध कमजोर मानसून से होता है, लेकिन पिछले 70 वर्षों में 17 अल नीनो घटनाओं में से कम से कम पांच बार भारत में सामान्य या उससे अधिक बारिश भी दर्ज की गई है। लेकिन हाल के छह अल नीनो वर्षों में बारिश सामान्य से कम ही रही है। 2009 में एक कमजोर अल नीनो के कारण भारत में बारिश 78.2% तक गिर गई थी, जो 37 वर्षों में सबसे कम थी। मौसम मॉडल संकेत दे रहे हैं कि 2026 का अल नीनो मजबूत हो सकता है।
भारत के लिए मानसून क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत में कुल सालाना बारिश का लगभग 70% हिस्सा मानसून से आता है। यह कृषि क्षेत्र के लिए बेहद जरूरी है, जो लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का करीब 18% हिस्सा है और देश की लगभग आधी आबादी को रोजगार देता है। यदि बारिश सामान्य से कम होती है, तो चावल, कपास और सोयाबीन जैसी फसलों का उत्पादन घट सकता है। साथ ही मिट्टी में नमी कम होने से गेहूं और सरसों जैसी रबी फसलें भी प्रभावित हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को कुछ कृषि उत्पादों के निर्यात पर रोक लगानी पड़ सकती है, जैसा कि 2023 के अल नीनो वर्ष में हुआ था। इसके अलावा भारत को खाद्य तेलों—खासकर पाम ऑयल और सोया ऑयल—का आयात बढ़ाना पड़ सकता है।
ऊर्जा और बिजली पर असर
कमजोर मानसून का असर बिजली उत्पादन पर भी पड़ेगा। जलविद्युत उत्पादन, जो कुल बिजली मिश्रण का करीब 6% है, बारिश कम होने से घट सकता है।
महंगाई और RBI की नीति पर असर
भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य पदार्थों का हिस्सा लगभग एक-तिहाई है, जिसे केंद्रीय बैंक अपनी मौद्रिक नीति तय करते समय ध्यान में रखता है। पिछले दो वर्षों में अच्छी बारिश के कारण खाद्य कीमतों और महंगाई में राहत मिली, जिससे ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश बनी। लेकिन यदि इस साल बारिश कम रहती है और ईरान संघर्ष के कारण कमोडिटी कीमतें बढ़ती हैं, तो महंगाई बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं। कमजोर आर्थिक वृद्धि और बढ़ती महंगाई विदेशी निवेश को प्रभावित कर सकती है और रुपये पर भी दबाव बढ़ा सकती है, जो 2026 में एशिया की कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल है।