Hydroponic Farming: कितना खर्च आता है, क्या मिलती है सब्सिडी और कैसे करें शुरुआत, जानिए एक्सपर्ट की राय

Mansi | Aug 02, 2026, 13:49 IST
खेती में लागत बढ़ने और जल संसाधनों की कमी से हाइड्रोपोनिक विधि एक उत्कृष्ट समाधान बनकर उभरी है। इस प्रक्रिया में बिना मिट्टी के पौधों को पोषक तत्वों से युक्त पानी में उगाया जाता है, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता ऊँची रहती है। सीमित भूमि और पानी की कमी वाले क्षेत्रों के लिए यह विधि बेहद उपयोगी साबित हो सकती है।

खेती में बढ़ती लागत, घटते जल संसाधन के बीच आधुनिक तकनीकों की चर्चा तेज हो रही है। इन्हीं में से एक है हाइड्रोपोनिक खेती, जिसमें बिना मिट्टी के पोषक तत्वों से युक्त पानी में फसल उगाई जाती है। हालांकि यह तकनीक तेजी से लोकप्रिय हो रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी व्यावहारिक है? इसका जवाब लागत, बाजार, प्रशिक्षण और सरकारी सहायता जैसे कई पहलुओं पर निर्भर करता है।



सीएमपी डिग्री कॉलेज, प्रयागराज के वनस्पति विज्ञान विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. दीपक कुमार गोंड कहते हैं, "हाइड्रोपोनिक खेती सीमित भूमि और कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए बेहतर विकल्प हो सकती है। इसमें पौधों को नियंत्रित वातावरण में आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं, जिससे गुणवत्तापूर्ण उत्पादन मिलता है। लेकिन किसानों को इसे अपनाने से पहले प्रशिक्षण लेना चाहिए, क्योंकि पोषक घोल, पानी की गुणवत्ता और तापमान का सही प्रबंधन ही इसकी सफलता तय करता है।"




क्या है हाइड्रोपोनिक खेती

हाइड्रोपोनिक खेती में पौधों को मिट्टी में नहीं बल्कि पोषक तत्वों से भरपूर पानी में उगाया जाता है। कई प्रणालियों में पौधों को सहारा देने के लिए कोकोपीट, परलाइट या रॉकवूल जैसे माध्यम का उपयोग किया जाता है। इस पूरी प्रणाली में पानी, तापमान, प्रकाश और पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखा जाता है, जिससे पौधों की वृद्धि नियंत्रित तरीके से होती है। यह तकनीक मुख्य रूप से उन किसानों या उद्यमियों के लिए उपयोगी मानी जाती है, जिनके पास कम जमीन है और जो टमाटर, खीरा, शिमला मिर्च, पालक, धनिया, लेट्यूस, स्ट्रॉबेरी जैसी अधिक मूल्य वाली फसलें उगाकर स्थानीय बाजार, होटल, रेस्तरां या सुपरमार्केट तक पहुँच बना सकते हैं। वहीं धान, गेहूं और दाल जैसी पारंपरिक फसलों के लिए यह तकनीक अभी आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं मानी जाती।



कम पानी, लेकिन तकनीकी समझ जरूरी

डॉ. दीपक बताते हैं कि हाइड्रोपोनिक प्रणाली में पानी का दोबारा उपयोग किया जाता है, इसलिए पारंपरिक खेती की तुलना में पानी की खपत काफी कम होती है। हालांकि इसमें बिजली, पोषक घोल, पानी का पीएच और तापमान पर लगातार निगरानी रखनी पड़ती है। थोड़ी सी तकनीकी चूक भी पूरी फसल को प्रभावित कर सकती है। घरेलू स्तर पर छोटी इकाई कम लागत में तैयार की जा सकती है, लेकिन व्यावसायिक स्तर पर पॉलीहाउस, पाइपलाइन, पंप, पोषक घोल, सेंसर और अन्य उपकरणों के कारण शुरुआती निवेश लाखों रुपये तक पहुँच सकता है।



कहाँ से मिल सकती है आर्थिक सहायता

किसान विभिन्न सरकारी योजनाओं और संस्थानों के माध्यम से वित्तीय सहायता या रियायती ऋण का लाभ ले सकते हैं। समेकित बागवानी विकास मिशन (MIDH) और राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (एनएचबी) के तहत संरक्षित खेती से जुड़े कुछ घटकों पर निर्धारित मानकों के अनुसार सहायता उपलब्ध है। मौजूदा दिशा-निर्देशों के अनुसार हाइड्रोपोनिक्स और एरोपोनिक्स परियोजनाओं के लिए निर्धारित लागत पर 50 % तक सहायता का प्रावधान है। इसके अलावा एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (AIF) के तहत पात्र परियोजनाओं के लिए ब्याज में रियायत के साथ ऋण मिल सकता है। कुछ राज्यों में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) और राज्य बागवानी मिशन के माध्यम से भी स्थानीय स्तर पर सहायता दी जाती है। वहीं नाबार्ड बैंकों के जरिए कृषि परियोजनाओं के लिए ऋण और पुनर्वित्त सुविधा उपलब्ध कराता है। किसान योजना का लाभ लेने से पहले अपने जिले के बागवानी विभाग या कृषि विभाग से पात्रता और उपलब्ध सहायता की जानकारी अवश्य लें।



निवेश से पहले इन बातों का रखें ध्यान

हाइड्रोपोनिक खेती में सफलता केवल तकनीक पर नहीं बल्कि बाजार की उपलब्धता, उत्पाद की मांग और नियमित रखरखाव पर भी निर्भर करती है। यदि किसान के पास अपनी उपज बेचने के लिए स्थानीय बाजार, होटल, रेस्तरां, सुपरमार्केट या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुँच नहीं है, तो अधिक निवेश के बावजूद अपेक्षित लाभ मिलना मुश्किल हो सकता है। इसलिए इस तकनीक को अपनाने से पहले प्रशिक्षण लेना, बाजार का आकलन करना और सरकारी योजनाओं की जानकारी जुटाना जरूरी है।

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