कम पानी-कम रसायन और ज्यादा मुनाफे का दावा करती ये खेती, जानिए विश्व पर्यावरण दिवस पर क्यों हो रही है चर्चा?
हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को लेकर चर्चा होती है। लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि खेती और पर्यावरण का आपस में क्या संबंध है? दरअसल कृषि क्षेत्र देश के सबसे बड़े प्राकृतिक संसाधन उपभोक्ताओं में से एक है। सिंचाई में भारी मात्रा में पानी का उपयोग, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग, भूजल का दोहन और फसल अवशेषों का प्रबंधन जैसी चुनौतियां पर्यावरण पर सीधा असर डालती हैं। ऐसे में कृषि वैज्ञानिक(कृषि विज्ञान केंद्र, कटिया-सीतापुर उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. दया शंकर श्रीवास्तव ने बताया कि अब ऐसी खेती प्रणालियों को बढ़ावा दिया जा रहा हैं जो उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण की भी रक्षा करें।
क्या है प्राकृतिक संसाधनों को बचाने वाली खेती?
सबसे पहले बात होती है एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System-IFS) की। ये ऐसा ही एक मॉडल है, जिसे पर्यावरण अनुकूल खेती का प्रभावी तरीका माना जाता है। इस मॉडल में किसान केवल एक फसल पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि खेती के साथ पशुपालन, बागवानी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन और जैविक खाद निर्माण जैसी गतिविधियों को जोड़ता है। इससे खेत में एक ऐसा चक्र बनता है जिसमें एक गतिविधि का अपशिष्ट दूसरी गतिविधि के लिए संसाधन बन जाता है।
कम रसायन, ज्यादा जैविक संसाधन
पारंपरिक खेती में किसान अक्सर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भर रहते हैं। इससे मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है और उत्पादन लागत भी बढ़ती है। एकीकृत कृषि प्रणाली में पशुओं के गोबर और कृषि अवशेषों से तैयार जैविक खाद का उपयोग किया जाता है। इससे रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कम होती है और मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है और इससे खेत की जैव विविधता भी सुरक्षित रहती है।
पानी की बचत में भी मददगार
देश के कई हिस्सों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। ऐसे में ऐसी खेती प्रणालियों की जरूरत बढ़ गई है जो पानी का बेहतर उपयोग करें। एकीकृत कृषि प्रणाली में वर्षा जल संचयन, तालाब आधारित खेती, ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग जैसी तकनीकों को शामिल किया जाता है। इससे सिंचाई के लिए कम पानी की आवश्यकता होती है और जल संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
किसानों की आय बढ़ाने का विकल्प
इस मॉडल का सबसे बड़ा लाभ यह माना जाता है कि किसान की आय केवल एक फसल पर निर्भर नहीं रहती। यदि किसी मौसम में फसल को नुकसान हो जाए, तो पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन या बागवानी जैसी गतिविधियां आय का दूसरा स्रोत बन सकती हैं क्योंकि बहु-आयामी कृषि मॉडल किसानों को आर्थिक रूप से अधिक सुरक्षित बनाता है और जोखिम कम करता है।
जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में कारगर
पिछले कुछ वर्षों में बेमौसम बारिश, सूखा, ओलावृष्टि और तापमान में बढ़ोतरी जैसी घटनाएं बढ़ी हैं। ऐसे में केवल एक फसल पर आधारित खेती अधिक जोखिम भरी हो गई है। एकीकृत कृषि प्रणाली किसानों को मौसम संबंधी जोखिमों से बचाने में मदद करती है। अलग-अलग गतिविधियों के कारण किसी एक क्षेत्र में नुकसान होने पर पूरा कृषि तंत्र प्रभावित नहीं होता।
खेत का कचरा भी बनता है संसाधन
इस मॉडल की खास बात यह है कि इसमें अपशिष्ट को भी उपयोगी संसाधन माना जाता है। फसल अवशेषों से कम्पोस्ट बनाई जा सकती है, पशुओं के गोबर से जैविक खाद और बायोगैस तैयार की जा सकती है, जबकि मत्स्य पालन से निकलने वाले पोषक तत्व खेतों में उपयोग किए जा सकते हैं। इससे खेत में "वेस्ट टू वेल्थ" यानी कचरे से संपदा का सिद्धांत लागू होता है।
पर्यावरण को कैसे मिलता है फायदा?
एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाने से रासायनिक प्रदूषण कम होता है, मिट्टी की सेहत बेहतर रहती है, भूजल संरक्षण को बढ़ावा मिलता है और कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आ सकती है। इसके अलावा खेतों में पेड़, पशु और विभिन्न फसलें होने से जैव विविधता बढ़ती है, जो पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में मदद करती है।
भविष्य की खेती का मॉडल?
बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए भविष्य की खेती केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रह सकती। अब ऐसी खेती की जरूरत है जो किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी, पानी और पर्यावरण को भी सुरक्षित रखे। एकीकृत कृषि प्रणाली को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।