देश में दलहन उत्पादन बढ़ाने को मिलेगी नई रफ़्तार, आईसीएआर ने अरहर की ‘आशा’ किस्म का पूर्ण जीनोम किया तैयार
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने अरहर की ‘आशा’ किस्म का भारत का पहला टेलोमियर-टू-टेलोमियर (टी2टी यानि एक छोर से दूसरे छोर) जीनोम तैयार किया है। यह उपलब्धि देश में दलहन फसलों पर होने वाले शोध के लिए काफ़ी महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है। इस जीनोम के तैयार होने से वैज्ञानिक अरहर के जीनों को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे और नई तकनीकों की मदद से अधिक उपज देने वाली तथा मौसम की मार झेलने वाली किस्में विकसित कर सकेंगे।
अरहर भारत की सबसे ज़्यादा उगाई जाने वाली दलहन फसलों में से एक है। यह प्रोटीन का अच्छा स्रोत होने के साथ लोगों के रोज़मर्रा के भोजन का भी अहम हिस्सा है। ऐसे में इस नई उपलब्धि से अरहर की खेती को बढ़ावा मिलेगा, किसानों को बेहतर किस्में मिलेंगी और देश में दलहन उत्पादन बढ़ाने की दिशा में भी मदद मिलेगी।
11 गुणसूत्रों का पूरा विवरण तैयार
आईसीएआर ने बताया कि तैयार किए गए टी2टी जीनोम में अरहर के सभी 11 गुणसूत्र शामिल हैं। इसका आकार 75 करोड़ 26 लाख 50 हज़ार बेस पेयर है और इसमें 36,557 जीनों की पहचान की गई है। इस जीनोम को एनसीबीआई के वैश्विक डाटाबेस में भी जमा कराया गया है। आरएनए परीक्षण में 99.9 प्रतिशत से ज़्यादा सटीक परिणाम मिले हैं।
2011 में बना था पहला ड्राफ़्ट जीनोम
आईसीएआर के राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान ने वर्ष 2011 में ‘आशा’ किस्म का पहला ड्राफ़्ट जीनोम तैयार किया था। यह पूरी तरह भारत में तैयार किया गया दुनिया का पहला फसल जीनोम था। इसके बाद 2017 में इसका बेहतर संस्करण जारी किया गया। अब पहली बार इसका पूरा टी2टी जीनोम तैयार किया गया है।
बेहतर और ज़्यादा उपज देने वाली किस्में बनाने में मदद
इस जीनोम की मदद से ऐसे जीनों की पहचान करना आसान होगा, जो अधिक उत्पादन, बेहतर पोषण, रोगों से बचाव और बदलते मौसम को सहने की क्षमता से जुड़े हैं। इससे वैज्ञानिक कम समय में नई और बेहतर अरहर की किस्में विकसित कर सकेंगे। साथ ही जीन संपादन और आधुनिक प्रजनन तकनीकों पर होने वाले शोध को भी गति मिलेगी।
दलहन उत्पादन बढ़ाने के लक्ष्य को मिलेगा बल
केंद्र सरकार ने वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए ‘आत्मनिर्भरता इन पल्सेज़ मिशन’ शुरू किया है। हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वैज्ञानिकों से बिना जीएम तकनीक के दलहन की पैदावार बढ़ाने के उपाय खोजने को कहा था। ऐसे समय में आईसीएआर की यह उपलब्धि किसानों, शोध संस्थानों और देश के दलहन उत्पादन के लिए बड़ी क़ामयाबी मानी जा रही है।