ICAR Research: अब 10 दिन से ज़्यादा ताज़ा रह सकेगा पनीर, जानिए कैसे नई तकनीक बढ़ाएगी शेल्फ लाइफ़

Mansi | Aug 03, 2026, 15:43 IST
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने पनीर को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की नई तकनीक विकसित की है। यह एंटीमाइक्रोबियल कोएगुलेंट फ़ॉर्म्यूलेशन नामक तकनीक सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को नियंत्रित करती है। इस विधि से पनीर की गुणवत्ता और स्वाद लंबे समय तक बना रहता है। यह तकनीक छोटे डेयरी कारोबारियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी साबित होगी।
नई तकनीक से पनीर की बर्बादी घटाने और गुणवत्ता बनाए रखने की दिशा में बड़ा कदम

भारत में पनीर की बढ़ती माँग के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI), करनाल ने ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जो पनीर को पहले की तुलना में अधिक समय तक सुरक्षित और ताज़ा रखने में मदद कर सकती है। इस तकनीक का नाम एंटीमाइक्रोबियल कोएगुलेंट फ़ॉर्म्यूलेशन (AMCF) है।



पनीर जल्दी खराब होने के कारण डेयरी उद्योग और छोटे उत्पादकों को अक्सर आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे में आईसीएआर-एनडीआरआई की यह नई तकनीक पनीर की गुणवत्ता बनाए रखने, उसकी बर्बादी कम करने और डेयरी कारोबार को अधिक लाभकारी बनाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है। संस्थान लंबे समय से पनीर और अन्य डेयरी उत्पादों की शेल्फ लाइफ़ बढ़ाने पर शोध कर रहा है।



क्या है एंटीमाइक्रोबियल कोएगुलेंट फ़ॉर्म्यूलेशन?

पनीर बनाने के दौरान दूध को फाड़ने के लिए जिस पदार्थ का उपयोग किया जाता है, उसे कोएगुलेंट कहा जाता है। नई तकनीक में विकसित एंटीमाइक्रोबियल कोएगुलेंट फ़ॉर्म्यूलेशन (AMCF) केवल दूध को जमाने का काम नहीं करता, बल्कि यह हानिकारक सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को भी नियंत्रित करने में मदद करता है। इससे पनीर अधिक समय तक सुरक्षित रहता है और उसकी गुणवत्ता भी बनी रहती है।



लाभकारी बैक्टीरिया का किया गया उपयोग

इस तकनीक में Lactobacillus plantarum MTCC 25406 नाम के लाभकारी बैक्टीरिया का उपयोग किया गया है। यह प्राकृतिक रूप से ऐसे यौगिक बनाता है, जो पनीर में खराबी पैदा करने वाले कई हानिकारक जीवाणुओं की वृद्धि को रोकने में मदद करते हैं। इसी वजह से पनीर की सुरक्षा और गुणवत्ता दोनों बेहतर बनी रहती हैं।



स्वाद और बनावट पर नहीं पड़ता असर

नई तकनीक की एक बड़ी विशेषता यह है कि इससे पनीर का स्वाद, बनावट और गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहती है। सामान्य तौर पर कुछ दिनों बाद पनीर की बनावट बदलने लगती है और उसके खराब होने की संभावना बढ़ जाती है, लेकिन इस तकनीक से इन समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। संस्थान के अनुसार, इससे पनीर की शेल्फ लाइफ़ में 10 दिनों से अधिक की बढ़ोतरी संभव है।




छोटे डेयरी कारोबारियों को होगा सबसे अधिक लाभ

देश में बड़ी संख्या में छोटे डेयरी उद्यमी और दुग्ध उत्पादक पनीर बनाकर स्थानीय बाज़ारों में बेचते हैं। पनीर जल्दी खराब होने के कारण उन्हें कई बार नुकसान उठाना पड़ता है। नई तकनीक अपनाने से उत्पाद अधिक समय तक सुरक्षित रहेगा, जिससे बर्बादी घटेगी, बाज़ार तक पहुँच बढ़ेगी और आमदनी में सुधार हो सकता है।



डेयरी क्षेत्र और किसानों के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?

भारत दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देशों में शामिल है। ऐसे में दूध से बनने वाले उत्पादों की गुणवत्ता और शेल्फ लाइफ़ बढ़ाना खाद्य सुरक्षा और डेयरी उद्योग, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। आईसीएआर-एनडीआरआई का मानना है कि यह तकनीक डेयरी उत्पादों के संरक्षण, खाद्य अपव्यय में कमी और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने में उपयोगी साबित हो सकती है। इससे डेयरी उद्योग के साथ-साथ दुग्ध उत्पादकों और किसानों को भी अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलने की संभावना है।

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