‘किसान दीदी’ बनीं मिसाल: पराली जलाने से बचाए 600 बीघा खेत, किसानों को दिखाया नया रास्ता

Preeti Nahar | May 05, 2026, 16:46 IST
Image credit : Gaon Connection Network
मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के धुलेट गाँव की पपीता रावत ने पराली जलाने की समस्या का समाधान निकाला है। उन्होंने किसानों को जागरूक कर स्ट्रा रीपर मशीन से भूसा बनाने के लिए प्रेरित किया। जिसके बाद पपीता रावत की इस पहल से 600 बीघा से अधिक खेतों में पराली नहीं जली। जिससे किसानों को ये फायदा हुआ कि किसान अब उस भूसे से पशुओं के चारे का व्यवसाय कर रहे हैं। जानिए समस्या का हल खोजने की इस कहानी की हीरो पपीता रावत के बारे में।
आजीविका मिशन के तहत शुरू हुई पहल

उत्तर भारत में फसल कटाई के बाद पराली जलाने की समस्या हर साल गंभीर रूप ले लेती है। इससे न सिर्फ प्रदूषण बढ़ता है बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित होती है। लेकिन मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के धुलेट गाँव की एक महिला किसान ने इस समस्या का अनोखा समाधान निकालकर मिसाल पेश की है। गाँव की रहने वाली श्रीमती पपीता रावत ने किसानों को जागरूक कर और वैकल्पिक समाधान उपलब्ध कराकर पराली जलाने की समस्या को काफी हद तक कम किया है।



आर्थिक तंगी से शुरू हुआ सफर

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पपीता रावत की कहानी संघर्ष से शुरू हुई। शुरुआती दिनों में वह घर पर रहती थीं, जबकि उनके पति महेश मजदूरी करके परिवार चलाते थे। आर्थिक स्थिति कमजोर थी और परिवार को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता था। इसी दौरान गाँव में आजीविका मिशन के अधिकारी पहुंचे और महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़ने की पहल की। पपीता रावत ने द्वारकाधीश सेल्फ हेल्प ग्रुप से जुड़कर अपने जीवन में बदलाव की शुरुआत की। उन्होंने पहले सिलाई मशीन लेकर काम शुरू किया, जिससे परिवार की आमदनी में मदद मिलने लगी।



स्ट्रा रीपर मशीन ने बदली किस्मत

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कृषि गतिविधियों में रुचि होने के कारण पपीता ने आगे बढ़ने का फैसला किया। उन्होंने स्वयं सहायता समूह और बैंक से ऋण लेकर स्ट्रा रीपर मशीन खरीदी। यह मशीन खेतों में बची पराली को इकट्ठा कर उसे भूसे में बदलने का काम करती है। मशीन खरीदने के बाद उन्होंने गाँव और आसपास के किसानों को समझाया कि पराली जलाने से नुकसान ज्यादा है, जबकि उससे भूसा बनाकर अतिरिक्त कमाई की जा सकती है।



600 बीघा खेतों में नहीं जली पराली

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पपीता रावत की मेहनत का असर जल्द ही दिखने लगा। उन्होंने धुलेट गाँव और आसपास के किसानों को लगातार जागरूक किया। नतीजा यह हुआ कि इस साल 600 बीघा से अधिक खेतों में पराली जलाने से बचाया गया। अब किसान पराली जलाने की बजाय उससे भूसा तैयार कर रहे हैं, जिसका इस्तेमाल पशुओं के चारे यानी कैटल फीड के रूप में किया जा रहा है। इससे किसानों को आर्थिक लाभ भी हो रहा है।



आजीविका मिशन से मिला सहयोग

DAY आजीविका मिशन की जिला प्रबंधक गायत्री राठौड़ ने बताया कि पपीता रावत के समूह को आस्था संकुल संगठन खुड़ैल से जोड़ा गया। उन्होंने कहा कि पपीता एक सफल ‘किसान दीदी’ के रूप में काम कर रही हैं। कृषि के साथ-साथ वह पशुपालन भी कर रही हैं और चार मवेशियों के जरिए दूध उत्पादन का व्यवसाय भी संभाल रही हैं।



पराली जलाने से क्या नुकसान होता है?

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कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार पराली जलाने से खेतों की उर्वर क्षमता कम हो जाती है। इससे मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव और बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा पराली जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण और ग्लोबल वॉर्मिंग को बढ़ावा देती हैं। अगले सीजन की फसल पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ता है।



प्रशासन भी कर रहा प्रोत्साहित

जिला पंचायत इंदौर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी सिद्धार्थ जैन ने बताया कि प्रशासन और कृषि विभाग लगातार किसानों को पराली न जलाने के लिए जागरूक कर रहे हैं। नियमों के तहत पराली जलाने पर जुर्माने का भी प्रावधान है। उन्होंने कहा कि पपीता रावत जैसी महिला किसान न सिर्फ आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि पूरे समाज और कृषि क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव ला रही हैं।



दूसरों के लिए बनी प्रेरणा

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धुलेट गाँव की यह पहल दिखाती है कि अगर जागरूकता, तकनीक और सामूहिक प्रयास हो तो पराली जलाने जैसी बड़ी समस्या का समाधान संभव है। पपीता रावत आज कई किसानों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक मजबूत उदाहरण पेश कर रही हैं।

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