Yak Churpi: लद्दाख की याक चुरपी को ब्राज़ील में गोल्ड मेडल, जानिए कैसे स्थानीय परंपरा ने हासिल की वैश्विक पहचान

Mansi | Aug 12, 2026, 15:19 IST
लद्दाख की याक चुरपी ने ब्राज़ील में स्वर्ण पदक जीतकर एक नई उपलब्धि हासिल की है। यह उत्पाद चांगथांग की परंपरागत संस्कृति का प्रतीक है और इससे स्थानीय पशुपालकों के लिए नए व्यावसायिक अवसर उत्पन्न होंगे। यह सफलता विभिन्न विभागों और संगठनों के संयुक्त प्रयासों के कारण संभव हुई है। याक चुरपी को अब एक विशेष भौगोलिक पहचान भी मिल गई है।

लद्दाख के चांगथांग इलाके की पारंपरिक याक चुरपी ने अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बना ली है। वर्ष 2026 में ब्राज़ील में आयोजित प्रतिष्ठित चौथे मुंडियल दो क्वेइजो दो ब्राज़ील में चांगथांग की याक चुरपी ने गोल्ड मेडल हासिल किया। बर्फ़ीले पहाड़ों और बेहद कठिन मौसम वाले इस इलाके में पीढ़ियों से तैयार किए जा रहे इस पारंपरिक दुग्ध उत्पाद को दुनिया के बड़े मंच पर मिली पहचान स्थानीय पशुपालकों के लिए गर्व का विषय है।



यह उपलब्धि सिर्फ़ एक खाद्य उत्पाद को मिला पुरस्कार नहीं है, बल्कि चांगथांग की उस पारंपरिक जीवनशैली की भी पहचान है, जिसमें याक पालन और पशुपालन सदियों से लोगों की आजीविका का हिस्सा रहे हैं। स्थानीय परंपरा से वैश्विक पहचान तक पहुँची याक चुरपी की यह कहानी बताती है कि पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय संसाधनों और आधुनिक सोच को साथ जोड़ा जाए तो दूर-दराज़ के इलाक़ों के उत्पाद भी दुनिया के बड़े बाज़ार और मंच तक पहुँच सकते हैं।



याक चुरपी क्या है?

याक चुरपी याक के दूध से तैयार किया जाने वाला पारंपरिक दुग्ध उत्पाद है, जिसे लद्दाख और हिमालयी क्षेत्रों में लंबे समय से बनाया जाता रहा है। इसे स्थानीय लोग चीज़ के रूप में इस्तेमाल करते हैं। ठंडे और ऊँचाई वाले इलाक़ों में याक पालन वहाँ के लोगों की पारंपरिक आजीविका का अहम हिस्सा रहा है और याक के दूध से बनने वाली चुरपी इसी परंपरा से जुड़ी हुई है। याक के दूध से तैयार होने वाली चुरपी को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बनाया जाता है। इसका महत्व केवल खाने की चीज़ के रूप में नहीं है, बल्कि यह चांगथांग के पशुपालक समुदाय के पारंपरिक ज्ञान और जीवनशैली से भी जुड़ी है। अब इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने से स्थानीय पशुपालकों और युवाओं के लिए अपने उत्पाद को नए बाज़ारों तक पहुँचाने की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं।



पीढ़ियों से याक पालन से जुड़ा परिवार

चांगथांग के लालोक क्षेत्र से जुड़े थेनले नूरबू का परिवार कई पीढ़ियों से याक और दूसरे पशुओं के पालन से जुड़ा रहा है। पशुपालन के दौरान उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि स्थानीय संसाधनों से और कौन-कौन से उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं और उनसे बेहतर आमदनी कैसे हासिल की जा सकती है। इसी सोच के साथ उन्होंने याक के दूध से चीज़, घी, दही और दूसरे दुग्ध उत्पाद तैयार करने पर काम किया। लद्दाख की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और बेहद कम तापमान के बीच दुग्ध उत्पाद तैयार करना आसान नहीं है। इसके लिए लगातार मेहनत, धैर्य और स्थानीय परिस्थितियों की अच्छी समझ की ज़रूरत होती है।



