रेगिस्तान का ‘वाटरमैन’: तपती रेत में तालाबों को फिर से जिंदगी दे रहे हैं बलवंत सिंह जोधा
राजस्थान के जैसलमेर में इन दिनों तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच चुका है। चिलचिलाती धूप और गर्म हवाओं ने जनजीवन को प्रभावित कर दिया है। तालाब सूख रहे हैं, जल स्रोत सिकुड़ रहे हैं और इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों तथा वन्य जीवों के सामने भी पानी का संकट गहराने लगा है।
ऐसे कठिन हालात में एक व्यक्ति पिछले नौ वर्षों से रेगिस्तान में पानी की उम्मीद जगा रहा है। जैसलमेर जिले के पोकरण निवासी 38 वर्षीय बलवंत सिंह जोधा उन पुराने तालाबों को खोजने और पुनर्जीवित करने के मिशन में जुटे हैं, जो समय के साथ मिट्टी में दब गए या अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए। आज इलाके के लोग उन्हें प्यार से "जैसलमेर का वाटरमैन" कहने लगे हैं।
बलवंत सिंह जोधाअब तक पाँच तालाबों को पुनर्जीवित कर चुके बलवंत सिंह न केवल जल संरक्षण का काम कर रहे हैं, बल्कि रेगिस्तान के वन्य जीवों, पशुओं और आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी की सुरक्षा भी सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसी समर्पण ने उन्हें "जैसलमेर का वाटरमैन" बना दिया है।
एक तालाब से शुरू हुई थी यात्रा
बलवंत सिंह जोधा बताते हैं कि वर्ष 2017 में उन्होंने पोकरण के रामदेवसर तालाब की खुदाई का काम शुरू करवाया था। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह प्रयास आगे चलकर एक बड़े अभियान का रूप ले लेगा। आज वह तालाब सालभर पानी से भरा रहता है और आसपास के पशु-पक्षियों तथा वन्य जीवों के लिए जीवनदायिनी भूमिका निभा रहा है।
जोधा कहते हैं, "जब मैं देखता हूं कि हिरण, चिंकारा, पक्षी और पशु मेरे द्वारा पुनर्जीवित किए गए तालाबों से पानी पी रहे हैं, तो मुझे सबसे ज्यादा संतोष मिलता है।"
मिट्टी में दबे तालाबों को फिर दे रहे हैं नई पहचान
पिछले नौ वर्षों में बलवंत सिंह पांच तालाबों को पुनर्जीवित कर चुके हैं। अब दो और तालाबों की खुदाई का काम बारिश से पहले पूरा करने की तैयारी चल रही है। उनका मानना है कि लोग अक्सर इन पारंपरिक जल स्रोतों की उपयोगिता को नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि रेगिस्तान में भूजल स्तर को बनाए रखने में इन तालाबों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। वे कहते हैं कि जल संकट का समाधान केवल नए संसाधन खोजने में नहीं, बल्कि पुराने जल स्रोतों को बचाने और पुनर्जीवित करने में भी छिपा है।
वन्य जीवों की प्यास बुझाने वाली जीवनरेखा
थार रेगिस्तान केवल रेत का विशाल समुद्र नहीं है, बल्कि यह भारत के सबसे समृद्ध मरुस्थलीय पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है। यहाँ चिंकारा, काला हिरण, मरु लोमड़ी, नीलगाय, ऊंट, गोडावण और कैराकाल जैसे दुर्लभ वन्य जीव पाए जाते हैं।
भीषण गर्मी के दौरान इन जीवों के लिए पानी सबसे बड़ी जरूरत बन जाता है। ऐसे समय में पारंपरिक तालाब ही उनकी प्यास बुझाने का सहारा बनते हैं। यही वजह है कि बलवंत सिंह का काम केवल जल संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वन्यजीव संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है।
भूजल संकट से लड़ाई का स्थानीय समाधान
