खाद बनाने वाले कच्चे माल पर संकट! सप्लाई में कमी के चलते सल्फर निर्यात पर लिमिट लगा सकता है भारत: रिपोर्ट
भारत सल्फर (गंधक) के निर्यात को सीमित करने के प्रस्ताव पर विचार कर रहा है, क्योंकि उद्योग संगठनों ने कीमतों में तेजी और खाड़ी देशों से सप्लाई में बाधा को लेकर चिंता जताई है। ईरान युद्ध के कारण मध्य पूर्व से आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे वैश्विक बाजार में पहले ही दबाव बना हुआ है। यदि भारत निर्यात पर रोक लगाता है तो अंतरराष्ट्रीय कीमतों में और तेजी आ सकती है, खासकर ऐसे समय में जब चीन भी अगले महीने से सल्फ्यूरिक एसिड के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है। Business Line' ने सूत्रों के हवाले से बताया कि एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, “मध्य पूर्व से आयात घटने के कारण सल्फर की आपूर्ति सख्त हो गई है। ऐसे में निर्यात जारी रहने से घरेलू उपलब्धता पर और दबाव पड़ेगा, इसलिए इस पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।”
घरेलू जरूरत और निर्यात का संतुलन बड़ी चुनौती
सल्फर का उपयोग अमोनियम सल्फेट और सिंगल सुपर फॉस्फेट जैसे उर्वरकों के निर्माण में होता है, जो भारत में व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं। देश अपनी जरूरत का आधे से अधिक हिस्सा आयात से पूरा करता है और हर साल लगभग 20 लाख टन सल्फर आयात करता है, जिसमें करीब आधा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है। इसके साथ ही भारत हर साल लगभग 8 लाख टन सल्फर का निर्यात भी करता है, जिसमें 90 प्रतिशत से अधिक चीन को भेजा जाता है। उद्योग संगठनों ने सरकार से इन निर्यातों पर रोक लगाने की मांग की है, ताकि घरेलू बाजार में आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। सरकार ने पहले ही तेल रिफाइनरियों को निर्देश दिया है कि वे उर्वरक कंपनियों को पर्याप्त मात्रा में सल्फर उपलब्ध कराएं, हालांकि इस मुद्दे पर आधिकारिक तौर पर अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
ईरान युद्ध का असर, खनन उद्योग तक पहुंची कमी
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, पिछले वर्ष वैश्विक सल्फर उत्पादन में मध्य पूर्व की हिस्सेदारी लगभग एक-चौथाई रही, जो 83.87 मिलियन टन थी। लेकिन 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर हमलों के बाद से होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाला प्रमुख शिपिंग मार्ग गंभीर रूप से बाधित हो गया है। इसका असर अब खनन उद्योग पर भी दिखने लगा है, जहां सल्फ्यूरिक एसिड का उपयोग लीचिंग प्रक्रिया में किया जाता है। इंडोनेशिया के निकल उत्पादकों के साथ-साथ चिली और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य के तांबा उत्पादकों को अब बढ़ी हुई कीमतें चुकानी पड़ सकती हैं, क्योंकि सल्फ्यूरिक एसिड की मांग और प्रतिस्पर्धा दोनों तेजी से बढ़ रही हैं।