वन्यजीवों के लिए सुरक्षित हुआ भारत, कई प्रमुख प्रजातियों की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी, सरकार ने जारी किए आंकड़े
भारत ने बीते 12 वर्षों में वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 4 जून को जारी आंकड़ों के अनुसार, सुविचारित नीतिगत प्रयासों और निरंतर क्रियान्वयन के चलते देश में वन एवं हरित क्षेत्र का विस्तार हुआ है। इसके साथ ही बाघ, शेर, हाथी, गैंडा, चीता और अन्य वन्यजीव प्रजातियों की आबादी में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। मंत्रालय के अनुसार, भारत का संरक्षण मॉडल प्रजातियों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण, आवास बहाली और समुदाय आधारित प्रबंधन पर आधारित है। विज्ञान-आधारित रणनीतियों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ने संरक्षण प्रयासों को नई मजबूती प्रदान की है।
प्रोजेक्ट टाइगर से बढ़ी बाघों की संख्या
वर्ष 1973 में शुरू किया गया प्रोजेक्ट टाइगर देश का प्रमुख वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम बना हुआ है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के नेतृत्व में वर्ष 2014 से 2025 के बीच बाघ संरक्षण को और मजबूत किया गया। इस दौरान देश में बाघ अभयारण्यों की संख्या 46 से बढ़कर 58 हो गई, जबकि बाघों की आबादी 2014 के 2,226 से बढ़कर 2022 में 3,682 तक पहुंच गई। वर्ष 2026 तक बाघ अभयारण्यों का कुल क्षेत्रफल लगभग 85 हजार वर्ग किलोमीटर हो गया है। वर्तमान में दुनिया के 70 प्रतिशत से अधिक जंगली बाघ भारत में संरक्षित हैं।
प्रोजेक्ट चीता ने रचा इतिहास
17 सितंबर 2022 को शुरू किया गया प्रोजेक्ट चीता दुनिया का पहला अंतरमहाद्वीपीय बड़े जंगली मांसाहारी जीव का स्थानांतरण कार्यक्रम है। इस पहल के तहत नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका और बोत्सवाना से कुल 29 चीते भारत लाए गए हैं। मंत्रालय के अनुसार, देश में चीतों की कुल संख्या अब 57 हो गई है, जिनमें 37 भारत में जन्मे चीते शामिल हैं। इसे घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने की दिशा में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
एशियाई शेरों का दायरा और संख्या दोनों बढ़े
अगस्त 2020 में घोषित प्रोजेक्ट लायन गुजरात के एशियाई शेरों के संरक्षण और आवास विकास के लिए दीर्घकालिक योजना के रूप में काम कर रहा है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2015 में 523 रही शेरों की संख्या 2025 में बढ़कर 891 हो गई है। इस दौरान शेरों का विस्तार क्षेत्र भी करीब 59 प्रतिशत बढ़ा है, जिससे उनके आवास और वन्यजीव गलियारों को मजबूती मिली है।
तेंदुओं की आबादी में भी इजाफा
'भारत में तेंदुओं की स्थिति 2022' रिपोर्ट के अनुसार, देश में तेंदुओं की अनुमानित संख्या 2018 के 12,852 से बढ़कर 2022 में 13,874 हो गई है। रिपोर्ट में मध्य भारत और पूर्वी घाट क्षेत्रों में तेंदुओं की आबादी को स्थिर या बढ़ती हुई बताया गया है, जबकि शिवालिक और गंगा के मैदानी इलाकों में कुछ स्थानों पर गिरावट दर्ज की गई है। तेंदुओं की निगरानी राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा की जाती है।
हिम तेंदुओं के संरक्षण को नई दिशा
भारत सरकार हिम तेंदुए को उच्च हिमालयी क्षेत्रों की प्रमुख प्रजाति मानती है। इनके संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट स्नो लेपर्ड और अन्य विशेष कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। वर्ष 2019 से 2023 के बीच पहली बार हिम तेंदुओं की व्यापक जनसंख्या गणना की गई, जिसमें 1.20 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर किया गया। आकलन के अनुसार, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और जम्मू-कश्मीर में कुल 718 हिम तेंदुए पाए गए हैं। संरक्षण प्रयासों को और मजबूत बनाने के लिए SPAI 2.0 कार्यक्रम भी शुरू किया गया है।
हाथियों के संरक्षण में भी बड़ी प्रगति
प्रोजेक्ट एलीफेंट के तहत जंगली एशियाई हाथियों और उनके आवासों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। भारत वर्तमान में वैश्विक जंगली एशियाई हाथी आबादी का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा संरक्षित कर रहा है। प्रथम डीएनए-आधारित समकालिक अखिल भारतीय हाथी गणना (2021-25) के अनुसार, देश में जंगली हाथियों की संख्या 22,446 आंकी गई है। वर्ष 2014 में 26 हाथी अभयारण्य थे, जो 2025-26 में बढ़कर 33 हो गए हैं। वहीं हाथी गलियारों की संख्या 88 से बढ़कर 150 तक पहुंच गई है।
एक सींग वाले गैंडों की संख्या चार हजार के पार
भारतीय एक-सींग वाले गैंडे के लिए राष्ट्रीय संरक्षण रणनीति 2019 के तहत आबादी विस्तार, आनुवंशिक सुरक्षा और आवास संरक्षण पर काम किया जा रहा है। मंत्रालय के अनुसार, 1980 के दशक के बाद से गैंडों की संख्या में करीब 170 प्रतिशत वृद्धि हुई है। सितंबर 2024 तक इनकी संख्या 1,500 से बढ़कर 4,000 से अधिक हो गई है। यह उपलब्धि भारत को विज्ञान-आधारित और समुदाय-समर्थित वन्यजीव संरक्षण का वैश्विक उदाहरण बनाती है।
संरक्षण मॉडल को मिली वैश्विक पहचान
मंत्रालय का कहना है कि भारत का संरक्षण मॉडल प्रजातियों के संरक्षण को पारिस्थितिकी तंत्र आधारित प्रबंधन से जोड़ता है। निरंतर नीतिगत समर्थन, वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के कारण देश जैव विविधता संरक्षण में वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभर रहा है।