जैविक खेती की ओर बढ़ा लद्दाख! रासायनिक उर्वरकों पर रोक के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती, किसानों तक कैसे पहुँचेगी पर्याप्त जैविक खाद?
लद्दाख को देश का पहला पूरी तरह जैविक केंद्रशासित प्रदेश बनाने की दिशा में प्रशासन ने बड़ा क़दम उठाते हुए रासायनिक उर्वरकों की बिक्री और इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस फ़ैसले को प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने की दिशा में अहम पहल माना जा रहा है। हालांकि इस बदलाव के साथ अब सबसे बड़ी चुनौती किसानों को पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद उपलब्ध कराने की होगी, क्योंकि खेती की पूरी व्यवस्था अब जैविक संसाधनों पर निर्भर हो जाएगी।
लद्दाख प्रशासन का लक्ष्य सभी 666 राजस्व गाँवों को प्रमाणित जैविक गाँवों में बदलना है। वर्ष 2020 में शुरू की गई मिशन ऑर्गेनिक डेवलपमेंट इनिशिएटिव (MODI) के तहत अब तक 207 गाँवों को ऑर्गेनिक प्रमाणन के दायरे में लाया जा चुका है। लगभग 500 करोड़ रुपये की इस योजना में जैविक उर्वरक उत्पादन, गुणवत्तापूर्ण बीज, संरक्षित खेती और जैविक उत्पादों के विपणन को बढ़ावा देने की व्यवस्था की गई है। लेकिन ज़मीन पर इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसानों तक समय पर पर्याप्त जैविक खाद पहुँच पाती है या नहीं।
रासायनिक उर्वरकों पर पूरी तरह रोक, जैविक खेती को मिलेगा बढ़ावा
पिछले सप्ताह उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना ने लद्दाख में रासायनिक उर्वरकों की बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध की घोषणा की। यह फ़ैसला केंद्रशासित प्रदेश की दीर्घकालिक जैविक खेती नीति का हिस्सा है। प्रशासन का उद्देश्य प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ संवेदनशील हिमालयी पर्यावरण का संरक्षण करना है। योजना के तहत जैविक उर्वरक उत्पादन इकाइयों की स्थापना, किसानों को बीज उपलब्ध कराना, ग्रीनहाउस आधारित खेती को प्रोत्साहन देना और जैविक उत्पादों के बेहतर बाज़ार की व्यवस्था भी शामिल है।
जौ से लेकर सेब तक, सभी फ़सलों पर पड़ेगा असर
लद्दाख की ऊँचाई वाले ठंडे रेगिस्तानी इलाक़ों में जौ, गेहूँ, मटर, कुट्टू, कांगनी और सरसों जैसी फ़सलें उगाई जाती हैं। इसके अलावा गोभी, फूलगोभी, टमाटर, प्याज़, गाजर, आलू, मूली, शलजम और हरी पत्तेदार सब्ज़ियों की भी खेती होती है। बागवानी के क्षेत्र में यहाँ ख़ुबानी, सेब, अखरोट, नाशपाती, अंगूर और शहतूत का उत्पादन भी होता है। रासायनिक उर्वरकों पर रोक लगने के बाद इन सभी फ़सलों की पैदावार और गुणवत्ता अब पूरी तरह जैविक पोषण व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
किसानों के सामने जैविक खाद की कमी सबसे बड़ी चुनौती
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, लेह के किसानों को कहना है कि 1980 के दशक से पहले लद्दाख में पूरी खेती जैविक तरीक़े से होती थी। उस समय खेतों में गोबर की खाद और पारंपरिक सूखे शौचालयों से बनने वाली खाद का उपयोग किया जाता था, लेकिन समय के साथ पशुओं की संख्या घटती गई और आधुनिक शौचालयों के इस्तेमाल से जैविक खाद के पारंपरिक स्रोत भी कम हो गए। अब सूखे शौचालय केवल कुछ दूरदराज़ के गाँवों में ही बचे हैं। गाँवों के प्रधान प्रशासन को जैविक खाद की आवश्यकता बताते हैं, जिसके बाद सहकारी समितियाँ किसानों को रियायती दरों पर खाद उपलब्ध कराती हैं। हालांकि उनका कहना है कि पशुओं से मिलने वाली खाद लगातार कम हो रही है, जिससे आने वाले समय में दिक्कत बढ़ सकती है।
जैविक खेती की सफलता खाद की उपलब्धता पर निर्भर
मिशन ऑर्गेनिक डेवलपमेंट इनिशिएटिव के तहत वर्ष 2020 में जैविक मूल्य श्रृंखला विकसित करने के लिए 50 करोड़ रुपये और संरक्षित खेती व सब्सिडी वाले ग्रीनहाउस के लिए 125.54 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए थे। लेह स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद ने भी टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को विभिन्न प्रोत्साहन दिए हैं। प्रशासन का मानना है कि यदि जैविक खाद, बायो-फ़र्टिलाइज़र और पशु आधारित खाद की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है, तो लद्दाख प्रीमियम जैविक कृषि उत्पादों का बड़ा केंद्र बन सकता है। लेकिन यदि खाद उत्पादन और आपूर्ति समय पर नहीं बढ़ाई गई, तो पूरी जैविक खेती की योजना को सबसे बड़ी चुनौती खेतों में ही झेलनी पड़ सकती है।