Green Manure Dhaincha Farming: अब खाद खरीदने की जरूरत नहीं, खेत में ही उगाएं प्राकृतिक ढैंचा खाद, 50% सब्सिडी पर मिलेगा बीज

Gaon Connection | Apr 26, 2026, 11:31 IST
उत्तर प्रदेश सरकार खरीफ सीजन 2026 के लिए किसानों को ढैंचा की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी और रासायनिक खाद पर निर्भरता घटेगी। सरकार 45,000 क्विंटल ढैंचा बीज 50 प्रतिशत सब्सिडी पर उपलब्ध कराएगी। यह पहल टिकाऊ खेती को बढ़ावा देगी और किसानों की आय में सुधार लाएगी।

Green Manure Dhaincha Farming: उत्तर प्रदेश सरकार ने खरीफ सीजन 2026 की तैयारी शुरू करते हुए किसानों के बीच हरी खाद को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ढैंचा (Dhaincha) की खेती को प्रोत्साहित कर रही है, ताकि मिट्टी की उर्वरता बढ़े, रासायनिक खाद पर निर्भरता घटे और खेती की लागत कम हो। कृषि विभाग ने इस बार 45,000 क्विंटल ढैंचा बीज और 4 लाख मिनीकिट किसानों में वितरित करने की योजना बनाई है। यह बीज किसानों को 50 प्रतिशत सब्सिडी पर उपलब्ध कराया जाएगा।



क्या है ढैंचा और क्यों है फायदेमंद?

ढैंचा एक प्रमुख हरी खाद वाली फसल है, जिसे खेत में बोने के बाद कुछ समय में जुताई कर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इससे खेत में जैविक पदार्थ बढ़ता है और नाइट्रोजन की मात्रा प्राकृतिक रूप से बढ़ती है। धान, गन्ना, मक्का और दूसरी खरीफ फसलों से पहले ढैंचा बोने से मिट्टी की सेहत बेहतर होती है और अगली फसल की पैदावार में सुधार होता है।



किसानों को कैसे मिलेगा लाभ?

कृषि विभाग के अनुसार किसानों को ढैंचा बीज मिनीकिट और सामान्य वितरण दोनों माध्यमों से दिया जाएगा। मिनीकिट छोटे और सीमांत किसानों के लिए उपयोगी होंगे, ताकि ज्यादा से ज्यादा किसान इस योजना से जुड़ सकें। 50 फीसदी सब्सिडी से किसानों पर आर्थिक बोझ कम होगा और वे आसानी से हरी खाद तकनीक अपना सकेंगे।



सरकार का उद्देश्य क्या है?

राज्य सरकार का लक्ष्य रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को कम करना और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देना है। लगातार रासायनिक खाद के उपयोग से कई इलाकों में मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। ऐसे में ढैंचा जैसी हरी खाद फसलें मिट्टी को दोबारा उपजाऊ बनाने में मददगार मानी जाती हैं।



कृषि मंत्री के नेतृत्व में अभियान

कृषि मंत्री श्री एस.पी. सिंह बघेल के नेतृत्व में विभाग किसानों को जागरूक करने और योजनाओं का लाभ गाँव-गाँव तक पहुंचाने की तैयारी कर रहा है। कृषि अधिकारियों को बीज वितरण, प्रचार-प्रसार और किसानों को तकनीकी सलाह देने के निर्देश दिए गए हैं। क्योंकि खरीफ सीजन में धान और अन्य फसलों की बुवाई से पहले खेत तैयार करने का समय होता है। यदि किसान पहले ढैंचा बोकर उसे खेत में मिला दें, तो अगली फसल को प्राकृतिक पोषण मिलता है। इससे यूरिया और अन्य खादों की जरूरत कम हो सकती है।



अब खाद खरीदने की जरूरत नहीं, खेत में ही उगाएं प्राकृतिक खाद

ढैंचा हरी खाद के रूप में बेहद उपयोगी फसल है, जिसे अप्रैल से जुलाई के बीच बोना सबसे बेहतर माना जाता है। एक एकड़ खेत के लिए करीब 20 से 25 किलो बीज पर्याप्त होता है। बुवाई से पहले खेत की हल्की जुताई कर लें और मिट्टी में थोड़ी नमी बनाए रखें। बेहतर अंकुरण के लिए बीज को एक रात पहले पानी में भिगोकर रखा जा सकता है। किसान इसे खेत में छिड़काव विधि से आसानी से बो सकते हैं। खास बात यह है कि ढैंचा की फसल में यूरिया या अन्य रासायनिक खाद की जरूरत नहीं पड़ती। केवल थोड़ी मात्रा में फास्फोरस देने से फसल घनी और अच्छी तैयार हो जाती है।



सिर्फ 50 दिन में तैयार होगी सस्ती जैविक खाद

ढैंचा की फसल तेजी से बढ़ती है और लगभग 45 से 50 दिनों में करीब 3 फीट ऊंचाई तक पहुंच जाती है। जैसे ही इसमें फूल आने लगें, उसी समय इसे खेत में पलट देना चाहिए। इसके लिए खड़ी फसल पर हैरो या कल्टीवेटर चलाकर पौधों को मिट्टी में मिला दें और खेत में हल्का पानी भर दें। नमी मिलने पर ढैंचा जल्दी गलकर मिट्टी में मिल जाता है और प्राकृतिक खाद का काम करता है।



कम खर्च में मिलेगा बड़ा फायदा

ढैंचा की खेती में बीज और जुताई मिलाकर लगभग 1500 रुपये प्रति एकड़ तक खर्च आता है, जबकि इससे मिलने वाली जैविक खाद की कीमत बाजार में कहीं ज्यादा होती है। एक बार ढैंचा उगाने से खेत को 35 से 40 किलो तक प्राकृतिक नाइट्रोजन मिल सकती है, जिससे अगली फसल की पैदावार बेहतर होती है और रासायनिक खाद पर खर्च कम हो जाता है।



किसानों के लिए सलाह

किसान समय रहते कृषि विभाग से संपर्क करें और उपलब्ध मिनीकिट व सब्सिडी योजना का लाभ लें। ढैंचा की समय पर बुवाई और उचित प्रबंधन से मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी और आने वाले सीजन में उत्पादन बेहतर हो सकता है। सरकार का मानना है कि उत्तर प्रदेश सरकार की यह पहल प्राकृतिक और टिकाऊ खेती की दिशा में अहम कदम है। यदि किसान बड़े पैमाने पर ढैंचा जैसी हरी खाद अपनाते हैं, तो इससे मिट्टी, उत्पादन और आय तीनों में सुधार संभव है।

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