बासमती चावल पर किसका हक़? जीआई टैग को लेकर क्यों भिड़े भारत-पाकिस्तान? दाँव पर है अरबों रुपये का कारोबार

Gaon Connection | Jun 24, 2026, 16:25 IST
बासमती चावल के जीआई टैग को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद जारी है। दोनों देश बासमती को अपनी पारंपरिक कृषि विरासत बताते हैं और वैश्विक बाज़ार में इसकी पहचान पर दावा कर रहे हैं। बासमती अरबों डॉलर के निर्यात से जुड़ा उत्पाद है, जिससे लाखों किसानों की आय प्रभावित होती है। जीआई टैग की लड़ाई कृषि, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में हिस्सेदारी से जुड़ी हुई है।

दुनिया भर में अपनी ख़ुशबू, लंबे दानों और ऊँची क़ीमत के लिए पहचाने जाने वाले बासमती चावल को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच खींचतान जारी है। विवाद का केंद्र है जियोग्राफ़िकल इंडिकेशन (जीआई) टैग, जो किसी उत्पाद को उसके भौगोलिक क्षेत्र और विशिष्ट पहचान से जोड़ता है। भारत का दावा है कि बासमती उसकी ऐतिहासिक और कृषि विरासत का हिस्सा है, जबकि पाकिस्तान का कहना है कि बासमती की खेती उसकी धरती पर भी सदियों से होती रही है और उसे इस पहचान से अलग नहीं किया जा सकता।



यह विवाद केवल एक कृषि उत्पाद तक सीमित नहीं है, बल्कि अरबों डॉलर के निर्यात बाज़ार, किसानों की आय और वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी से भी जुड़ा हुआ है। दुनिया में बासमती उत्पादन और निर्यात पर लगभग पूरी तरह भारत और पाकिस्तान का ही दबदबा है। ऐसे में जीआई टैग को लेकर दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार तेज़ होती रही है।



जीआई टैग क्या है और क्यों है महत्वपूर्ण?

जीआई (Geographical Indication) टैग किसी उत्पाद की भौगोलिक पहचान और उसकी विशिष्ट गुणवत्ता को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि किसी विशेष क्षेत्र से जुड़े उत्पाद का नाम और प्रतिष्ठा किसी अन्य क्षेत्र या देश द्वारा इस्तेमाल न की जा सके। दुनिया में फ़्रांस की वाइन, स्विट्ज़रलैंड का चीज़ और भारत की दार्जिलिंग चाय जैसे उत्पाद जीआई टैग के प्रमुख उदाहरण हैं। किसी उत्पाद को जीआई टैग मिलने से उसकी वैश्विक पहचान मज़बूत होती है और निर्यात बाज़ार में उसे अतिरिक्त लाभ मिलता है।



बासमती को लेकर कैसे शुरू हुआ विवाद?

विवाद तब तेज़ हुआ जब भारत ने यूरोपीय संघ (EU) में बासमती चावल को जीआई टैग दिलाने के लिए आवेदन किया। भारत के आवेदन के बाद पाकिस्तान ने इसका विरोध दर्ज कराया और दावा किया कि बासमती केवल भारत की नहीं, बल्कि पाकिस्तान की भी पारंपरिक कृषि विरासत का हिस्सा है। इसके बाद पाकिस्तान ने अपने यहाँ जियोग्राफ़िकल इंडिकेशन क़ानून बनाया और बासमती को राष्ट्रीय स्तर पर जीआई दर्जा दिया। फिर उसने भी यूरोपीय संघ में बासमती के लिए दावा पेश किया। यही वजह है कि आज दोनों देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बासमती की पहचान को लेकर अपने-अपने दावे मज़बूत करने में जुटे हैं।



बासमती की उत्पत्ति को लेकर क्या कहते हैं दस्तावेज़?

कई ऐतिहासिक और कृषि दस्तावेज़ों में बासमती का उल्लेख भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन धरोहर के रूप में मिलता है। बीबीसी की एक रिपोर्ट में कृषि वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के हवासे से बताया गया है कि बासमती की खेती सदियों से हिमालयी तराई और सिंधु-गंगा के मैदानों में होती रही है। बासमती की विशिष्ट सुगंध, स्वाद और गुणवत्ता का संबंध हिमालय से निकलने वाली नदियों के पानी, मिट्टी और जलवायु से है। यही कारण है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही इसके मूल क्षेत्र पर अपना दावा करते हैं।



दोनों देशों के लिए इतना अहम क्यों है बासमती?

बासमती केवल एक चावल की किस्म नहीं, बल्कि एक बड़ा निर्यात उत्पाद भी है। भारत दुनिया के कुल बासमती निर्यात का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा नियंत्रित करता है, जबकि शेष बाज़ार में पाकिस्तान की मज़बूत हिस्सेदारी है। भारत ने वर्ष 2019-20 में लगभग 44.5 लाख टन बासमती का निर्यात किया था, जिसकी क़ीमत करीब 31 हज़ार करोड़ रुपये रही। वहीं पाकिस्तान भी हर वर्ष सैकड़ों करोड़ डॉलर मूल्य का बासमती निर्यात करता है। खाड़ी देशों, विशेषकर ईरान, सऊदी अरब, इराक़, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और यमन में भारतीय बासमती की बड़ी मांग है। दूसरी ओर पाकिस्तान का बड़ा बासमती बाज़ार यूरोप और कुछ खाड़ी देशों में मौजूद है।



कहाँ-कहाँ उगाया जाता है बासमती?

भारत में बासमती मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में उगाया जाता है। एपीडा (APEDA) ने इन क्षेत्रों को बासमती उत्पादन के लिए जीआई मान्यता प्रदान की है। भारत के कुल बासमती निर्यात का बड़ा हिस्सा पंजाब और हरियाणा से आता है। वहीं पाकिस्तान में इसका प्रमुख उत्पादन पंजाब प्रांत के विभिन्न ज़िलों में होता है। यही भौगोलिक समानता दोनों देशों के दावों को मज़बूती प्रदान करती है।



वैश्विक बाज़ार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा

हाल के वर्षों में यूरोप में पाकिस्तानी बासमती की मांग बढ़ी है। इसके पीछे एक कारण यह भी माना जाता है कि यूरोपीय देशों ने कृषि उत्पादों में कीटनाशक अवशेषों के लिए कड़े मानक लागू किए हैं। ऐसे में गुणवत्ता और निर्यात मानकों को लेकर प्रतिस्पर्धा और बढ़ गई है। जीआई टैग का मुद्दा केवल पहचान का नहीं, बल्कि वैश्विक बाज़ार में हिस्सेदारी बढ़ाने की रणनीति का भी हिस्सा है। यदि किसी एक देश का दावा अधिक मज़बूत होता है तो दूसरे देश के निर्यात हित प्रभावित हो सकते हैं।



किसानों और निर्यातकों के लिए क्यों अहम है यह लड़ाई?

बासमती दोनों देशों के लाखों किसानों और चावल उद्योग से जुड़े कारोबारियों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत है। जीआई टैग मिलने से उत्पाद की विश्वसनीयता और बाज़ार मूल्य बढ़ता है, जिससे निर्यातकों और किसानों दोनों को लाभ मिलता है। यही वजह है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बासमती को लेकर जारी विवाद केवल कानूनी या कूटनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि कृषि, व्यापार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा आर्थिक प्रश्न भी है। आने वाले समय में यूरोपीय संघ और अन्य वैश्विक बाज़ारों में इस मुद्दे पर होने वाले फ़ैसले दोनों देशों के बासमती व्यापार की दिशा तय कर सकते हैं।

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