नेपाल के एडवेंचर पर्यटन पर बड़ा संकट! हिमालयी आपदा के बाद ‘गंभीर चेतावनी’, पीक सीजन से पहले कैंसिल होने लगीं बुकिंग
नेपाल के मशहूर पर्वतीय और एडवेंचर पर्यटन उद्योग के सामने हिमालयी बाढ़ ने नई चुनौती खड़ी कर दी है। चीन की सीमा से लगे नेपाल के इलाकों में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद स्थानीय पर्वतीय पर्यटन संगठनों और हॉस्टल संचालकों ने पर्यटन कारोबार को लेकर चिंता जताई है। यह आपदा ऐसे समय आई है, जब नेपाल का सबसे व्यस्त पर्यटन सीजन 15 सितंबर से 15 नवंबर के बीच शुरू होने वाला है। टूर ऑपरेटरों और हॉस्टल मालिकों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में पर्यटकों ने अपनी बुकिंग रद्द करनी शुरू कर दी है।
सीएनबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 26 अगस्त को हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ग्लेशियर टूटने की घटना हुई। इसके बाद बर्फ, चट्टानों और पिघले पानी के साथ भूस्खलन हुआ और घाटियों में तेज़ बाढ़ आ गई। बाढ़ ने कई गांवों को बहा दिया या उनका संपर्क काट दिया और सड़क, पुल तथा जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुँचाया। मंगलवार तक अधिकारियों के मुताबिक, आपदा में मरने वालों की संख्या 987 हो गई थी, जबकि करीब 4,250 लोग लापता थे। नेपाल ने पुनर्निर्माण की लागत 4 से 5 अरब डॉलर यानी करीब 38,000 से 47,500 करोड़ रुपये आंकी है, जो देश की अर्थव्यवस्था के लगभग दसवें हिस्से के बराबर है।
नेपाल के एडवेंचर पर्यटन के लिए 'गंभीर चेतावनी’
नेपाल पर्वतारोहण संघ के महासचिव राजेंद्र बहादुर लामा ने बाढ़ को देश के पर्यटन उद्योग के लिए “गंभीर चेतावनी” बताया। उन्होंने सीएनबीसी से कहा कि इस आपदा को नेपाल के एडवेंचर पर्यटन का अंत नहीं, बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। लामा के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन हिमालय के स्वरूप को बदल रहा है। ऐसे में नेपाल को ऐसा पर्यटन उद्योग तैयार करना होगा, जो सिर्फ रोमांचक ही नहीं बल्कि सुरक्षित, बेहतर तरीके से तैयार और जलवायु के बदलावों का सामना करने में सक्षम हो। उन्होंने कहा कि पर्यटन से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं, रास्तों और पर्यटन स्थलों की दोबारा समीक्षा करनी होगी और बाढ़, भूस्खलन तथा दूसरी चरम मौसमी घटनाओं से बेहतर सुरक्षा के लिए उन्हें नए तरीके से तैयार करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय पर्यटक जलवायु परिवर्तन और सुरक्षा को लेकर पहले से अधिक जागरूक हो रहे हैं। ऐसे में नेपाल के लिए पर्यटन ढाँचे को सुरक्षित बनाना और भी जरूरी हो गया है।
पीक सीजन से पहले पर्यटकों ने रद्द की बुकिंग
नेपाल की अर्थव्यवस्था में पर्यटन की अहम भूमिका है। यह देश के लिए विदेशी मुद्रा और सरकारी आय का एक बड़ा स्रोत है। करीब 3 करोड़ की आबादी वाला नेपाल ट्रेकिंग और पर्वतारोहण के साथ-साथ धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन के लिए भी दुनिया भर में जाना जाता है लेकिन बाढ़ ने पर्यटन सीजन शुरू होने से ठीक पहले कारोबार की चिंता बढ़ा दी है। सीएनबीसी की रिपोर्ट में काठमांडू में वांडर थर्स्ट हॉस्टल के मालिक सरोज भंडारी के मुताबिक बताया गया है कि पिछले कुछ दिनों में पर्यटकों ने अपनी बुकिंग रद्द की है। उनका 122 बिस्तरों वाला हॉस्टल पिछले साल पीक सीजन में पूरी तरह भरा था लेकिन इस साल उन्हें अधिकतम 60 प्रतिशत ऑक्यूपेंसी की उम्मीद है। उनके मुताबिक, सबसे ज्यादा बुकिंग यूरोप के पर्यटकों ने रद्द की हैं।
