डेटा सेंटर की 'प्यास'! भारत में गूगल के AI डेटा सेंटर पर बहस तेज़, एक दिन में 50000 लोगों जितना पानी 'पी' जाते हैं डेटा सेंटर
भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा सेंटर निवेश को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। भारत तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा सेंटर हब बनने की ओर बढ़ रहा है। इसी दिशा में आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम (विजाग) में गूगल का विशाल AI डेटा सेंटर प्रोजेक्ट तैयार हो रहा है, जिसे देश के सबसे बड़े AI इंफ्रास्ट्रक्चर निवेशों में गिना जा रहा है। सरकार इसे डिजिटल अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास के लिए अहम कदम मान रही है। लेकिन द वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर पानी की उपलब्धता, जमीन अधिग्रहण और संसाधनों पर पड़ने वाले दबाव को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि AI की बढ़ती मांग के साथ पानी की खपत आने वाले वर्षों में बड़ी चुनौती बन सकती है।
डेटा सेंटर आखिर इतना पानी क्यों इस्तेमाल करते हैं?
AI मॉडल, क्लाउड सेवाओं और बड़े भाषा मॉडल (LLM) को चलाने वाले डेटा सेंटरों में हजारों सर्वर लगातार काम करते हैं। इन सर्वरों से भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती है। यदि इन्हें लगातार ठंडा न रखा जाए तो उपकरणों को नुकसान पहुंच सकता है। यही वजह है कि डेटा सेंटरों में बड़े कूलिंग सिस्टम लगाए जाते हैं, जिनमें पानी की बड़ी मात्रा का उपयोग होता है। AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ऊर्जा की मांग बढ़ रही है और उसी के साथ कूलिंग के लिए पानी की जरूरत भी बढ़ती जा रही है।
EESI की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
अमेरिका के एक गैर-लाभकारी शोध और नीति संगठन पर्यावरण और ऊर्जा अध्ययन संस्थान (Environmental and Energy Study Institute-EESI) की जून 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, डेटा सेंटरों का विस्तार दुनिया के मीठे पानी के संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी पर उपलब्ध कुल पानी का केवल 3 प्रतिशत हिस्सा मीठा पानी है और उसमें से भी सिर्फ 0.5 प्रतिशत पानी ही इंसानों के उपयोग के लिए आसानी से उपलब्ध और सुरक्षित माना जाता है। ऐसे में बढ़ते जल संकट के बीच डेटा सेंटरों की बढ़ती पानी की मांग चिंता का विषय बन रही है।
एक बड़ा डेटा सेंटर रोज पी सकता है 50 लाख गैलन पानी
EESI की रिपोर्ट के मुताबिक एक मध्यम आकार का डेटा सेंटर केवल कूलिंग के लिए सालाना करीब 11 करोड़ गैलन पानी इस्तेमाल कर सकता है। यह लगभग 1,000 परिवारों की वार्षिक पानी जरूरत के बराबर है। वहीं बड़े डेटा सेंटर प्रतिदिन 50 लाख गैलन तक पानी की खपत कर सकते हैं। सालाना आधार पर यह आंकड़ा करीब 180 करोड़ गैलन तक पहुंच सकता है। रिपोर्ट के अनुसार यह पानी की मात्रा 10,000 से 50,000 लोगों की आबादी वाले एक शहर की जरूरत के बराबर हो सकती है। यही आंकड़े विशाखापत्तनम जैसे शहरों में चिंता बढ़ा रहे हैं, जहां पहले से ही जल संसाधनों पर दबाव बना हुआ है।
अमेरिका के डेटा सेंटरों की खपत भी चौंकाने वाली
EESI ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अमेरिका में मौजूद 5,426 डेटा सेंटर हर साल अरबों गैलन पानी का उपयोग करते हैं। एक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2021 में अमेरिकी डेटा सेंटर प्रतिदिन करीब 44.9 करोड़ गैलन पानी और सालाना 163.7 अरब गैलन पानी की खपत कर रहे थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डेटा सेंटरों की संख्या, आकार और जटिलता बढ़ने के साथ पानी की मांग लगातार बढ़ती जाएगी।
विजाग परियोजना पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
WSJ की रिपोर्ट के अनुसार विशाखापत्तनम में प्रस्तावित गूगल डेटा सेंटर भारत में किसी अमेरिकी टेक कंपनी का पहला बड़ा AI-केंद्रित डेटा सेंटर हब है। यह परियोजना भविष्य में 600 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैल सकती है। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि शहर पहले से जल तनाव वाले क्षेत्रों में गिना जाता है। ऐसे में बड़े डेटा सेंटरों की पानी और बिजली की जरूरत भविष्य में अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक परियोजना से जुड़े कुछ किसानों को अपनी जमीन छोड़नी पड़ी है और कई परिवारों ने भविष्य की आजीविका को लेकर चिंता जताई है।
नई तकनीकें क्या समाधान बन सकती हैं?
EESI का कहना है कि डायरेक्ट-टू-चिप कूलिंग और इमर्शन कूलिंग जैसी नई तकनीकों के जरिए डेटा सेंटरों की पानी और ऊर्जा खपत कम की जा सकती है। कई बड़ी टेक कंपनियां भी अब ऐसे समाधान विकसित करने पर काम कर रही हैं, जिससे डेटा सेंटरों का पर्यावरणीय प्रभाव कम किया जा सके।
AI के भविष्य के साथ जुड़ा है पानी का सवाल
AI को भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में से एक माना जा रहा है और भारत भी इस दौड़ में तेजी से आगे बढ़ना चाहता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा सेंटरों के विस्तार के साथ पानी, बिजली और पर्यावरणीय संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभावों को भी गंभीरता से समझना होगा। विशाखापत्तनम में गूगल के AI डेटा सेंटर को लेकर उठे सवाल इस बात की याद दिलाते हैं कि डिजिटल विकास और प्राकृतिक संसाधनों के बीच संतुलन बनाए रखना आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हो सकता है।