अल नीनो और कमज़ोर मानसून से खेती पर बढ़ा संकट, आरबीआई ने कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर जताई चिंता, जानें क्या कहा
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महँगाई दर का अनुमान घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया है। हालांकि, केंद्रीय बैंक ने साथ ही यह भी कहा है कि तेज़ी से प्रभावी हो रहा एल नीनो और कमज़ोर व असमान दक्षिण-पश्चिम मानसून देश की कृषि, ग्रामीण माँग और आर्थिक वृद्धि के लिए चुनौती बन सकते हैं। आरबीआई का मानना है कि यदि मानसून सामान्य से कमज़ोर रहता है तो इसका असर खरीफ़ फसलों के उत्पादन, किसानों की आय और ग्रामीण बाज़ारों पर पड़ सकता है।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि सरकार की ओर से फसल विविधीकरण, कम अवधि वाली और जलवायु-अनुकूल फसलों को बढ़ावा देने, जल संरक्षण और जल संचयन जैसी योजनाओं से इस असर को काफ़ी हद तक कम किया जा सकता है। साथ ही देश में पर्याप्त खाद्यान्न भंडार होने से खाद्य आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिलेगी। इसके बावजूद कच्चे तेल की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ आने वाले समय में महँगाई पर दबाव बना सकती हैं।
महँगाई का अनुमान घटा, लेकिन जोखिम बरक़रार
आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महँगाई का अनुमान 5.1 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया है। पहली तिमाही के लिए महँगाई का अनुमान 4.1 प्रतिशत, दूसरी तिमाही के लिए 4.7 प्रतिशत, तीसरी तिमाही के लिए 5.9 प्रतिशत और चौथी तिमाही के लिए 5.5 प्रतिशत रखा गया है। केंद्रीय बैंक का कहना है कि तीसरी तिमाही में महँगाई अपने उच्च स्तर पर पहुँच सकती है और उसके बाद इसमें धीरे-धीरे कमी आने की उम्मीद है। वहीं कोर महँगाई का अनुमान भी 4.7 प्रतिशत से घटाकर 4.3 प्रतिशत कर दिया गया है।
अल नीनो से खरीफ़ फसलों पर बढ़ सकता है असर
आरबीआई ने कहा कि एल नीनो की स्थिति में बारिश का समय और वितरण दोनों प्रभावित होते हैं। इससे खरीफ़ मौसम की कई फसलों, विशेषकर दलहन, तिलहन, बाजरा, मक्का, अरहर और मूँगफली के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने इस बार सामान्य से कम, यानी दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का लगभग 90 प्रतिशत मानसूनी वर्षा होने का अनुमान जताया है। यदि बारिश में कमी रहती है तो कृषि उत्पादन घट सकता है, किसानों की आय प्रभावित हो सकती है और ग्रामीण इलाक़ों में उपभोक्ता माँग भी कमज़ोर पड़ सकती है।
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, जलवायु-अनुकूल बीजों का उपयोग और कम अवधि वाली फसलों को बढ़ावा देने जैसे कई कदम उठाए हैं। इसके अलावा देश में चावल और गेहूँ का पर्याप्त भंडार भी उपलब्ध है, जिससे खाद्य आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
खेती पर असर से महँगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा दबाव
भारत की लगभग आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। ऐसे में यदि मौसम की वजह से फसल उत्पादन प्रभावित होता है तो इसका सीधा असर किसानों की आय, ग्रामीण रोज़गार और उपभोक्ता ख़र्च पर पड़ता है। साथ ही सब्ज़ियों, दालों और खाद्य तेलों की क़ीमतें बढ़ने से महँगाई पर भी दबाव बन सकता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने जून से अगस्त के बीच अल नीनो विकसित होने की 80 प्रतिशत और नवंबर तक इसके बने रहने की 90 प्रतिशत से अधिक संभावना जताई है। ऐसे में आने वाले महीनों में मानसून की स्थिति और कृषि उत्पादन पर सभी की नज़र रहेगी।