भारत की क्लाइमेट रिपोर्टिंग, काग़ज़ी खुलासों से आगे की है ज़रूरत
अगर भारत की कंपनियां अब भी सिर्फ औपचारिक खुलासों तक सीमित रहीं, तो वे वैश्विक निवेश की दौड़ में पीछे छूट सकती हैं और मौका इसलिए कि सही सुधारों के साथ भारत की क्लाइमेट रिपोर्टिंग न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मानकों के बराबर आ सकती है, बल्कि निवेशकों का भरोसा भी जीत सकती है।
आजकल एक सवाल बार बार उभर रहा है, क्या भारत की कंपनियां वाकई क्लाइमेट चेंज के लिए तैयार हैं, या बस रिपोर्टिंग के फॉर्म भर रही हैं। इसी सवाल को केंद्र में रखकर इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस यानी IEEFA ने भारत की क्लाइमेट डिस्क्लोज़र व्यवस्था पर एक अहम आकलन जारी किया है।
यह रिपोर्ट भारत के बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क यानी BRSR की तुलना इंटरनेशनल सस्टेनेबिलिटी स्टैंडर्ड्स बोर्ड के ISSB मानकों से करती है। रिपोर्ट का सीधा संदेश है। अगर भारतीय कंपनियों की क्लाइमेट रिपोर्टिंग इसी तरह ऊपरी और असंगठित रही, तो उन्हें आने वाले समय में ग्लोबल कैपिटल तक पहुंच बनाने में मुश्किल हो सकती है।
IEEFA के मुताबिक दुनिया भर के सस्टेनेबल फाइनेंस बाज़ार अब सिर्फ अच्छे इरादों से संतुष्ट नहीं हैं, निवेशक यह देखना चाहते हैं कि कंपनियों के पास साफ़, मापने लायक और भविष्य को ध्यान में रखने वाले क्लाइमेट ट्रांज़िशन प्लान हैं या नहीं।
ऐसे में भारत का मौजूदा BRSR फ्रेमवर्क कई अहम सवालों के जवाब नहीं देता। रिपोर्ट बताती है कि BRSR सामाजिक और सामुदायिक पहलुओं में काफ़ी मजबूत है। इसमें समुदायों, कर्मचारियों और सामाजिक प्रभावों से जुड़े संकेतक ISSB की तुलना में ज्यादा विस्तार से शामिल हैं, लेकिन जब बात सीधे जलवायु बदलाव की आती है, तो तस्वीर अधूरी रह जाती है।
IEEFA के रिसर्च लीड शंतनु श्रीवास्तव के मुताबिक, BRSR में ग्रीनहाउस गैस लक्ष्यों को ठोस रणनीतियों से जोड़ने की स्पष्टता नहीं है न ही यह बताता है कि कंपनियां किन ठोस कदमों से अपने नेट ज़ीरो या क्लाइमेट लक्ष्यों तक पहुंचेंगी। जलवायु जोखिमों को समझने के लिए ज़रूरी सीनारियो एनालिसिस भी इसमें अनिवार्य नहीं है।
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ISSB का S2 मानक इस मामले में कहीं ज्यादा स्पष्ट है, यह कंपनियों से मांग करता है कि वे अपने उत्सर्जन लक्ष्यों, जोखिमों, निवेश योजनाओं और जलवायु झटकों के प्रति अपनी मजबूती का खुलासा साफ़ तौर पर करें।
इसमें यह भी देखा जाता है कि बोर्ड और सीनियर मैनेजमेंट जलवायु फैसलों की जवाबदेही कैसे निभा रहे हैं। IEEFA की एनर्जी एनालिस्ट तान्या राणा कहती हैं कि ISSB कंपनियों से यह पूछता है कि जलवायु बदलाव उनके मुनाफ़े, कैश फ्लो और निवेश फैसलों को कैसे प्रभावित करेगा।
वहीं BRSR अभी सिर्फ इतना पूछता है कि कौन सा निवेश पर्यावरण या समाज के लिए फायदेमंद है। दोनों में फर्क साफ़ है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि भारत में क्लाइमेट ट्रांज़िशन प्लानिंग के लिए कोई अलग मार्गदर्शिका नहीं है। ISSB ने 2025 में ट्रांज़िशन प्लान पर एक विशेष गाइडेंस जारी की है, जो ट्रांज़िशन प्लान टास्कफोर्स के ढांचे पर आधारित है।
BRSR में ऐसी कोई क्लाइमेट स्पेसिफिक गाइडेंस मौजूद नहीं है। IEEFA का कहना है कि जैसे जैसे भारतीय कंपनियां नेट ज़ीरो के लक्ष्य घोषित कर रही हैं, वैसे वैसे उनके पीछे की रणनीति की विश्वसनीयता सबसे अहम हो गई है। सिर्फ लक्ष्य बताना काफ़ी नहीं है।
निवेशक यह जानना चाहते हैं कि लक्ष्य हासिल कैसे होंगे, पैसा कहां से आएगा और जोखिमों से कैसे निपटा जाएगा। रिपोर्ट यह भी साफ़ करती है कि न तो BRSR और न ही ISSB अकेले किसी कंपनी की पूरी ट्रांज़िशन तैयारी की तस्वीर पेश करते हैं।
IEEFA का फ्रेमवर्क दोनों के बीच की खामियों को जोड़ने की कोशिश करता है और यह दिखाता है कि भारत अपनी मौजूदा रिपोर्टिंग व्यवस्था को कैसे मज़बूत बना सकता है।
कुल मिलाकर यह आकलन एक चेतावनी भी है और एक मौका भी, चेतावनी इसलिए कि अगर भारत की कंपनियां अब भी सिर्फ औपचारिक खुलासों तक सीमित रहीं, तो वे वैश्विक निवेश की दौड़ में पीछे छूट सकती हैं और मौका इसलिए कि सही सुधारों के साथ भारत की क्लाइमेट रिपोर्टिंग न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मानकों के बराबर आ सकती है, बल्कि निवेशकों का भरोसा भी जीत सकती है।
क्लाइमेट कहानी यहीं रुकती नहीं, यह उस बड़े सवाल की तरफ इशारा करती है कि क्या भारत की जलवायु महत्वाकांक्षा काग़ज़ों से निकलकर ज़मीन पर उतरने को तैयार है। जवाब शायद आने वाली रिपोर्ट्स में नहीं, बल्कि आने वाले फैसलों में छुपा है।
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