लैवेंडर की खेती से बदल रही पहाड़ के किसानों की जिंदगी, जानिए क्यों खास है ‘लैवेंडर फेस्टिवल 2026’

Preeti Nahar | May 29, 2026, 19:15 IST
Image credit : Gaon Connection Network
जम्मू-कश्मीर के भदेरवाह में 6-7 जून को आयोजित होने वाला चौथा लैवेंडर महोत्सव सिर्फ एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि किसानों, स्टार्टअप्स और ग्रामीण युवाओं के लिए नए बाजार, नई तकनीक और बेहतर कमाई का बड़ा मंच बनने जा रहा है। इस महोत्सव में किसानों को लैवेंडर की खेती, प्रोसेसिंग, तेल निकालने, ब्रांडिंग और बाजार से जुड़ने के मौके मिलेंगे।

Lavender Goes Global: पहाड़ों में पारंपरिक खेती से कम होती आमदनी और बढ़ते पलायन के बीच अब लैवेंडर की खेती किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभर रही है। जम्मू-कश्मीर के भदेरवाह में 6 और 7 जून को आयोजित होने वाला “लैवेंडर फेस्टिवल 2026” इसी बदलाव की कहानी को आगे बढ़ाने जा रहा है।



सीएसआईआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन (CSIR-IIIM) की ओर से आयोजित इस महोत्सव का उद्देश्य किसानों, युवाओं और ग्रामीण उद्यमियों को लैवेंडर आधारित खेती और कारोबार से जोड़ना है। वैज्ञानिकों का दावा है कि लैवेंडर जैसी सुगंधित फसलें पहाड़ी क्षेत्रों में कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाली खेती साबित हो रही हैं।



किसानों के लिए क्यों खास है यह महोत्सव?

महोत्सव में किसानों को लैवेंडर की खेती, पौध तैयार करने, कटाई, तेल निकालने, पैकेजिंग और मार्केटिंग तक की पूरी जानकारी दी जाएगी। इसके अलावा वैज्ञानिक किसानों को बताएंगे कि कम जमीन में भी लैवेंडर की खेती से अच्छी कमाई कैसे की जा सकती है।



खरीदारों और कंपनियों से सीधा संपर्क

कार्यक्रम में परफ्यूम, कॉस्मेटिक, आयुर्वेद और अरोमा उद्योग से जुड़ी कंपनियां भी शामिल होंगी। इससे किसानों और खरीदारों के बीच सीधा संपर्क बनेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए बाजार ढूंढने में आसानी होगी और बिचौलियों पर निर्भरता कम हो सकती है।



युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार का मौका

लैवेंडर से तेल, साबुन, इत्र, अगरबत्ती, हर्बल उत्पाद और कॉस्मेटिक जैसी कई चीजें बनाई जाती हैं। ऐसे में गांवों में छोटे प्रोसेसिंग यूनिट और स्टार्टअप शुरू करने के अवसर भी बढ़ रहे हैं। सीएसआईआर-IIIM के अनुसार इस मिशन से महिलाओं के नेतृत्व वाले कई उद्यम भी शुरू हुए हैं।



अब तक कितने किसानों को मिला फायदा?

सीएसआईआर-अरोमा मिशन के तहत जम्मू-कश्मीर में 5,000 से अधिक किसानों और युवा उद्यमियों को लैवेंडर की खेती से जोड़ा जा चुका है। किसानों को मुफ्त पौधे, तकनीकी प्रशिक्षण और प्रोसेसिंग सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इसके अलावा 50 से ज्यादा स्थायी और मोबाइल आसवन (Distillation) इकाइयां स्थापित की गई हैं, ताकि किसान स्थानीय स्तर पर ही लैवेंडर तेल निकाल सकें।



पहाड़ों के लिए क्यों फायदेमंद है लैवेंडर खेती?

कम पानी में भी हो जाती है खेती- लैवेंडर एक ऐसी फसल मानी जाती है जिसे पारंपरिक फसलों की तुलना में कम पानी की जरूरत होती है। पहाड़ी और सूखे इलाकों में यह किसानों के लिए बेहतर विकल्प बन रही है।



जंगली जानवरों से कम नुकसान- लैवेंडर की खुशबू के कारण जंगली जानवर इस फसल को कम नुकसान पहुंचाते हैं। इससे पहाड़ी किसानों की फसल सुरक्षा की समस्या भी कुछ हद तक कम होती है।



कम जमीन में ज्यादा कमाई- लैवेंडर तेल की बाजार में अच्छी मांग होने के कारण किसान कम जमीन से भी अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं।



महोत्सव में क्या-क्या होगा?

  • लाइव डेमो और वैज्ञानिक प्रदर्शन
  • किसान-उद्योग नेटवर्किंग
  • स्टार्टअप प्रदर्शनी
  • खरीदार-विक्रेता बैठक
  • लैवेंडर उत्पादों की प्रदर्शनी
  • तकनीकी सत्र और प्रशिक्षण
  • ब्रांडिंग और निर्यात पर चर्चा

वैज्ञानिक क्या कह रहे हैं?

सीएसआईआर-IIIM के निदेशक डॉ. जबीर अहमद के अनुसार यह महोत्सव सिर्फ लैवेंडर खेती का उत्सव नहीं, बल्कि विज्ञान आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का अभियान है। उनका कहना है कि लैवेंडर खेती से पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार, उद्यमिता और टिकाऊ खेती को बढ़ावा मिल रहा है।



किन राज्यों के किसानों को फायदा हो सकता है?

जम्मू-कश्मीर के अलावा हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर राज्यों के किसान भी लैवेंडर और अन्य सुगंधित फसलों की खेती से जुड़ सकते हैं। माना जा रहा है कि आने वाले समय में अरोमा और हर्बल सेक्टर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बन सकता है।

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