जून 2026 बना दुनिया का दूसरा सबसे गर्म जून, पश्चिमी यूरोप में टूटा गर्मी का रिकॉर्ड; अल नीनो से बढ़ा खतरा

Gaon Connection | Jul 09, 2026, 12:37 IST
यूरोप की जलवायु निगरानी संस्था कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) की रिपोर्ट के अनुसार जून 2026 वैश्विक स्तर पर अब तक का दूसरा सबसे गर्म जून रहा, जबकि पश्चिमी यूरोप ने अपने इतिहास का सबसे गर्म जून दर्ज किया। रिपोर्ट में बताया गया है कि रिकॉर्ड समुद्री तापमान, भीषण हीटवेव, सूखा और जंगलों में आग जैसी घटनाओं के पीछे तेज़ी से विकसित हो रहा एल नीनो भी एक प्रमुख कारण है। वैज्ञानिकों ने आने वाले महीनों में जलवायु जोखिम और बढ़ने की आशंका जताई है।

दुनिया लगातार बढ़ते तापमान और बदलती जलवायु के प्रभावों का सामना कर रही है। जून 2026 में भी वैश्विक स्तर पर गर्मी का असर बेहद गंभीर रहा। कई देशों में रिकॉर्डतोड़ तापमान दर्ज किया गया, समुद्र पहले से अधिक गर्म हो गए और भीषण गर्मी, सूखा तथा जंगलों में आग जैसी घटनाओं ने जलवायु परिवर्तन के बढ़ते ख़तरे को एक बार फिर उजागर कर दिया। वैज्ञानिकों का कहना है कि एल नीनो की मज़बूत होती परिस्थितियाँ भी इस बदलाव को और तेज़ कर रही हैं।



यूरोपीय सेंटर फ़ॉर मीडियम-रेंज वेदर फ़ोरकास्ट्स (ECMWF) द्वारा विकसित कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार जून 2026 वैश्विक स्तर पर अब तक का दूसरा सबसे गर्म जून रहा। वहीं पश्चिमी यूरोप ने अपने इतिहास का सबसे गर्म जून दर्ज किया। रिपोर्ट के मुताबिक लगातार बढ़ता वैश्विक तापमान, रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा समुद्री तापमान और तेज़ होती एल नीनो परिस्थितियाँ आने वाले समय में लोगों, पारिस्थितिकी तंत्र और बुनियादी ढाँचे के लिए बड़े जोखिम पैदा कर सकती हैं।



दुनिया और यूरोप में टूटी गर्मी की सीमाएँ, सूखा और जंगलों की आग ने बढ़ाई चिंता

कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस की रिपोर्ट के अनुसार जून 2026 में वैश्विक औसत सतही वायु तापमान 16.54 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। यह 1991-2020 की औसत अवधि की तुलना में 0.56 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा और जून 2024 के बाद दूसरा सबसे गर्म जून साबित हुआ। यह तापमान अनुमानित पूर्व-औद्योगिक काल (1850-1900) के औसत से 1.39 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी यूरोप में जून 2026 अब तक का सबसे गर्म जून रहा। यहाँ औसत तापमान 20.74 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो 1991-2020 की औसत से 3.05 डिग्री सेल्सियस अधिक है। इससे जून 2025 का पिछला रिकॉर्ड भी टूट गया।



पूरे यूरोप के भूमि क्षेत्र का औसत तापमान जून 2026 में 19.14 डिग्री सेल्सियस रहा, जो 1991-2020 के औसत से 1.78 डिग्री सेल्सियस अधिक है। यह यूरोप के इतिहास का दूसरा सबसे गर्म जून रहा, जबकि पहला स्थान जून 2019 के नाम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जून के दूसरे पखवाड़े में यूरोप के बड़े हिस्से में भीषण लू चली। इससे पहले मई में भी गंभीर गर्मी का दौर देखा गया था। जून की लू ने कई यूरोपीय देशों में मासिक और अब तक के सबसे अधिक तापमान के रिकॉर्ड तोड़ दिए। इसका लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ा और गर्मी से संबंधित मौतों के मामले भी सामने आए।



यूरोप के कई हिस्सों में लंबे समय से जारी सूखे और अत्यधिक गर्मी ने जंगलों में आग लगने की घटनाओं को बढ़ावा दिया। विशेष रूप से आइबेरियन प्रायद्वीप और दक्षिणी फ़्राँस में जंगलों में आग की गतिविधियाँ बढ़ीं। वहीं पूर्वी यूरोप के कई इलाक़ों में सूखे का ख़तरा और गहरा हो गया। रिपोर्ट के अनुसार मई में शुरू हुआ मिट्टी का सूखापन जून तक और बढ़ गया, जिससे सूखे की स्थिति और गंभीर हो गई।



समुद्र भी पहुँचे रिकॉर्ड गर्मी पर, अल नीनो के और मज़बूत होने की आशंका

रिपोर्ट के मुताबिक जून 2026 में अतिरिक्त ध्रुवीय महासागरों (60° दक्षिण से 60° उत्तर अक्षांश) का औसत समुद्री सतह तापमान (Sea Surface Temperature-SST) 20.86 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो जून महीने का अब तक का सबसे अधिक स्तर है। यह जून 2024 के 20.85 डिग्री सेल्सियस के पिछले रिकॉर्ड से 0.01 डिग्री सेल्सियस अधिक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एल नीनो की परिस्थितियाँ लगातार मज़बूत हो रही हैं। इसी कारण उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के बड़े हिस्से में समुद्री सतह का तापमान सामान्य से अधिक बना हुआ है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले कुछ महीनों में एल नीनो और तेज़ी से विकसित हो सकता है।



ECMWF की जलवायु रणनीति प्रमुख सामंथा बर्गेस ने कहा कि जून 2026 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु किस तेज़ी से बदल रही है। पश्चिमी यूरोप ने अपने इतिहास का सबसे गर्म जून दर्ज किया, जबकि वैश्विक महासागर लगातार रिकॉर्ड गर्म बने हुए हैं। उनके अनुसार ये आँकड़े दिखाते हैं कि पृथ्वी की जलवायु प्रणाली लगातार गर्मी संचित कर रही है। इसका परिणाम अधिक तीव्र हीटवेव, लगातार गर्म होते महासागर और यूरोप सहित दुनिया के अन्य हिस्सों में लोगों, पारिस्थितिकी तंत्र तथा बुनियादी ढाँचे के लिए बढ़ते जोखिम के रूप में सामने आ रहा है।

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