भंडारी ने कहा कि नेपाल का सिर्फ एक हिस्सा बाढ़ से प्रभावित हुआ है, लेकिन कई पर्यटकों को लगता है कि पूरे नेपाल में जाना सुरक्षित नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि नेपाल का एक बड़ा हिस्सा पहाड़ों के अलावा मैदानी इलाकों में भी है। उनके मुताबिक, नेपाल में मानसून का मौसम अब खत्म होने के करीब है। सरकार भूस्खलन की चेतावनी और सड़क बंद होने की जानकारी जारी करती है और बाढ़ व भूस्खलन से जुड़े अलर्ट हॉस्टल तक रोज़ पहुँचते हैं। हॉस्टल इन सूचनाओं को अपने मेहमानों तक पहुँचाता है।
ग्लेशियर पिघलने और टूटने से बढ़ रहा खतरा
संयुक्त राष्ट्र की एक सहायक महासचिव कन्नी विग्नराजा ने रॉयटर्स से कहा कि हिमालयी क्षेत्र में लाखों लोगों पर ग्लेशियरों से आने वाली बाढ़ का खतरा है। उन्होंने आशंका जताई कि कुछ इलाकों में नदी किनारे के पूरे क्षेत्र लोगों के रहने के लिए अनुपयुक्त हो सकते हैं। विग्नराजा के मुताबिक, बड़े नदी तंत्रों में ग्लेशियर झीलों से आने वाले पानी के खतरे को रोकने के लिए तकनीक उतनी तेज़ी से आगे नहीं बढ़ पा रही है, जितनी तेज़ी से खतरा बढ़ रहा है।
शोधकर्ताओं ने पहले नेपाल, चीन और भारत में 47 खतरनाक ग्लेशियर झीलों की पहचान की थी। हालांकि, बाद के आकलनों में इनकी वास्तविक संख्या इससे काफी अधिक होने की बात सामने आई है। यूरोपीय संघ की कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के निदेशक कार्लो बुओन्तेम्पो ने सीएनबीसी से कहा कि नेपाल की बाढ़ के विनाशकारी असर को कम करके नहीं आँका जा सकता। उनके मुताबिक, इस आपदा की पूरी कड़ी को समझने में समय लगेगा, लेकिन एक व्यापक तस्वीर साफ है कि दुनिया के बर्फीले क्षेत्र लगातार अपना द्रव्यमान खो रहे हैं और इसके साथ वे कम स्थिर होते जा रहे हैं।
गर्म होती धरती से पहाड़ों की स्थिरता पर असर
बुओन्तेम्पो के अनुसार, जलवायु गर्म होने के साथ दुनिया भर में ग्लेशियरों की बर्फ कम हो रही है, जिसका पहाड़ी क्षेत्रों पर बड़ा असर पड़ सकता है। ग्लेशियर पहाड़ों की ढलानों को सहारा देते हैं, जबकि जमी हुई जमीन चट्टानों को अपनी जगह पर बनाए रखने में मदद करती है। ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी कमजोर प्राकृतिक बांधों के पीछे झीलों में जमा हो सकता है।
उनके मुताबिक, जैसे-जैसे बर्फ कम होती है और स्थायी रूप से जमी जमीन यानी परमाफ़्रॉस्ट पिघलता है, वैसे-वैसे वे पहाड़ भी अस्थिर होने लगते हैं जो हजारों वर्षों से स्थिर रहे हैं। यह प्रक्रिया आम तौर पर धीरे-धीरे होती है, लेकिन कभी-कभी अचानक भी बड़ा हादसा हो सकता है। इसका उदाहरण मई 2025 में स्विट्जरलैंड के बिर्च ग्लेशियर में हुई घटना है, जब बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के टूटने से ब्लाटेन गांव मलबे में दब गया था।
बुओन्तेम्पो ने कहा कि नेपाल की बाढ़ भविष्य के जोखिमों की योजना बनाने के लिए लगातार सैटेलाइट निगरानी और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था की जरूरत को दिखाती है। उन्होंने स्विट्जरलैंड के ब्लाटेन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ भूस्खलन से पहले लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया था। उनके मुताबिक, जलवायु पहले जैसी नहीं रही है और भविष्य के लिए तैयारी को और मजबूत करना होगा।