गाँव से निकलीं, दुनिया में चमकींः कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के गाँव की लड़कियों का दबदबा, जानें चैंपियंस की कहानी
अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में जब भारत का राष्ट्रगान बजता है और तिरंगा फहराया जाता है, तो पूरा देश गर्व महसूस करता है। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे खिलाड़ियों के अपने ज़मीनी संघर्ष, गाँव-देहात की चुनौतियाँ, संसाधनों की कमी और कभी न हार मानने वाला जज्बा छिपा होता है। छोटे-छोटे गाँवों और साधारण परिवारों से निकलकर इन एथलीटों ने कड़ी मेहनत के दम पर दुनिया के सबसे बड़े खेल मंचों पर भारत का नाम रोशन किया है।
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी खेल सुविधाओं की कमी एक बहुत बड़ी सच्चाई है। न तो बच्चों के पास दौड़ने के लिए पक्के ट्रैक होते हैं, न ही शूटिंग जैसे खेलों के लिए आधुनिक उपकरण। इसके बावजूद, गाँव की मिट्टी में पसीना बहाकर तैयार हुए ये खिलाड़ी न केवल सामाजिक और आर्थिक तंगी से लड़ते हैं, बल्कि अपनी अटूट इच्छाशक्ति के बल पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जब ये खिलाड़ी पदक जीतते हैं, तो यह सफलता केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं होती, बल्कि पूरे गाँव और उस हर साधारण परिवार की जीत होती है जिसने सीमित साधनों में बड़े सपने देखने का साहस किया। इन एथलीटों की कहानियाँ यह साबित करती हैं कि जब लगन और संघर्ष सच्चा हो, तो गाँव-देहात की पगडंडियों से शुरू हुआ सफ़र भी दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित खेल मंचों के शीर्ष पोडियम तक पहुँच सकता है।
दो साल की उम्र में पोलियो, फिर भी नहीं मानी हार; शर्मिला ढांकर
हरियाणा के महेंद्रगढ़ ज़िले के छितरोली गाँव की रहने वाली शर्मिला ढांकर ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 की पैरा एथलेटिक्स शॉटपुट (एफ़-57 वर्ग) स्पर्धा में 9.81 मीटर का थ्रो फेंककर प्रथम स्थान हासिल किया और स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उनकी यह सफलता वर्षों के संघर्ष का परिणाम है। महज़ दो वर्ष की उम्र में पोलियो के कारण उनका एक पैर प्रभावित हो गया था। विवाह के बाद उन्हें घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। दो बेटियों की परवरिश के लिए उन्होंने मजदूरी तक की। खेल में आगे बढ़ने की उनकी लगन को देखते हुए परिवार ने उनकी ट्रेनिंग का खर्च उठाने के लिए अपनी ज़मीन तक बेच दी। शर्मिला ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को स्वर्ण पदक दिलाकर यह साबित कर दिया कि हौसले के आगे मुश्किलें छोटी पड़ जाती हैं।
बांस के डंंडों से अभ्यास करने वाली मीराबाई बनीं कॉमनवेल्थ चैंपियन
मणिपुर के नोंगपोक काकचिंग गाँव की रहने वाली मीराबाई चानू ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 की 48 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में 190 किलोग्राम का कुल भार उठाकर प्रथम स्थान हासिल किया और स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उनकी सफलता के पीछे वर्षों का संघर्ष छिपा है। बचपन में वे परिवार की मदद के लिए जंगलों से सिर पर लकड़ियों के भारी गट्ठर उठाकर लाती थीं। गाँव में आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएँ नहीं थीं, इसलिए शुरुआती दिनों में उन्होंने बाँस के डंडों से भार उठाने का अभ्यास किया। खेल प्रशिक्षण के लिए उन्हें रोज़ लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित स्पोर्ट्स सेंटर तक पहुँचने के लिए ट्रक चालकों से लिफ्ट लेनी पड़ती थी। करियर के दौरान गंभीर चोटों का सामना करने के बावजूद मीराबाई ने हार नहीं मानी।
कम उम्र में दिखाया बड़ा निशाना, ईशा सिंह ने जीता कॉमनवेल्थ स्वर्ण
हैदराबाद की रहने वाली ईशा सिंह ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 की महिला 25 मीटर पिस्तौल शूटिंग स्पर्धा में 40 हिट्स के साथ प्रथम स्थान हासिल करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया। कम उम्र में ही उन्होंने निशानेबाज़ी जैसे चुनौतीपूर्ण खेल को चुना और लगातार मेहनत के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई। शुरुआती दौर में सीमित प्रशिक्षण सुविधाओं और बड़े मुकाबलों के मानसिक दबाव के बीच उन्होंने अपने खेल पर लगातार काम किया। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अनुभवी खिलाड़ियों के बीच खुद को साबित करना आसान नहीं था, लेकिन ईशा ने धैर्य और सटीक निशाने के दम पर फाइनल में शानदार प्रदर्शन किया।
चारा काटने से कॉमनवेल्थ तक, हरजिंदर कौर ने जीता रजत पदक
पंजाब के मेहस गाँव की रहने वाली हरजिंदर कौर ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 की 69 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में 227 किलोग्राम का कुल भार उठाकर दूसरा स्थान हासिल किया और रजत पदक अपने नाम किया। किसान परिवार से आने वाली हरजिंदर का बचपन आर्थिक कठिनाइयों के बीच बीता। खेतों में मवेशियों के लिए चारा काटने वाली टोका मशीन चलाते हुए उनके हाथ स्वाभाविक रूप से मजबूत हुए, जिसने आगे चलकर वेटलिफ्टिंग में भी उनकी मदद की। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि उनके पिता कई बार प्रशिक्षण और हॉस्टल तक आने-जाने के लिए बस किराये का इंतज़ाम भी मुश्किल से कर पाते थे।
गाँव से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँची ज्ञानेश्वरी यादव
छत्तीसगढ़ के राजनांदन गाँव की रहने वाली ज्ञानेश्वरी यादव ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 की 53 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में 199 किलोग्राम का कुल भार उठाकर दूसरा स्थान हासिल किया और रजत पदक अपने नाम किया। गाँव में आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं, पेशेवर जूतों और संतुलित खेल पोषण जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव होने के बावजूद उन्होंने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध साधनों से ही अभ्यास जारी रखा। लगातार मेहनत और अनुशासन के दम पर ज्ञानेश्वरी ने प्रतियोगिता में अपनी सभी छह लिफ्ट सफलतापूर्वक पूरी कीं और शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक जीता।
किराने की दुकान से कॉमनवेल्थ तक,बिंदियारानी ने जीता कांस्य पदक
मणिपुर के लांगथाबल कुंजा गाँव की रहने वाली बिंदियारानी देवी ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 की 58 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में 199 किलोग्राम का कुल भार उठाकर तीसरा स्थान हासिल किया और कांस्य पदक अपने नाम किया। उनका बचपन आर्थिक चुनौतियों के बीच बीता। परिवार एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाकर अपना गुज़ारा करता था, जिससे महँगी अकादमियों में प्रशिक्षण लेना उनके लिए संभव नहीं था। घर के कामों में परिवार का हाथ बँटाने और दुकान संभालने के बाद वे देर रात तक अभ्यास करती थीं। इसी निरंतर प्रयास का परिणाम रहा कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत के लिए कांस्य पदक जीता।