अल नीनो ने फिर दी दस्तक! प्रशांत महासागर में हुआ एक्टिव; क्या इस बार सूखा और महंगाई लाएगा साथ?
दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों की निगाहें एक बार फिर अल नीनो (El Niño) पर टिक गई हैं। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो के सक्रिय होने की पुष्टि के बाद वैश्विक स्तर पर मौसम में बड़े बदलावों की आशंका बढ़ गई है। इसके प्रभाव से आने वाले महीनों में कई क्षेत्रों में सूखा, बाढ़, भीषण गर्मी और तापमान में असामान्य उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति पर भी इसका व्यापक असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (JMA) ने प्रशांत महासागर में अल नीनो के विकसित होने की पुष्टि की है। यह 2023 के बाद पहली बार है जब यह जलवायु घटना फिर से सक्रिय हुई है और शुरुआती संकेत बताते हैं कि यह हाल के वर्षों के सबसे शक्तिशाली अल नीनो में से एक हो सकता है।
क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसके कारण वैश्विक मौसम प्रणाली प्रभावित होती है और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में वर्षा, तापमान तथा हवाओं के पैटर्न में बदलाव देखने को मिलता है। इसका असर कई बार महीनों तक बना रहता है और कृषि से लेकर अर्थव्यवस्था तक पर प्रभाव डाल सकता है।
कृषि क्षेत्र के लिए बढ़ी चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत अल नीनो की स्थिति वैश्विक कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, पाम ऑयल, कॉफी, कोको, कपास, गेहूं और चावल जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। वैश्विक फ्यूचर्स ब्रोकरेज कंपनी मारेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अतीत में आए कई शक्तिशाली अल नीनो के दौरान प्रमुख कृषि जिंसों के उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई थी। यदि इस बार भी इसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है तो खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी और आपूर्ति संबंधी चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
भारत के मानसून पर भी रहेगी नजर
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए अल नीनो का विशेष महत्व है क्योंकि देश की खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, अल नीनो की सक्रियता कई बार भारतीय मानसून को कमजोर कर सकती है, जिससे वर्षा में कमी और कृषि उत्पादन पर असर पड़ सकता है। हालांकि, मौसम की वास्तविक स्थिति और मानसून पर इसका प्रभाव आने वाले महीनों में ही स्पष्ट हो सकेगा, लेकिन इस घटनाक्रम पर सरकार और कृषि क्षेत्र की पैनी नजर बनी हुई है।
ऊर्जा क्षेत्र पर भी पड़ सकता है असर
अल नीनो के कारण बढ़ने वाली गर्मी बिजली की मांग को बढ़ा सकती है। वहीं सूखे की स्थिति जलविद्युत परियोजनाओं के उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। इससे कई देशों में बिजली आपूर्ति और ऊर्जा प्रबंधन की चुनौतियां बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती ऊर्जा मांग और घटते जल संसाधन कई क्षेत्रों में बिजली ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकते हैं।
साल के अंत में और बढ़ सकता है प्रभाव
मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अल नीनो का प्रभाव दिसंबर 2026 या जनवरी 2027 के दौरान चरम पर पहुंच सकता है। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों में सामान्य से अधिक ठंडी और नम सर्दी देखने को मिल सकती है, जबकि ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में सूखे और जंगल की आग की घटनाएं बढ़ सकती हैं। इसके अलावा दुनिया के कई क्षेत्रों में मौसम की चरम घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
पहले भी कर चुका है भारी नुकसान
इतिहास बताता है कि शक्तिशाली अल नीनो घटनाएं व्यापक आर्थिक और मानवीय नुकसान का कारण बन सकती हैं। वर्ष 1997 में आए एक प्रबल अल नीनो के कारण दुनिया भर में कम से कम 30 हजार लोगों की मौत हुई थी और करीब 100 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ था। वहीं, डार्टमाउथ कॉलेज के 2023 के एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया था कि अल नीनो के दीर्घकालिक प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था को खरबों डॉलर का नुकसान पहुंचा सकते हैं।
वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में अल नीनो जैसी घटनाओं का प्रभाव और अधिक गंभीर हो सकता है। ऐसे में खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादन, जल संसाधन प्रबंधन और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर देशों को पहले से अधिक सतर्क रहने की जरूरत होगी।