जैसलमेर के भूजल वैज्ञानिक नारायणदास इणखिया बताते हैं कि जिले में औसत भूजल स्तर 50 से 60 मीटर के आसपास है। कई इलाकों में पानी 100 मीटर से भी अधिक गहराई पर मिलता है, जबकि कुछ गांवों में 1000 फीट तक खुदाई करने पर भी पानी नहीं मिलता।
कम वर्षा, रेतीली जमीन और भूजल के लगातार दोहन ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जल संचयन बढ़ाना ही इस संकट का सबसे प्रभावी समाधान है और पारंपरिक तालाब इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
तालाब से ज्यादा जरूरी है उसका कैचमेंट
वर्तमान में बलवंत सिंह माडवा और डिडाणिया गाँव में तालाबों के पुनर्जीवन का काम कर रहे हैं। उनके अनुसार सबसे बड़ी चुनौती तालाब नहीं, बल्कि उसके कैचमेंट क्षेत्र को बचाना है।
वे बताते हैं कि कई पुराने तालाबों के कैचमेंट क्षेत्र राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हैं। परिणामस्वरूप बाद में ये जमीनें अन्य परियोजनाओं या कंपनियों को आवंटित कर दी जाती हैं और तालाबों तक पानी पहुंचने के प्राकृतिक रास्ते बंद हो जाते हैं। उनका मानना है कि यदि पानी आने का रास्ता ही खत्म हो जाएगा, तो तालाब चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह कभी नहीं भर पाएगा।
सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करवा चुके हैं दस कैचमेंट क्षेत्र
बलवंत सिंह अब तक करीब दस तालाबों के कैचमेंट क्षेत्रों को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करवाने में सफल रहे हैं। यह काम आसान नहीं है। इसके लिए उन्हें लगातार सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, दस्तावेज जुटाने पड़ते हैं और अधिकारियों को समझाना पड़ता है कि यह केवल जमीन नहीं, बल्कि भविष्य की जल सुरक्षा का सवाल है।
इतिहास की किताबों से मिलती है नई राह
इस मिशन की सबसे दिलचस्प बात यह है कि बलवंत सिंह लुप्त हो चुके तालाबों की जानकारी इतिहास की किताबों से जुटाते हैं। उनके पास मुहनोत नैणसी द्वारा लिखी गई प्रसिद्ध पुस्तक "मारवाड़ परगना री विगत" है, जिसमें प्राचीन मारवाड़ रियासत के तालाबों और जल स्रोतों का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
जब किसी स्थान पर तालाब का जिक्र मिलता है, तो वे वहां जाकर पुराने अवशेष, शिलालेख या अन्य प्रमाण खोजते हैं। कई बार यही संकेत उन्हें भूले-बिसरे तालाबों तक पहुंचा देते हैं।
लोगों के सहयोग से आगे बढ़ रहा मिशन
इस समय डिडाणिया और माडवा गांव में तालाबों पर काम स्थानीय लोगों की आर्थिक सहायता से चल रहा है। डिडाणिया का तालाब पूरी तरह लुप्त हो चुका था, जबकि माडवा के तालाब की गहराई बढ़ाकर उसकी जल संचयन क्षमता बढ़ाई जा रही है। बलवंत सिंह का अगला लक्ष्य गोमट गांव में तालाब का पुनर्जीवन है। इसके लिए गांव के लोग भी सहयोग के लिए आगे आ रहे हैं।
रेगिस्तान की जिंदगी बचाने की मुहिम
जब तापमान लगातार बढ़ रहा हो, भूजल नीचे जा रहा हो और जल संकट गहराता जा रहा हो, तब ऐसे तालाब केवल जल स्रोत नहीं रह जाते, बल्कि जीवनरेखा बन जाते हैं।
बलवंत सिंह जोधा का प्रयास यह बताता है कि बदलाव हमेशा बड़े बजट या सरकारी योजनाओं से ही नहीं आता। कभी-कभी एक व्यक्ति का संकल्प भी पूरे इलाके की तस्वीर बदल सकता है। रेगिस्तान की तपती रेत में वह सिर्फ तालाब नहीं खोद रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी और उम्मीद दोनों बचा रहे हैं।
नोट: गाँव कनेक्शन के लिए कुलदीप छंगाणी की राजस्थान के जैसलमेर से रिपोर्ट