करीब 30 देशों के बीच मिली बड़ी पहचान

ब्राज़ील में आयोजित इस प्रतियोगिता में करीब 30 देशों ने हिस्सा लिया और लगभग 2,700 तरह के चीज़ प्रस्तुत किए गए। ऐसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर चांगथांग की पारंपरिक याक चुरपी को गोल्ड मेडल मिलना लद्दाख के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस सम्मान से यह भी उम्मीद बढ़ी है कि चांगथांग और लद्दाख के दूसरे स्थानीय उत्पादों को आगे नए बाज़ार मिल सकते हैं। पारंपरिक उत्पादों में मूल्यवर्धन, बेहतर पैकेजिंग, पहचान और बाज़ार तक पहुँच बनाने पर काम किया जाए तो पशुपालक परिवारों के लिए आमदनी के नए रास्ते खुल सकते हैं।



उपलब्धि में विभागों और संस्थाओं का सहयोग

याक चुरपी को मिला यह सम्मान केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं है। पशुपालन विभाग की मदद और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के सहयोग से यह उत्पाद अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता तक पहुँच सका। इस तरह स्थानीय स्तर पर तैयार होने वाला उत्पाद सामूहिक प्रयासों के ज़रिए वैश्विक मंच तक पहुँचा। यह उपलब्धि इस बात का भी उदाहरण है कि स्थानीय उत्पादों को तकनीकी सहयोग, संस्थागत मदद और सही मंच मिले तो उनकी पहचान दूर तक बनाई जा सकती है।



याक उत्पादों में मूल्यवर्धन पर काम

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की ओर से साझा की गई जानकारी के अनुसार, याक से जुड़े शोध और तकनीक के ज़रिए याक के दूध से बनने वाले उत्पादों में मूल्यवर्धन को बढ़ावा दिया जा रहा है। आईसीएआर के राष्ट्रीय याक अनुसंधान केंद्र, दिरांग की ओर से याक पालन से जुड़े समुदायों तक नई तकनीक और जानकारी पहुँचाने का काम भी किया जा रहा है। आईसीएआर की जानकारी में बताया गया है कि याक पालन से जुड़े समुदायों के बीच याक उत्पादों के बेहतर इस्तेमाल और मूल्यवर्धन से जुड़ी जानकारी पहुँचाई जा रही है। 560 से अधिक जनजातीय किसानों और युवाओं को याक उत्पादों के मूल्यवर्धन से जुड़े प्रशिक्षण दिए जाने का भी उल्लेख है। इससे स्थानीय समुदायों को पारंपरिक संसाधनों से बेहतर आजीविका तैयार करने में मदद मिल सकती है।



याक चुरपी को भौगोलिक पहचान भी मिली

याक चुरपी को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई पंजीकरण भी प्राप्त है। इससे इस उत्पाद की पहचान उसके विशेष भौगोलिक क्षेत्र और पारंपरिक विरासत से जुड़ती है। ऐसी पहचान स्थानीय उत्पाद को बाज़ार में अलग स्थान दिलाने और उसके लिए नए अवसर पैदा करने में मदद कर सकती है। गोल्ड मेडल और भौगोलिक पहचान, दोनों उपलब्धियाँ मिलकर चुरपी को केवल स्थानीय उत्पाद से आगे ले जाती हैं। इससे यह संभावना बनती है कि चांगथांग के दूसरे पारंपरिक उत्पादों को भी आगे बेहतर पहचान और बाज़ार मिल सके।



युवाओं के लिए स्थानीय उत्पादों में बड़ी संभावनाएँ

चांगथांग में पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, जैविक उत्पाद, ऊन, हस्तशिल्प और दूसरे स्थानीय उत्पादों के क्षेत्र में रोज़गार की अच्छी संभावनाएँ हैं। ज़रूरत है कि इन पारंपरिक कामों को नई सोच, बेहतर बाज़ार और आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाए। याक चुरपी को मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान इसका उदाहरण है। अगर युवा अपने पारंपरिक ज्ञान को नए विचारों, मूल्यवर्धन, बेहतर पहचान और बाज़ार से जोड़ें, तो इससे आमदनी के नए रास्ते खुल सकते हैं। साथ ही, इससे स्थानीय संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को भी बचाया जा सकता है।



चांगथांग की याक चुरपी की यह उपलब्धि इसलिए खास है, क्योंकि इसके पीछे केवल एक खाद्य उत्पाद की कहानी नहीं है। इसमें याक पालने वाले परिवारों की मेहनत, स्थानीय ज्ञान और एक ऐसी परंपरा जुड़ी है, जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद पीढ़ियों से जीवित है। ब्राज़ील में मिला यह सम्मान इसी स्थानीय परंपरा से वैश्विक पहचान तक के सफ़र को सामने लाता है और लद्दाख के युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़े उत्पादों में नई संभावनाएँ तलाशने का संदेश देता है।

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