मक्के की फ़सल पर मौसम की मार! देशभर में 5% घटी बुवाई; खरीफ़ उत्पादन से लेकर एथेनॉल और पोल्ट्री उद्योग तक बढ़ी चिंता

Gaon Connection | Jul 23, 2026, 12:01 IST
मध्य प्रदेश में खरीफ़ सीज़न के दौरान मक्के की बुवाई 23 प्रतिशत बढ़ी है, लेकिन कर्नाटक और महाराष्ट्र में कम बारिश के कारण रक़बा घटने से देशभर में कुल बुवाई लगभग पाँच प्रतिशत कम रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे मक्का उत्पादन और पशु चारा उद्योग पर दबाव बढ़ सकता है, जबकि एथेनॉल क्षेत्र को फ़सल पर बड़े असर की आशंका कम है।

खरीफ़ सीज़न में मक्के की खेती को लेकर देशभर में मिले-जुले संकेत सामने आए हैं। एक ओर मध्य प्रदेश में मक्के की बुवाई में तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई है, वहीं कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में कम बारिश और मानसून में देरी के कारण बुवाई प्रभावित हुई है। इसका असर देश के कुल रक़बे पर भी दिखा है, जहाँ पिछले वर्ष की तुलना में मक्के की बुवाई लगभग पाँच प्रतिशत घट गई है। इससे आने वाले महीनों में उत्पादन और पशु चारा उद्योग की ज़रूरतों को लेकर चिंता बढ़ने लगी है।



कृषि मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार 17 जुलाई तक देश में 67.89 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मक्के की बुवाई हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 71.5 लाख हेक्टेयर थी। विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य प्रदेश में बढ़ी बुवाई से कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन कर्नाटक और महाराष्ट्र में आई गिरावट की पूरी भरपाई होना मुश्किल दिखाई दे रही है। यदि बारिश की स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ तो खरीफ़ मक्का उत्पादन पिछले वर्ष के स्तर तक पहुँचना कठिन हो सकता है।



मध्य प्रदेश ने दिखाई तेज़ बढ़त, कई राज्यों में घटी बुवाई

कृषि मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश में 17 जुलाई तक 23.37 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मक्के की बुवाई हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 19 लाख हेक्टेयर थी। यानी राज्य में मक्के का रक़बा लगभग 23 प्रतिशत बढ़ा है। इसके उलट कर्नाटक में सामान्य से कम वर्षा के कारण मक्के की बुवाई क़रीब 30 प्रतिशत घटकर 9.43 लाख हेक्टेयर रह गई। महाराष्ट्र में भी रक़बा 5.1 प्रतिशत घटकर 9.59 लाख हेक्टेयर पर पहुँच गया। राजस्थान, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में भी बुवाई में गिरावट दर्ज की गई है, जबकि आंध्र प्रदेश और बिहार में मामूली बढ़ोतरी देखने को मिली है।



अल नीनो और बारिश की कमी से उत्पादन पर असर की आशंका

आईग्रेन इंडिया ने 'बिजनेस लाइन' को बताया कि अल नीनो के प्रभाव से हुई वर्षा की कमी के कारण कई राज्यों में बुवाई प्रभावित हुई है। हालांकि अच्छी क़ीमत मिलने की वजह से किसान अब भी मक्के को पसंदीदा फसल मान रहे हैं। उन्होंने कहा कि कर्नाटक और महाराष्ट्र में बुवाई का समय तेज़ी से निकल रहा है, ऐसे में पिछले वर्ष जितना उत्पादन हासिल करना मुश्किल दिखाई देता है।



'बिजनेस लाइन' के मुताबिक, सीएलएफएमए ऑफ इंडिया के चेयरमैन दिव्य कुमार गुलाटी ने कहा कि कई राज्यों में बुवाई प्रभावित होने से इस वर्ष मक्का उत्पादन कम रहने की आशंका है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले वर्ष मक्के के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे रहने के कारण कुछ किसान इस बार बेहतर भाव मिलने से सोयाबीन की खेती की ओर रुख़ कर सकते हैं।



पशु चारा उद्योग पर दबाव, एथेनॉल क्षेत्र ने जताई उम्मीद

सीएलएफएमए ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष और कर्नाटक पोल्ट्री फ़ार्मर्स एंड ब्रीडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष नवीन पसुपार्थी ने कहा कि मक्के की बुवाई में देरी और रक़बा घटने से इस वर्ष पशु चारा उद्योग के सामने चुनौती खड़ी हो सकती है। उनका कहना है कि देर से बुवाई होने के कारण नई फ़सल की आवक भी लगभग एक महीने की देरी से, यानी दिसंबर के आसपास शुरू होने की संभावना है।



हालाँकि एथेनॉल क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का मानना है कि मक्के की फ़सल पर बहुत बड़ा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि इस फसल को अपेक्षाकृत कम पानी की आवश्यकता होती है। उनका कहना है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे राज्यों में फ़सल की स्थिति बेहतर बनी हुई है। वहीं देशभर के 14 पोल्ट्री संगठनों ने मक्का और सोयाबीन जैसी प्रमुख फ़सलों का डिजिटल सर्वे शुरू कराया है, ताकि उत्पादन का सटीक आकलन किया जा सके।

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