Monsoon 2026: अल नीनो का असर बढ़ा, मानसून में 12 फीसदी कमी; जानिए किन राज्यों पर मंडराया संकट
देश में इस साल मानसून की चाल उम्मीद के मुताबिक नहीं रही है। कई हिस्सों में बारिश की कमी ने किसानों की चिंता बढ़ाई है, वहीं कुछ क्षेत्रों में अच्छी बारिश से स्थिति थोड़ी संभली है। पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में लिखित जवाब के ज़रिए मानसून 2026 की अब तक की स्थिति, बारिश की कमी और अल नीनो के असर से जुड़ी अहम जानकारी साझा की है।
मौसम विभाग ने अप्रैल में ही इस साल मानसून के सामान्य से कम रहने का अनुमान जताया था। इसके बाद जारी किए गए दूसरे अनुमान में बारिश का पूर्वानुमान और नीचे आया। अब तक के आँकड़े भी इसी दिशा की ओर इशारा कर रहे हैं। हालांकि जुलाई में कुछ इलाक़ों में हुई अच्छी बारिश से देश के कुल आँकड़े में थोड़ी राहत मिली, लेकिन कई राज्यों और ज़िलों में बारिश की कमी अभी भी बनी हुई है।
अप्रैल में ही कम बारिश का मिला था संकेत
मौसम विभाग ने 13 अप्रैल 2026 को मानसून को लेकर अपना पहला अनुमान जारी किया था। इसमें पूरे देश में दीर्घ अवधि के औसत की तुलना में करीब 92% बारिश होने की संभावना जताई गई थी। बाद में दूसरे अनुमान में इसे घटाकर 90% कर दिया गया। इसी दौरान मौसम विभाग ने अल नीनो की स्थिति बनने की आशंका भी जताई थी। मानसून की शुरुआत के बाद बारिश के आँकड़ों ने इन आशंकाओं को काफी हद तक सही साबित किया। जून में देशभर में सामान्य से 35 प्रतिशत कम बारिश हुई। इस दौरान करीब 70 प्रतिशत ज़िलों में बारिश की कमी दर्ज की गई, जिससे खेती और जल उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी।
जुलाई में हुई अच्छी बारिश से कुछ राहत
जुलाई में तस्वीर थोड़ी बदली। मध्य भारत के कई हिस्सों में तेज़ बारिश हुई, जिसका असर देश के कुल बारिश के आँकड़ों पर भी दिखाई दिया। महीने के दौरान देश में औसत से करीब 1 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई। हालांकि, इसका फायदा सभी क्षेत्रों को समान रूप से नहीं मिला। जुलाई के बाद भी देश के करीब 47% ज़िलों में बारिश सामान्य से कम रही। 2 अगस्त 2026 तक पूरे मानसून सीज़न में देश में कुल बारिश दीर्घ अवधि के औसत से 12% कम दर्ज की गई।
अल नीनो से प्रभावित हुआ मानसून
सरकार के मुताबिक, जून 2026 में समुद्र की सतह पर कमजोर अल नीनो की स्थिति बनी थी, जो आगे चलकर मध्यम स्तर तक पहुँच गई। इस मौसमी बदलाव का असर मानसून की गतिविधियों पर पड़ा और देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रही। बारिश की कमी का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक कम बारिश होने पर मिट्टी में नमी घट सकती है, बारिश पर निर्भर खेती प्रभावित हो सकती है और जलाशयों में पानी की उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ सकता है। ऐसे हालात में किसानों को फसल की योजना बनाने में मुश्किल होती है और सिंचाई की जरूरत बढ़ जाती है।
बिहार में सबसे ज्यादा बारिश की कमी
5 अगस्त 2026 तक उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, देश के 16 इलाक़ों में सामान्य से 20 से 38% तक कम बारिश दर्ज की गई। इनमें बिहार सबसे अधिक प्रभावित रहा, जहाँ बारिश में 38% की कमी दर्ज हुई। इसके बाद अरुणाचल प्रदेश में 36%, असम और मेघालय में 35% तथा तटीय आंध्र प्रदेश में भी 35% कम बारिश हुई। पंजाब में 33%, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड में 30%, हरियाणा और दिल्ली में 26% तथा केरल में 22% की कमी दर्ज की गई।
खेती और पानी पर बढ़ सकता है दबाव
जिन इलाक़ों में लगातार बारिश कम हुई है, वहाँ खरीफ फसलों पर इसका असर पड़ने की आशंका है। खासकर बारिश पर निर्भर खेती वाले क्षेत्रों में मिट्टी की नमी कम होने से फसलों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा स्थानीय जल स्रोतों और जलाशयों पर भी दबाव बढ़ने की संभावना है। सरकार का कहना है कि मौसम विभाग इन परिस्थितियों पर लगातार निगरानी रख रहा है। संभावित मौसम बदलाव और जोखिम की जानकारी केंद्र और राज्य की संबंधित एजेंसियों को समय-समय पर दी जा रही है, ताकि खेती, जल प्रबंधन और आपदा तैयारी से जुड़े फैसले समय रहते लिए जा सकें।
आगे भी निगरानी जारी
इस साल मानसून का प्रदर्शन एक जैसा नहीं रहा है। कुछ क्षेत्रों में जुलाई की बारिश ने राहत दी, तो कई हिस्से अब भी कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों की बारिश खेती और पानी की स्थिति के लिए महत्वपूर्ण रहने वाली है। सरकार और मौसम विभाग की निगरानी का उद्देश्य यही है कि जिन क्षेत्रों में बारिश की कमी ज्यादा है, वहाँ संभावित कृषि और जल संकट के लिए समय रहते तैयारी की जा सके। खासकर बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, पंजाब और पूर्वोत्तर के प्रभावित इलाक़ों में आगे की बारिश पर सभी की नज़र बनी हुई है।